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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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१६वेदान्तपरिभाषा[ प्रमालक्षणम्

जा सकता। जाग्रत् अवस्था में अन्तःकरण की वृत्तियों का प्रभाव निरंतर चलता रहता है। ये वृत्तियाँ पूर्व वृत्ति का नाश करके ही उत्पन्न हो सकती हैं। अतः पूर्व वृत्ति दूसरी विरोधी वृत्ति की उत्पत्ति से पूर्वक्षण तक ही स्थिर रहती है, ऐसा हम लोगों का सिद्धान्त होने से सुषुप्ति तक एक ही वृत्ति नहीं रह सकती। वृत्तियों का विरोध उनके विषयों से निश्चित होता है। घटाकार वृत्ति, पटाकार वृत्ति, जलाकार वृत्ति इत्यादि वृत्तियाँ परस्पर एक दूसरे से विरुद्ध हैं, क्योंकि उन वृत्तियों के घट, पट, जल इत्यादि विषय भिन्न-भिन्न हैं अर्थात् परस्पर विरुद्ध हैं। उदासीनता के समय में भी उदासीनताकार वृत्ति रहती है। अतः वह भी अन्य सब वृत्तियों से विरुद्ध ही है। अखण्डाकार वृत्ति अपनी विरोधिनी अविद्यादि सब वृत्तियों का नाश करके दग्धेन्धनाग्नि की तरह अपना भी नाश कर लेती है। क्योंकि उस वृत्ति में अधिष्ठान ज्ञान है, इसलिए वह अविद्यादि सब वृत्तियों का नाश कर सकती है, और उसे दृश्यत्व होने से अपने को भी नष्ट कर लेती है। अधिष्ठानज्ञानत्व के रूप से वह नाशक है और दृश्यत्व के रूप से वह नाश्य है।

शंका—धारावाहिक बुद्धि में भिन्न-भिन्न ज्ञान नहीं हैं; यह बताने के लिए आपने धारावाहिक वृत्ति की एकता का कथन किया। परन्तु वह उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि वेदान्त-सिद्धान्त में चैतन्य को ही ज्ञान शब्द से कहते हैं।

उत्तर—उपर्युक्त कथनानुसार धारावाहिक-बुद्धि में वृत्तिभेद नहीं होता अर्थात् जब तक 'अयं घट:' ऐसी एकाकार बुद्धि रहती है तब तक घटाकार अन्तःकरण-वृत्ति एक ही रहती है। और उस घटाकार वृत्ति में प्रतिबिंबित¹ हुआ चैतन्यरूप घटादि-ज्ञान भी एक ही रहता है। क्योंकि वृत्तिरूप उपाधि का भेद न होने से उस औपाधिक ज्ञान का भी भेद नहीं होता। इसलिए धारावाहिक बुद्धि में 'अनधिगतविषयज्ञानत्व' इस लक्षणांश की अव्याप्ति की शंका भी नहीं है।

इस पर पुनः शंका करते हैं—

ननु सिद्धान्ते² घटादेर्मिथ्यात्वेन बाधितत्वात् तज्ज्ञानं कथं प्रमाणम् ?


१. ननु नीरूपायां वृत्तौ नीरूपस्य चैतन्यस्य कथं प्रतिबिम्बः ? रूपवत्येव रूपवतः प्रतिबिम्बनियमोवर्तते, इति चेन्न। नीरूपस्यापि आकाशादेः प्रतिबिम्बदर्शनात् तादृशनियमे प्रमाणाभावः। द्रव्यप्रतिबिम्बे तादृशस्य नियमस्य स्वीकारेऽपि अद्रव्यप्रतिबिम्बे तादृशस्य नियमस्याऽभावात् चैतन्यस्य निर्गुणत्वेन अद्रव्यत्वात् तत्प्रतिबिम्बे न कोऽपि बाधः। तथाचोक्तं सिद्धान्तबिन्दौ-"जपाकुसुमरूपस्य नीरूपस्यापि स्फटिकादौ प्रतिबिम्बदर्शनात्" इति।
२. सिद्धान्ते अद्वैतसिद्धान्ते। 'मिथ्यात्वेन' इत्यत्र ज्ञापकहेतौ तृतीया, तेन मिथ्यात्वज्ञानज्ञाप्यं बाधितत्वमित्यर्थः।