वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 76, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ें१८ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम्
संसार दशा में उनका बाध नहीं होता, इस विषय में भी 'यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति' अर्थात् जिस संसार दशा में मानो द्वैत था, उस दशा में यह इतर (जीव) प्रमाता होकर इतर विषय को देखता है, ऐसी वहीं पर श्रुति है। इसलिए प्रमा के प्रथम लक्षण में स्थित 'अबाधित' पद से संसारदशा का 'अबाधितत्व' अर्थ विवक्षित है। इस कारण लक्षण की घटादिप्रमा में अव्याप्ति नहीं होती। इस विषय में प्राचीन सांप्रदायिकों ने ऐसा कहा है--'आ¹ आत्मनिश्चयात्' = आत्मनिश्चय (ब्रह्मसाक्षात्कार) होने तक देह ही आत्मा है—इस प्रकारका ज्ञान प्रमाण रूप में (प्रामाणिक) माना जाता है, उसी प्रकार यह घटादि लौकिक पदार्थों का ज्ञान भी 'प्रमा' है। आ आत्मनिश्चयात्—का अर्थ ब्रह्मसाक्षात्कार होने तक, और 'लौकिकम्' का अर्थ घटादिज्ञान है।
विवरण—घटादि पदार्थों को शुक्तिरजत की तरह बाधितत्व होने से मिथ्यात्व है, तब बाधित होनेवाले घटादिकों के ज्ञान में प्रमात्व कैसे? उन पदार्थों का ज्ञान प्रमा न होने से घटादिज्ञान भी पूर्वोक्त लक्षणों का लक्ष्य नहीं बन सकता। वादी के द्वारा ऐसी शंका करने पर, मूल में 'उच्यते' इस पद से वादी की शंका का समाधान करने की प्रतिज्ञा करके अग्रिम 'ब्रह्मसाक्षात्कारानन्तरम्' इत्यादि ग्रन्थ से सप्रमाण समाधान किया गया है। घटादि व्यवहारिक पदार्थों का ब्रह्मसाक्षात्कार के अनन्तर ही बाध होता है। शुक्तिरजत की तरह वह संसार दशा में नहीं होता। शुक्ति में रजत का भास संसार दशा में होता है और उसका प्रमाण के द्वारा आलोचन किये जाने पर भासित होने वाले रजत का बाध भी उसी दशा में होता है। इसलिए शुक्तिरूप्य मिथ्या है। परन्तु व्यवहारदशा में बाधित न होनेवाले घटादिपदार्थ मिथ्या नहीं हैं। इसलिए उनका ज्ञान 'प्रमा' होने से प्रमा-लक्षण का लक्ष्य भी है। इस विषय में 'यत्र तु०' इस श्रुति का आधार दिया गया है। यहाँ 'तु' शब्द के द्वारा अविद्यावस्था की अपेक्षा विद्यावस्था की विलक्षणता को सूचित करके जिस ब्रह्मसाक्षात्कार की अवस्था में तत्त्वज्ञ की दृष्टि से सम्पूर्ण जगत् आत्मरूप ही हो जाता है, उस अवस्था में प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय का भेद ही नहीं रहता, ऐसी स्थिति में वह ज्ञानी किन इन्द्रियादि साधनों से कौन से घटादि विषयों का ग्रहण करेगा। ऐसा कहकर इस श्रुति से परमार्थवस्था में सभी व्यवहारावस्था का बाध हो जाता है, यह सूचित किया गया है, परन्तु संसार दशा में घटादि व्यवहारिक पदार्थों का बाध नहीं होता², इसलिए व्यवहार दशा में घटादि पदार्थ मिथ्या नहीं समझे जाते।
संसारदशा में घटादि पदार्थों का बाध नहीं होता इस विषय में 'यत्र हि०' इत्यादि श्रुति प्रमाण है। जिस संसार दशा में प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयादि द्वैत का-सा प्रत्यय
१. 'आ + आत्मनिश्चयात्' अत्र 'आङ्' इत्युपसर्गो मर्यादार्थकः।
२. घटादिनां नाशेऽपि तदुपादानस्य अज्ञानस्य सद्भावान्नबाधः, किन्तु निवृत्तिः।