भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 482 में से

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८ | वेदान्तपरिभाषा | [ पुरुषार्थनिरूपणम्

संपादन किया हुआ स्वर्गादि फल भी क्षीण होता है । इस तथ्य को 'तद्यथेह' इत्यादि श्रुति से अनुगृहीत हुई—'यत्कृतकं तदनित्यम्' व्याप्ति के द्वारा निश्चित किया जाता है । इस विषय में अनुमान¹ इस प्रकार है :—'स्वर्गादिसुख (पक्ष), अनित्य है (साध्य), क्योंकि वह धर्मादिसाधनजन्य है (हेतु), कृषि, सेवा आदि साधनों से प्राप्त होनेवाले सुख की तरह (दृष्टान्त)' । परन्तु इस पर मीमांसक, 'अपाम सोमममृता अभूम' 'अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति' हमलोगों ने सोमपान किया और अमृतत्व पाया, चातुर्मास्य याग करनेवाले को कभी क्षीण न होनेवाला पुण्यफल मिलता है, इस श्रुति के आधार पर "धर्म, अर्थ और काम की भी नित्यता है (प्रतिज्ञा), क्योंकि उनमें पुरुषार्थत्व है (हेतु), मोक्ष के समान (दृष्टान्त) ।"—ऐसा प्रत्यनुमान² करते हैं । परन्तु यह अनुमान, पूर्वोक्त श्रुति के द्वारा अनुगृहीत न होने से बाधित होता है । तथाहि³—'वह्नि उष्ण है, क्योंकि उसमें पदार्थत्व है, सूर्य के समान' इस अनुमान में 'पदार्थत्व' हेतु जैसे बाधित⁴ होता है । क्योंकि जो पदार्थ हो वह उष्ण हो—यह अनुभूत नहीं है । उसी तरह जो पुरुषार्थ हो वह नित्य हो—यह भी अनुभव के विरुद्ध है । क्योंकि अर्थ वित्त, पुरुषार्थ है । परन्तु वह नित्य नहीं है । इसलिए सोमपान का 'अमृत' रूप फल, और चातुर्मास्ययाग का 'अक्षय्य सुख' रूप फल, कर्मजन्य होने से परमार्थ (नित्य) नहीं है । किन्तु वह प्रलय काल तक ही रहने वाला है । पूर्वोक्त श्रुति में 'अमृत' और 'अक्षय्य' शब्द इसी अभिप्राय को व्यक्त करते हैं ।

आभूतसंप्लवं स्थानममृतत्वं हि भाष्यते'—भूतों के, प्रलय पर्यन्त रहनेवाले स्थान को (आकल्प स्थायी पदार्थ को) 'अमृतत्व' कहते हैं, ऐसा वचन है । इस प्रकार मोक्ष ही परम-पुरुषार्थ है, इस बात को सिद्ध कर 'तरति शोकम् आत्मवित्' 'तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति' 'नान्यः पन्था विद्यते अयनाय'—"आत्मज्ञ, शोक को तर जाता है । उसी आत्मा को जान कर मनुष्य मृत्यु का उल्लंघन करता है, आत्मलाभ के लिए ज्ञान के सिवाय दूसरा मार्ग नहीं," इत्यादि श्रुतियों के आधार से ब्रह्मज्ञान ही उसका साधन है, यह मूल ग्रन्थ के 'स च ब्रह्मज्ञानात्' इन शब्दों से कहा गया है ।

'इति'—जबकि मोक्ष ही परम-पुरुषार्थ है और वह ब्रह्मज्ञान से ही प्राप्त होता है ऐसी परिस्थिति में मंदबुद्धि मुमुक्षुजनों पर उपकार करने के लिए ब्रह्म, ब्रह्मज्ञान और


१. स्वर्गादिसुखमनित्यं धर्मादिसाधनजन्यत्वात् कृषिसेवादिसाधनजन्यसुखवत् । २. धर्मार्थकामा नित्याः पुरुषार्थत्वात् मोक्षवत् । ३. वह्निः उष्णः पदार्थत्वात् सूर्यवत् । ४. 'यस्य साध्याभावः प्रमाणान्तरेण निश्चितः स बाधितः' । यत्र यत्र पदार्थत्वं तत्र तत्रोष्णत्व मितिव्याप्तिर्नास्ति । तथैव यः यः पुरुषार्थः स स नित्य इति व्याप्तिर्नास्ति, यतोऽर्थस्य पुरुषार्थत्वेऽपि नित्यत्वं नास्ति ।