वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १७
**अर्थ—**वेदान्त-सिद्धान्त में घटादि पदार्थों का शुक्ति-रजत की तरह मिथ्यात्व है, क्योंकि तत्त्वज्ञान से उनका बाध होता है। तब बाधित होने वाले घटादि मिथ्या विषयों (पदार्थों) के ज्ञान में 'प्रमात्व' कैसे हो सकता है ?
**विवरण—**जिस ज्ञान का विषय बाधित होता है, वह ज्ञान, अप्रमा है। अर्थात् प्रमा नहीं है, यह वेदान्त को भी स्वीकार है। तत्र प्रमा के प्रथम-लक्षण में दिये गये 'अबाधितविषयज्ञानत्व' अंश का घटादिविषयज्ञान तो प्रमाणरूप से लक्ष्य बन ही नहीं सकता। इसलिए वहाँ अव्याप्ति की शंका करना और उसका निरसन करना यह दोनों उचित नहीं हैं, इसी आशय से वादी ने यह शंका की थी १ ।
उपर्युक्त शंका का प्रतिज्ञापूर्वक समाधान— उच्यते । ब्रह्मसाक्षात्कारानन्तरं हि घटादीनां बाधः, २ 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येत्' (बृ० ४–५–१५) इति श्रुतेः, न तु संसारदशायां बाधः, 'यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति' (बृ० ४–५–१५) इति श्रुतेः । तथा चाबाधितपदेन ३ संसारदशायामबाधितत्व विवक्षितमिति न घटादिप्रमायामव्याप्तिः ।
तदुक्तम् ४—
देहात्मप्रत्ययो यद्वत् प्रमाणत्वेन कल्पितः ।
लौकिकं तद्वदेवेदं प्रमाणं त्वाऽऽत्मनिश्चयात् ॥ १ ॥
इति । आत्मनिश्चयाद् ब्रह्मसाक्षात्कारपर्यन्तमित्यर्थः । लौकिकमिति घटादिज्ञानमित्यर्थः ।
**अर्थ—**ब्रह्म-साक्षात्कार होने के अनन्तर (स्वाधिष्ठान-साक्षात्कार के अनन्तर) ही घटादि विषयों का बाध होता है। इस विषय में "जिस तत्त्व-साक्षात्कार की दशा में इस ब्रह्मज्ञ के लिए सब आत्मरूप ही हो गया हो, उस दशा में वह 'केन कं पश्येत्' अर्थात् किस करण (इन्द्रिय) से किस विषय को देखेगा।" ऐसी श्रुति है। परन्तु
१. अयमभिप्रायः—अद्वैतिवेदान्तिनां मते ब्रह्मातिरिक्तस्य सर्वस्यापि विषयस्य मिथ्यात्वेन बाधितत्वात् तत्तद्विषयकस्य सर्वस्यापि ज्ञानस्य बाधितविषयकत्वात् तत्र तत्र 'प्रमा' लक्षणस्यागमनात् अव्याप्तिः ।
२. अधिष्ठानसाक्षात्कारस्यैव अध्यस्तनिवर्तकत्वात् ब्रह्मणश्च घटाद्यधिष्ठानत्वात् ब्रह्मसाक्षात्कारानन्तरं घटादीनां बाधः ।
३. ब्रह्मप्रमातिरिक्तेन केनचित् ज्ञानेन घटादिविषयस्य बाधो न भवति ।
४. अतिप्राचीनेन अद्वैतवादिना सुन्दरपाण्ड्याचार्येणेति शेषः ।
२ वे० प०