वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम्
पूर्वपूर्वज्ञानाविषयतत्तत्क्षणविशेष-^१विषयकत्वेन न तत्राव्याप्तिः ।
**अर्थ—**रूपरहित काल को हम इन्द्रियविषयत्व मानते हैं अर्थात् चक्षुरिन्द्रिय से काल का प्रत्यक्ष होता है। इस कारण धारावाहिक बुद्धि को भी पूर्व-पूर्व ज्ञान का विषय न होनेवाला जो उत्तर-उत्तर द्वितीय, तृतीयादि क्षण तद्विषयकत्व है, अतः धारावाहिक बुद्धि में भी प्रथम लक्षण की अव्याप्ति नहीं है।
विवरण—'जिस द्रव्य में महत्त्व-परिमाण और उद्भूत-रूप रहता है वही द्रव्य, चक्षु का विषय होता है अर्थात् आँख से दिखाई देता है, यह तार्किकों का सिद्धान्त है। किन्तु 'इस समय घट है' यह अनुभव सभी को होता है। उपर्युक्त वाक्य में 'इस समय' यह पद वर्तमान-काल का बोध करा रहा है अर्थात् काल का प्रत्यक्ष होता है यह बात सिद्ध हो रही है। इसलिये द्रव्य के चाक्षुष प्रत्यक्ष में महत्त्व और उद्भूत रूप कारण हुआ करता है, यह (तार्किकों का) सिद्धान्त काल-रूप द्रव्य को छोड़कर इतर द्रव्यों के बारे में है; ऐसा समझना चाहिये। क्योंकि तार्किकों के कथनानुसार जिसमें महत्त्व और उद्भूत रूप नहीं होते उसका चक्षु से प्रत्यक्ष नहीं होता है। ऐसा यदि मान लिया जाय तो रूप-रहित रूप का भी चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं होता है यह कहना पड़ेगा। परन्तु रूप तो प्रत्यक्ष दिखाई देता है किन्तु उसमें उद्भूत रूप तथा महत्त्व नहीं होता। क्योंकि वैशेषिक लोग 'गुण' में गुण की स्थिति नहीं मानते। 'रूप' गुण है इसलिए 'रूप' नामक गुण में उद्भूत रूप नामक दूसरा गुण रहता है, यह कदापि नहीं कह सकते। इसी न्याय से रूपरहित काल भी चक्षुरिन्द्रिय का विषय होता है। 'अयं घटः, अयं घटः, अयं घटः', यह धारा-वाहिक बुद्धि भी, पूर्व-पूर्व ज्ञान का विषय न होने वाला जो उत्तर-उत्तर क्षण उसको विषय करती है। अर्थात् 'यह घट' इस प्रकार प्रथम क्षण में होनेवाले ज्ञान का विषय प्रथम क्षण में स्थित 'घट' होता है। दूसरे-तीसरे क्षण में होने वाले ज्ञान का विषय बनने वाला 'घट', पूर्व क्षण के ज्ञान का विषय बने हुए घट से भिन्न है। प्रथम क्षण में जिस 'घट' का ज्ञान हुआ, वह 'घट' प्रथम क्षण के साथ ही निवृत्त हुआ। इस कारण दूसरे क्षण के ज्ञान का विषय बनने वाला 'घट', पूर्व क्षण के ज्ञान का विषय बने हुए घट से पृथक् है। इसी प्रकार तृतीयक्षणीय ज्ञान का विषयभूत 'घट', द्वितीय क्षणिक ज्ञान के विषयभूत घट से भिन्न है। अतः धारावाहिक ज्ञान कितने ही क्षण तक होते रहने पर भी प्रत्येक क्षण के ज्ञान का विषय 'घट' भिन्न-भिन्न होने से धारावाहिक ज्ञान में
मीमांसकैः कालस्येन्द्रियवेद्यत्वमभ्युपगम्यते । तथा चोक्तं—"न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यत्र कालो न भासते" इति । 'इदानीं घटः' इत्यादिप्रतीतौ कालविशेषस्य विषयत्वेनानुभवात् । अन्यथा गृहीतेऽपि घटे, 'घटो वर्तमानो नवा' इत्याकारको वर्तमानतासंशयो लोकस्य भवेत् । न च तथा, तस्मात् कालस्य प्रत्यक्षत्वं स्वीकार्यम् ।
१. विशिष्ट-विषयत्वेन-इति पाठान्तरम् ।