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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १३

अधिगतविषयत्व नहीं आ पाता । इसलिए 'अनधिगतज्ञानविषयत्व' यह प्रमा का लक्षण धारावाहिक बुद्धि में भी ठीक घटित हो जाता है इसलिए धारावाहिक बुद्धि में लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती है। यह प्रथम-क्षण का घट, यह दूसरे क्षण का घट, यह तीसरे क्षण का घट, यह चौथे क्षण का घट इस प्रकार की धारावाहिक बुद्धि के अनेक क्षणों में से प्रत्येक क्षण का विषय ( घट ) उस-उस क्षण से विशिष्ट होने से भिन्न-भिन्न है। पूर्व क्षण-विशिष्ट विषय ही उत्तर-क्षण के ज्ञान का विषय नहीं है। इसलिए उसे अधिगत ( ज्ञात ) नहीं कह सकते । अतः धारावाहिक बुद्धि में 'अनधिगतविषयज्ञानत्व' इस लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती । धारावाहिक बुद्धि के, उत्तर-उत्तर क्षण में पूर्व-पूर्व क्षण का विषय ही यदि प्रतीत हुआ होता तो प्रमा का 'अनधिगतविषयत्व' यह लक्षण वहाँ अव्याप्त हुआ होता, परन्तु वैसा नहीं है, अतः प्रमा के प्रथम लक्षण में अव्याप्ति दोष नहीं है।

शंका—'इस समय घट है' इस वाक्य के 'इस समय' शब्द से वर्तमान काल का प्रत्यक्ष हो रहा है, ऐसा यदि कहें तो 'आकाश में बलाका' इस प्रतीति के बल से 'आकाश का प्रत्यक्ष हो रहा है' यह भी आप को कहना पड़ेगा । इस पर कदाचित् आप यह कह दें कि आकाश का प्रत्यक्ष होना तो हमें इष्ट ही है, परन्तु आप ऐसा कह नहीं सकते, क्योंकि आकाश का यदि प्रत्यक्ष हुआ करता तो उसका अस्तित्व सिद्ध करने के लिए 'शब्द' जिसका लिङ्ग है ऐसे अनुमान प्रमाण का अनुसरण करने की आवश्यकता नहीं होती । परन्तु प्रायः सभी वादी आकाश का अस्तित्व, शब्दलिङ्गक-अनुमान प्रमाण से ही सिद्ध करते हैं ।

इसके अतिरिक्त आकाश का प्रत्यक्ष होता है ऐसा मानने पर 'अप्रत्यक्षेऽपि ह्याकाशे बालास्तलमलिनताद्यध्यस्यन्ति' आकाश के अप्रत्यक्ष रहने पर भी अज्ञ लोग तलमलिनता आदि का अध्यास करते हैं ( ब्र. सू. भाष्य ), भाष्यकार के इस कथन से विरोध होगा । 'रूपरहित रूप के समान ही रूपरहित काल का भी चाक्षुष ज्ञान होना सम्भव है' यह आपने पहले कहा है । परन्तु महत्त्व और उद्भूत रूप से रहित द्रव्य का चाक्षुष ज्ञान नहीं हुआ करता, ऐसा हम तार्किकों का सिद्धान्त है। इसलिए 'रूपरहित रूप' का जो कि गुण है चाक्षुष ज्ञान हो सकेगा, लेकिन, रूपरहित 'काल' का जो कि द्रव्य है, चाक्षुष ज्ञान नहीं हो सकता । यही कारण है कि सामने पड़े हुए चन्दन के टुकड़े को देखकर यह 'सुरभि० ( सुगन्धि ) चन्दन है', इस चाक्षुषज्ञान में 'सौरभ' की परोक्षता और 'चन्दन' की चाक्षुषता जिस प्रकार है उसी प्रकार 'इस समय यह घट है' इस वाक्य के 'इस समय' इस काल के अंश में परोक्षता ही है, ऐसा समझिये, उसे चाक्षुषता नहीं है । अर्थात् धारावाहिक बुद्धि में प्रत्येक रूपरहित क्षण को चाक्षुषत्व न होने से ऊपर दिये गये अव्याप्ति दोष की वैसी ही स्थिरता रही ।

समाधान—आप सच कह रहे हैं। परन्तु उपर्युक्त समाधान हमने आपके मत के