वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६ | वेदान्तपरिभाषा | [ पुरुषार्थनिरूपणम्
ग्रन्थों के अभ्यास से तत्त्वबोध होता है। उन्हें इस ग्रन्थ की ऐसी आवश्यकता नहीं है। तथापि 'मैं इस ग्रन्थ को मन्दबुद्धियों पर अनुग्रह करने के हेतु लिख रहा हूँ' यह कह-कर ग्रन्थकार ने प्राचीन आकर-ग्रन्थों के विषय में अपना आदर अभिव्यक्त करके वेदान्तसारादि अन्यान्य संक्षिप्त ग्रन्थों से, समस्त वेदान्त के तात्पर्यार्थ-प्रतिपादक इस ग्रन्थ का विषय गतार्थ नहीं हो पाया है, यह भी सूचित किया है। इस ग्रन्थ में वेदान्त की प्रक्रिया से प्रमाण-प्रमेयादि पदार्थों का निरूपण किया गया है। इसलिए इस ग्रन्थ को 'परिभाषा' यह अन्वर्थ नाम दिया गया है।$^१$ 'वेदान्तार्थविलम्बिनी' विशेषण से यह परिभाषा स्वकपोलकल्पित न होकर वेदान्त (उपनिषद्) के प्रतिपाद्य अर्थों का प्रतिपादन करने वाली है। उपनिषदों का मूल आधार होने से इस 'परिभाषा' की प्रामाणिकता ध्वनित होती है।
'बोधाय' पद से तत्त्वज्ञानरूप प्रयोजन (फल) साक्षात् कहा है। इस प्रकार पूर्वोक्त पाँच श्लोकों से इष्ट देवता, देवता, परमगुरु और साक्षात् गुरु को प्रणाम करके 'वेदान्त परिभाषा' ग्रन्थ लिखने की प्रतिज्ञा की गई है। अब इस चिकीर्षित ग्रन्थ की शारीरक मीमांसा से संगति सूचित करने के लिए प्रथमतः इस ग्रन्थ का प्रतिपाद्य बताते हैं—
( पुरुषार्थनिरूपणम् )
इह खलु धर्मार्थ-काम-मोक्षाख्येषु चतुर्विध-पुरुषार्थेषु मोक्ष एव परमपुरुषार्थः, 'न स$^२$ पुनरावर्त्तते' छां० ८-१५-१ इति$^३$ श्रुत्या तस्य नित्यत्वावगमात्। इतरेषां त्रयाणां (तु) प्रत्यक्षेण,$^४$ 'तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते' छां० ८-१-६ इत्यादिश्रुत्या चानित्यत्वावगमात्। स च ब्रह्मज्ञानात्—इति ब्रह्म तज्ज्ञानं तत्प्रमाणं च सप्रपञ्चं निरूप्यते$^५$॥
अर्थ—इस श्लोक में तथा वेदों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चतुर्विध पुरुषार्थों में से मोक्ष ही परम-पुरुषार्थ$^६$ है—यह प्रसिद्ध है। क्योंकि "वह आत्मज्ञ पुनः इस
१. 'परितोव्याप्तां भाषां प्रचक्षते'—[ न्या० को० पृ० ४८० ]
२. न च—इति पाठान्तरम्। ३. इत्यादि—इति पाठान्तरम्।
४. धर्मादित्रयाणां परमपुरुषार्थत्वाभावे प्रत्यक्षेण, यत्कृतकं तत् अनित्यमिति सामा-न्यतोदृष्टानुमानाऽनुगृहीतश्रुत्या च अवगतमनित्यत्वं हेतुः।
५. मोक्ष एव परमः पुरुषार्थः। परमत्वं च निरतिशयत्वे सति क्षयशून्यत्वम्।
६. ननु ब्रह्मज्ञानस्य मोक्षोपायत्वात् ब्रह्मज्ञानमेव निरूपणीयम्। किमर्थं तावद् ब्रह्म-निरूपणम्? इति चेन्न, विषयनिरूपणं विना ज्ञानस्य निरूपणं दुःशकं, यतो ज्ञानस्य विषय-निरूप्यत्वात्। प्राधान्याच्च ब्रह्मणोऽपि निरूपणीयत्वम्। तज्ज्ञानं ब्रह्मज्ञानमित्यर्थः। इत-