वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ९
ब्रह्मज्ञान में प्रमाण इनका इस ग्रंथ में विस्तार के साथ ग्रन्थकार द्वारा निरूपण किया जा रहा है।
( प्रमालक्षणम् )
तत्र प्रमाकरणं प्रमाणम्।¹ तत्र स्मृतिव्यावृत्तं प्रमात्वं, ‘अनधिगताबाधित-²विषयज्ञानत्वम्’। स्मृतिसाधारणं तु ‘अबाधित³-विषयज्ञानत्वम्’ ।
अर्थ- 'तत्र'—ब्रह्म, ब्रह्मज्ञान और उसमें प्रमाण इनमें प्रमा का जो करण ( साधन ) वह प्रमाण है। प्रमा का अर्थ है यथार्थज्ञान। ( कुछ लोग⁴ स्मृति-ज्ञान को प्रमा नहीं मानते। इसलिए यहाँ प्रथमतः स्मृति में न जाने वाला 'प्रमा' का लक्षण कहते हैं— ) अनधिगत और अबाधित विषय का ज्ञान ही प्रमा है। ( परन्तु कुछ लोग स्मृति-ज्ञान को भी प्रमा मानते हैं। इसलिए स्मृति तथा अनुभव इन दोनों ज्ञानों के लिए जो साधारण हो ऐसा प्रमा का दूसरा लक्षण करते हैं ) अबाधित विषय का ज्ञान ही प्रमा है। यही स्मृति साधारण प्रमा है।
विवरण- 'न हि लक्षणप्रमाणाभ्यां विना वस्तुसिद्धिः'—लक्षण और प्रमाण के बिना किसी वस्तु की सिद्धि नहीं हुआ करती, ऐसा न्याय है। अतः यहाँ पर प्रमाण का
१. प्रमेयनिंरूपणम्प्रमाणाधीनमिति प्रथमं प्रमाणमेव निरूपणीयम्। विशेषज्ञानस्य सामान्यज्ञानपूर्वकत्वात् प्रथमं तावत् प्रमाणस्य सामान्यलक्षणं निरूप्यते। प्रमाणलक्षणस्य प्रमाघटितत्वात् प्रथमं तावत् प्रमात्वं निरूप्यते। तत्र अभिव्यक्तचैतन्यस्यैव प्रमात्वं, तस्यैव अज्ञानविरोधित्वात्। अतोऽज्ञानविरोधिचैतन्यस्यैव प्रमात्वमुच्यते। अन्तःकरणपरिणामरूपाया वृत्तेस्तु जडत्वात् नाऽज्ञानविरोधित्वमिति न प्रमात्वम् किन्तु प्रमाकरणत्वेन तस्याः प्रमाणत्वम्। इन्द्रियादेः प्रमाणत्वव्यवहारस्तु प्रमाणजनकतया गौणो विज्ञेयः। न्यायरत्नावलीकाराणामपि एतदभिमतम्— "चक्षुरादेः प्रमाणत्वव्यवहारस्तु वृत्तिजनक तयौपचारिकः" इति स्थितिः, तथापि प्रत्यक्षपरिच्छेदे चैतन्यस्य प्रमात्वम्, अनुमानपरिच्छेदे वृत्तेः प्रमात्वं दर्शितवान् ग्रन्थकारः। तत्र स्वाकार-वृत्त्यभिव्यक्तचैतन्यस्य प्रमात्वे वृत्तेः करणत्वम् व्यापारस्तु वृत्ति-विषययोः सम्बन्धः, स च सर्वप्रमाणसाधारणः। वृत्तेः प्रमात्वे तु करणानि इन्द्रियाणि व्याप्तिज्ञानादीनि च। व्यापारस्तु विषयेन्द्रियसम्बन्धरूपो व्याप्तिसंस्कारादिरूपश्च।
२-३. तार्थविषयक—इति पाठान्तरम्।
४. माध्व-वैशेषिकादयः स्मृतेः प्रमात्वं स्वीकुर्वन्ति, किन्तु नैयायिकादयः स्मृतेः प्रमात्वं न स्वीकुर्वन्तीतिमतद्वयम्। तथा च प्रमात्वं स्मृत्यवृत्ति स्मृतिवृत्तिचेति। तत्र व्यवहारे भाट्टनय इतिचित्सुखाचार्योक्तमनुस्मरन् भाट्टाभिमतं स्मृत्यवृत्ति-प्रमात्वस्य स्वरूपं 'स्मृतव्यावृत्त'मिति ग्रन्थेनोक्तवान् ग्रन्थकारः।