वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 68, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ें| १० | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम् |
|---|
निरूपण करने के लिए प्रारम्भ में ही प्रमाण-लक्षण बताया गया है ‘प्रमाकरणं प्रमाणम्’। यहाँ ‘प्रमाण’ यह लक्ष्य है और ‘प्रमाकरण’ यह उसका लक्षण है। अब इस लक्षण में पदकृत्य बताते हैं—यहाँ यह शंका हो सकती है कि ‘करणम्’ इतना ही प्रमाण का लक्षण न करके ‘प्रमाकरणम्’ इतना बड़ा लक्षण क्यों किया है ? और ‘करण’ क्या वस्तु है अर्थात् ‘करण’ किसे कहते हैं ?
उत्तर—‘करणं प्रमाणम्’ इतना ही यदि प्रमाण का लक्षण किया जाय तो ‘दण्डादि’ भी घटादिकों का करण हुआ करता है तो दण्डादिकों को भी ‘प्रमाण’ कहना पड़ेगा अर्थात् प्रमाण का लक्षण दण्ड आदि में अतिप्रसक्त (अतिव्याप्त) होगा। यह अतिव्याप्ति दोष न आने पावे इसलिये ‘प्रमा का जो करण, वह प्रमाण है’ ऐसा कहना आवश्यक हो जाता है। ‘व्यापारवत् असाधारणं कारणं करणम्’। व्यापारवान् होकर किसी कार्य के प्रति जो असाधारण कारण होता है उसे ही ‘करण’ कहते हैं। ‘प्रमाकरणम्’ यह प्रमाण का सामान्य लक्षण है। इस लक्षण में जो प्रमा शब्द है उसका क्या अर्थ है ? उत्तर—‘प्रमा’ का अर्थ है ‘यथार्थज्ञान’। यथार्थज्ञान, स्मृति और अनुभव भेद से दो प्रकार का है। परन्तु कुछ लोग प्रत्यक्षादि प्रमाणों से उत्पन्न होने वाला जो अनुभव रूप ज्ञान है उसी को ‘प्रमा’ कहते हैं। स्मृति साक्षात् प्रत्यक्षादि प्रमाणों से उत्पन्न नहीं होती, किन्तु प्रत्यक्षादि अनुभव से संस्कार उत्पन्न होता है और संस्कार से स्मृति उत्पन्न होती है। संस्कारों में, प्रमाणत्व न होने से स्मृति को भी प्रमा नहीं माना जाता। इसलिए इस मत में स्मृति को छोड़कर केवल अनुभवात्मक प्रमा का ‘अनधिगताबाधित विषयज्ञानत्वं प्रमात्वम्’ यह लक्षण किया गया है। इसमें ‘प्रमात्वम्’ यह लक्ष्य है और ‘अनधिगत-अबाधित-विषयज्ञानत्वम्’ यह लक्षण है।
‘अनधिगत’—पूर्व ज्ञात न हुआ, ‘अबाधित’—दूसरे प्रमाण से ( उत्तर ज्ञान से ) मिथ्या सिद्ध न होने वाला ( बाधित न होने वाला ) जो विषय, उसका ज्ञान ही प्रमा कहा जाता है। स्मृति का विषय ( जिसका स्मरण होता है वह पदार्थ ), पूर्व अधिगत ( ज्ञात ) हुआ रहता है। क्योंकि बिना अनुभव के स्मरण नहीं होता। इसलिये लक्षण में विषय का ‘अनधिगत’ यह विशेषण लगाने से स्मृति के विषय की व्यावृत्ति हो गई। इसी प्रकार ‘शुक्तौ इदं रजतम्’ शुक्ति ( सीप ) में रजत ( चाँदी ) का ज्ञान होता है। इस ज्ञान का विषय रजत है। परन्तु उसका प्रमाण के द्वारा विवेचन किये जाने पर बाध होता है। अतः शुक्ति में होने वाला रजत-ज्ञान ‘प्रमा’ नहीं है। ऐसे बाधित विषय की निवृत्ति करने के लिए लक्षण में विषय का ‘अबाधित’ यह विशेषण लगाया गया है। अर्थात् ‘अनधिगत और अबाधित विषय का जो ज्ञान, वही प्रमा है’ यह लक्षण स्मृति में घटित न होने से केवल अनुभवात्मक प्रमा का निर्दोष लक्षण है। इस लक्षण के ‘विषयज्ञानत्व’ इस शब्द में जो ‘ज्ञान’ पद है, वह ‘प्रमा’ का स्वरूप बताने के लिए है। इच्छादि अन्तःकरण-वृत्तिरूप नहीं है। इच्छा भी एक प्रकार का अन्तःकरण-