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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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१४ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम्

अनुसार दिया था। क्योंकि आपका मत है कि 'रूपरहित रूप चाक्षुष ज्ञान का विषय होता है' तो उसी प्रकार रूपरहित काल, वायु इत्यादि द्रव्यों का भी प्रत्यक्ष हो सकता है, यह हमारा आशय था। इस पर 'महत्त्व और उद्भूतरूप से रहित द्रव्य का चाक्षुषज्ञान नहीं हुआ करता, परन्तु रूपरहित 'रूप' यह गुण होने से चक्षु का विषय हो सकता है।' ऐसा यदि आपका कहना है तो ठीक है। उपर्युक्त समाधान हमारा सिद्धान्तरूप नहीं है। इसलिए उसमें अरुचि प्रकट करते हुए धारावाहिक ज्ञान के विषय में हम अपना परम सिद्धान्त बताते हैं—

किञ्च¹ सिद्धान्ते धारावाहिक-बुद्धिस्थले न ज्ञानभेदः,² किन्तु यावद्घटस्फुरणं, तावत् घटाकारान्तःकरणवृत्तिरेकैव, न तु नाना, वृत्तेः स्वविरोधिbrand स्वविरोधिbrand स्वविरोधिbrand स्वविरोधिbrand स्वविरोधिbrand स्वविरोधिbrand स्वविरोधिbrand स्वविरोधिवृत्त्युत्पत्तिपर्यन्तं³ स्थायित्वाभ्युपगमात्⁴। तथा च⁵ तत्प्रतिफलितचैतन्यरूपं घटादिज्ञानमपि तत्र तावत्कालीनमेकमेवेति नाव्याप्तिशङ्काऽपि।

**अर्थ—**हमारे वेदान्त सिद्धान्त के अनुसार धारावाहिक ज्ञान में ( 'यह घट है, यह घट है', इस प्रकार अनेक क्षणों तक होते रहते एकाकार ज्ञान में) वस्तुतः ज्ञान का (अन्तःकरण की वृत्ति का) भेद ही नहीं है। बल्कि जब तक घटादि एक ही विषय का स्फुरण (अनुभव) होता रहता है तब तक घटादि-विषयाकार में परिणत हुई अन्तःकरणवृत्ति एक ही रहती है। एकाकार-ज्ञान में अन्तःकरणवृत्ति अनेकाकार हो यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि अन्तःकरण की कोई भी वर्तमान वृत्ति, उसके विरुद्ध दूसरी वृत्ति उत्पन्न होने तक स्थायी (स्थिर) रहती है। अर्थात् विरोधी वृत्ति के पैदा होने तक घटादि विषयाकार वृत्ति के एक ही होने से उस स्थिर वृत्ति में प्रतिबिम्बित हुआ जो चैतन्य रूप घटादिविषयक ज्ञान, वह भी तबतक (जबतक वृत्ति स्थिर है) एक ही रहता है।


१. अन्यैरभ्युपगतं धारावाहिकज्ञानभेदमभ्युपेत्य प्रमालक्षणस्य अव्याप्तिः निवारिता। इदानीं विवरणभावप्रकाशिकोक्तमनुस्मरन् स्वसिद्धान्तं दर्शयति।
२. ज्ञानैकत्वे वृत्त्येकत्वं प्रयोजकम्।
३. पर्यन्त-स्था—इति पाठान्तरम्।
४. वृत्तेर्द्रव्यत्वात् एकद्रव्यवर्ति द्रव्यान्तरारम्भो न भवति। तथाचोक्तं विवरणभावप्रकाशिकायामज्ञानानुमाननिरूपणे—"अस्मन्मते तु धारावाहिकबुद्धिरेवनास्ति, एकस्यैव ज्ञानस्य तावत्समयस्थित्युपपत्तेः।"
अद्वैतदीपिकायाञ्च—"घटादिवद् वृत्तेरपि द्रव्यत्वात् यावद्विनाशकारणमवस्थातस्येष्टत्वात्।"
५. तत्प्रतिफलितेति वृत्तिप्रतिबिम्बितेत्यर्थः।