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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 482 में से

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प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १५

इसलिए 'अनधिगतविषयज्ञानत्व' इस प्रमा के लक्षण की धारावाहिक बुद्धिस्थल में अव्याप्ति नहीं हो पाती । धारावाहिक ज्ञान में यदि 'अधिगतज्ञानविषयत्व' होता तो इस लक्षण की उसमें अव्याप्ति हुई होती । धारावाहिक ज्ञान में अनधिगत ( अज्ञात ) ही घट विषय है, अतः प्रमा का प्रथम लक्षण अव्याप्ति दोष से दूषित नहीं है।

विवरण—'इस समय यह घट है' इस वाक्य के 'इस समय' इस शब्द से वर्तमान क्षण का ज्ञान होता है । अतः काल की भी प्रत्यक्षता है यह निश्चित होता है । इसी कारण से यह कहा था कि धारावाहिक ज्ञान में प्रत्येक क्षण का विषय भिन्न, अर्थात् पूर्वक्षण का विषय उत्तर क्षण में नहीं रहने से उत्तरक्षण में विषय ज्ञात नहीं है, अपितु अज्ञात ही है । इसलिए लक्षण की अव्याप्ति नहीं है यह एक समाधान दिया था । उस पर तार्किक ने कहा था कि वैसा मानने पर 'आकाश में पक्षी' इस प्रतीति से आकाश को प्रत्यक्ष मानना होगा, परन्तु 'आकाश का प्रत्यक्ष होता है' यह कथन वेदान्त सिद्धान्त के विरुद्ध है । और 'इस समय यह घट है' इस प्रतीति की तरह 'आकाशे पतत्री' आकाश में पक्षी है यह प्रतीति भी अनुभव सिद्ध है । इस कारण पूर्वोक्त अव्याप्ति दोष स्थिर रहा । इसलिए काल की प्रत्यक्षता वेदान्त-सिद्धान्त के अनुकूल होती हुई भी वेदान्ती अब दूसरी युक्ति से पूर्वोक्त अव्याप्ति का निराकरण करते हैं ।

वेदान्त-सिद्धान्त, धारावाहिक-बुद्धि में ( 'यह घट है' इस प्रकार मुहूर्त भर स्थिर रहने वाले ज्ञान में ) ज्ञान का भेद स्वीकार नहीं करता । क्योंकि जब तक एक ही विषय प्रतीत होता रहता है तब तक तदाकार अन्तःकरणवृत्ति भी एक ही रहती है । बिना वृत्ति-भेद के ज्ञान-भेद नहीं होता । जब तक हम सामने रखे हुए घटादि किसी वस्तु की ओर देखते रहते हैं और उसका ज्ञान होता रहता है तब तक तदाकार हुई एक ही अतःकरण-वृत्ति रहती है । एक प्रत्यय ( ज्ञान ) में अनेक वृत्तियों के मानने पर गौरव ( दोष ) होगा । इस कारण 'यह घट है' इस एकाकार प्रवाह-ज्ञान में एक अन्तःकरणवृत्ति को मानना सर्वथा युक्त है, और इसी में अतिलाघव है ।

शंका—लाघव गुण के लोभ से यदि आप 'अयं घटः' 'यह घट है' इस आकार का अनुभव जब तक होता रहता है तब तक एक वृत्ति रहती है ऐसा मानते हों तो गाढ निद्रा लगने तक एक वृत्ति मानने में और भी लाघव होगा, तब जगने से लेकर सुषुप्ति तक एक ही वृत्ति क्यों नहीं स्वीकार करते ?

उत्तर—'अयं घटः' इस वृत्ति के विरुद्ध जो 'अयं पटः' यह दूसरी वृत्ति उत्पन्न होती है, वह पहली वृत्ति को नष्ट करके ही उत्पन्न होती है । 'अयं घटः' लगातार दस क्षण तक रहा, बाद में 'अयं पटः' यह दूसरा ज्ञान होगा तो ग्यारहवें क्षण में पहली घट-वृत्ति का नाश करके बारहवें क्षण में वह स्वयं उत्पन्न होगा । जिस क्षण में घटाकार वृत्ति रहेगी उस क्षण में पटाकार वृत्ति उत्पन्न नहीं हो सकती । इसलिए जगने से लेकर सोने तक एक ही वृत्ति रहती है, यह नहीं स्वीकार किया