वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपुरुषार्थनिरूपणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ७
संसार में जन्म नहीं लेता" छां० उ० ८।१५। इस श्रुति से मोक्ष की नित्यता ज्ञात होती है। उसी प्रकार मोक्ष के अतिरिक्त अन्य (धर्म, अर्थ, काम) तीन पुरुषार्थों की अनित्यता प्रत्यक्ष से तथा श्रुति से ज्ञात होती है। इस विषय में दृष्टान्त "जैसे इस लोक में कृष्यादि कर्म से संपादन किया हुआ धान्यादि, लोक (फल) क्षीण होता है, उसी तरह परलोक में पुण्यरूप अदृष्ट से संपादन किया हुआ स्वर्गादिलोक भी क्षय को प्राप्त होता है।" छां० उ० ८।१। यह श्रुति दृष्टान्त द्वारा धर्म के फल की अनित्यता को बताती है। और अर्थ तथा काम इन दो पुरुषार्थों की अनित्यता प्रत्यक्ष और श्रुतिरूप प्रमाणों से अवगत होती है। वह नित्य मोक्ष, ब्रह्मज्ञानरूप साधन से ही प्राप्त होता है। इसलिए इस ग्रन्थ में ब्रह्म, उसका ज्ञान और उसमें प्रमाण का सविस्तर निरूपण करते हैं।
विवरण—पुरुष जिसे चाहता है उसे पुरुषार्थ कहते हैं। आब्रह्मस्तम्बपर्यन्त सब जीव, उत्कृष्ट सुख की इच्छा करते हैं। धर्म, अर्थ, काम साक्षात् सुख न होकर सुख के साधन हैं और मोक्ष साक्षात् सुखस्वरूप है। इसलिए वही परम (उत्कृष्ट) पुरुषार्थ है।
परम (निरतिशय) अर्थात् जिससे अधिक सुख नहीं और जिसका कभी क्षय नहीं होता ऐसा पुरुषार्थ सुख ही मोक्ष है। मोक्ष की परम पुरुषार्थता '(सः) न च पुनरावर्तते' इस छान्दोग्य श्रुति ने बताई है। (सः) = ब्रह्मज्ञान से मुक्त हुआ जीव, 'पुनः च' अन्य कल्प के आरम्भ में भी 'न आवर्तते' बार-बार जन्म-मरणरूप ससार को प्राप्त नहीं होता। यह श्रुति का अर्थ है।
इस प्रकार मोक्ष के परम पुरुषार्थत्व में श्रुत्युक्त हेतु बताकर धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थों में नित्यत्व नहीं—इस विषय में भी प्रत्यक्ष और श्रुति इन दो प्रमाणों को दिखाते हैं। अर्थ (वित्त) और काम (पुत्रादि) इनसे पुरुष को सुख होता है, परन्तु ये दोनों सुखसाधन विनाशी हैं। यह हमें 'अतोऽन्यदार्तम्' नित्य भूमाख्य आत्मा से अन्य समस्त विनाशी हैं, इस श्रुति से और प्रत्यक्ष-प्रमाण से भी ज्ञात होता है।
श्रुतिस्मृतिविहित धर्म भी सुख का साधन है, क्योंकि धर्माचरण से पुण्याख्य अदृष्ट अथवा अपूर्व उत्पन्न होता है और उससे मरणोत्तर स्वर्गादि सुख प्राप्त होता है। परन्तु धर्माचरण भी एक प्रकार का कर्म ही है और कर्म से मिलने वाला फल अनित्य होता है, यह प्रत्यक्ष अनुभव है। कृषि, राजसेवा आदि कर्मों से मिला हुआ धान्य, धन आदि फल, उपभोग से क्षीण होता है, यह प्रसिद्ध ही है। इसी प्रकार पुण्याचरण से मरणोत्तर
भयनिरूपणम्प्रमाणाधीनमिति प्रमाणनिरूपणमपि कर्तव्यं भवति । सप्रपञ्चमिति ब्रह्मादित्रितयस्य विशेषणं बोध्यम् । सप्रपञ्चं सपरिकरमित्यर्थः । यस्य निरूपणे यः अपेक्षितो भवति स तस्य परिकरः । निर्गुणत्व-जीवाऽभिन्नत्व-सत्यत्वादयो ब्रह्मपरिकराः । निर्विकल्पकत्व-वेदान्तजन्यत्व-कर्मनिरपेक्षत्वाऽपरोक्षत्वादयो ब्रह्मज्ञानपरिकराः । सिद्धविषयकत्वाऽपरोक्षज्ञानजनकत्व-संसर्गाविषयकत्वादयः प्रमाणपरिकराः । तथा च सप्रपञ्चब्रह्मादिनिरूपणे षण्णाम्प्रमाणानामुपयोगः ।