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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ११

वृत्तिरूप ज्ञान ही है, परन्तु 'अनधिगत' = अज्ञात इस विशेषण से उसका निरसन हो जाता है क्योंकि ज्ञात हुए विषयों में ही इच्छादि उत्पन्न होती है।

अथवा चक्षुरादिकों में लक्षण की अतिव्याप्ति न हो इसलिए प्रमा के लक्षण में 'ज्ञान' पद दिया गया है। क्योंकि चक्षुरादिकों में भी घटादिस्फुरण के द्वारा घटादि-विषयत्व माना गया है। यहाँ पर ज्ञान का अर्थ ज्ञप्ति = अनुभव है। इस कारण उसका करण जो अन्तःकरणवृत्तिरूप ज्ञान है, उसमें इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती।

पहले बता चुके हैं कि जिस स्मृति का विषय यथार्थ होता है अर्थात् उत्तरज्ञान से बाधित नहीं होता ऐसी स्मृति को भी कुछ लोग प्रमाण मानते हैं। इसलिए 'अबाधित-विषयज्ञानत्वं प्रमात्वम्' ऐसा दूसरा स्मृतिसाधारण लक्षण किया है। साधारण का अर्थ है अनेक में रहने वाला। 'उत्तर ज्ञान से बाधित न होनेवाले विषय का ज्ञान ही प्रमा है' यह लक्षण अनुभव और स्मृति इन दोनों ज्ञानों में समान रूप से घटित होता है। इसलिए प्रमा का यह लक्षण स्मृति-साधारण है। प्रथमतः 'अयं घटः' यह घट है ऐसा ज्ञान होता है और उसका किसी उत्तर-ज्ञान से बाध भी नहीं होता। उस ज्ञान से अन्तःकरण में सूक्ष्म संस्कार उत्पन्न होते हैं। उन संस्कारों से आगे चलकर कुछ समय के अनन्तर उसी घट का स्मरण होता है। इस स्मृति का विषय अबाधित घट होने से यह स्मृति प्रमा है। इसी प्रकार अबाधित घट का ज्ञान भी प्रमा है। परन्तु इसके विपरीत शुक्ति में रजत का ज्ञान होने पर अथवा रज्जु में सर्प का ज्ञान होने पर उसके समीप जाकर क्या सचमुच यह रजत ही है और सर्प ही है ? इस प्रकार प्रमाण के द्वारा निरूपण करने लगते हैं तब यह रजत न होकर शुक्ति है, और यह सर्प न होकर रज्जु है, यह ज्ञान होता है। इस उत्तर ज्ञान से पहले उत्पन्न हुए रजत ज्ञान और सर्प-ज्ञान बाधित हो जाते हैं, इसलिए ऐसे स्थलों में यह अनुभवरूप ज्ञान बाधित-विषय है, प्रमा नहीं है। ऐसे बाधित-विषय की कालान्तर में होनेवाली स्मृति भी प्रमा नहीं है। इसलिए स्मृति और अनुभव इन दोनों प्रमाओं का 'अबाधित-विषय-ज्ञानत्वम्' यह साधारण लक्षण है। अनुभव और स्मृति ये दोनों ज्ञान यथार्थ तथा अयथार्थ भेद से दो प्रकार के हुआ करते हैं। इस लक्षण में भी 'ज्ञान' पद पहले की तरह इच्छादिकों की व्यावृत्ति कराने के लिए है।

प्रश्न—'अयं घटः, अयं घटः यह घट, यह घट, यह घट इस धारावाहिक अनुभव ज्ञान में 'यह घट' यह ज्ञान, दूसरे, तीसरे, चौथे आदि सभी ज्ञानों में क्रमशः (पूर्व पूर्व ज्ञान) विषय है। इसलिए द्वितीयादि ज्ञानों में अधिगतविषयत्व है। इस कारण 'अनधि-गतविषयज्ञानत्व' यह पहला लक्षण धारावाहिक प्रमा-ज्ञान में अव्याप्त हो रहा है।

नीरूपस्यापि ¹कालस्येन्द्रियवेद्यत्वाभ्युपगमेन धारावाहिक-बुद्धेरपि


१. कालस्य नीरूपत्वं सर्वसम्मतम्। द्रव्यप्रत्यक्षे महत्त्वसमानाधिकरणस्योद्भूतरूप-वत्त्वस्य प्रयोजकत्वात् कालस्य च द्रव्यस्य रूपाभावात् अतीन्द्रियत्वं नैयायिकैरभ्युपगतम्।