वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
१८ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम्
संसार दशा में उनका बाध नहीं होता, इस विषय में भी 'यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति' अर्थात् जिस संसार दशा में मानो द्वैत था, उस दशा में यह इतर (जीव) प्रमाता होकर इतर विषय को देखता है, ऐसी वहीं पर श्रुति है। इसलिए प्रमा के प्रथम लक्षण में स्थित 'अबाधित' पद से संसारदशा का 'अबाधितत्व' अर्थ विवक्षित है। इस कारण लक्षण की घटादिप्रमा में अव्याप्ति नहीं होती। इस विषय में प्राचीन सांप्रदायिकों ने ऐसा कहा है--'आ¹ आत्मनिश्चयात्' = आत्मनिश्चय (ब्रह्मसाक्षात्कार) होने तक देह ही आत्मा है—इस प्रकारका ज्ञान प्रमाण रूप में (प्रामाणिक) माना जाता है, उसी प्रकार यह घटादि लौकिक पदार्थों का ज्ञान भी 'प्रमा' है। आ आत्मनिश्चयात्—का अर्थ ब्रह्मसाक्षात्कार होने तक, और 'लौकिकम्' का अर्थ घटादिज्ञान है।
विवरण—घटादि पदार्थों को शुक्तिरजत की तरह बाधितत्व होने से मिथ्यात्व है, तब बाधित होनेवाले घटादिकों के ज्ञान में प्रमात्व कैसे? उन पदार्थों का ज्ञान प्रमा न होने से घटादिज्ञान भी पूर्वोक्त लक्षणों का लक्ष्य नहीं बन सकता। वादी के द्वारा ऐसी शंका करने पर, मूल में 'उच्यते' इस पद से वादी की शंका का समाधान करने की प्रतिज्ञा करके अग्रिम 'ब्रह्मसाक्षात्कारानन्तरम्' इत्यादि ग्रन्थ से सप्रमाण समाधान किया गया है। घटादि व्यवहारिक पदार्थों का ब्रह्मसाक्षात्कार के अनन्तर ही बाध होता है। शुक्तिरजत की तरह वह संसार दशा में नहीं होता। शुक्ति में रजत का भास संसार दशा में होता है और उसका प्रमाण के द्वारा आलोचन किये जाने पर भासित होने वाले रजत का बाध भी उसी दशा में होता है। इसलिए शुक्तिरूप्य मिथ्या है। परन्तु व्यवहारदशा में बाधित न होनेवाले घटादिपदार्थ मिथ्या नहीं हैं। इसलिए उनका ज्ञान 'प्रमा' होने से प्रमा-लक्षण का लक्ष्य भी है। इस विषय में 'यत्र तु०' इस श्रुति का आधार दिया गया है। यहाँ 'तु' शब्द के द्वारा अविद्यावस्था की अपेक्षा विद्यावस्था की विलक्षणता को सूचित करके जिस ब्रह्मसाक्षात्कार की अवस्था में तत्त्वज्ञ की दृष्टि से सम्पूर्ण जगत् आत्मरूप ही हो जाता है, उस अवस्था में प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय का भेद ही नहीं रहता, ऐसी स्थिति में वह ज्ञानी किन इन्द्रियादि साधनों से कौन से घटादि विषयों का ग्रहण करेगा। ऐसा कहकर इस श्रुति से परमार्थवस्था में सभी व्यवहारावस्था का बाध हो जाता है, यह सूचित किया गया है, परन्तु संसार दशा में घटादि व्यवहारिक पदार्थों का बाध नहीं होता², इसलिए व्यवहार दशा में घटादि पदार्थ मिथ्या नहीं समझे जाते।
संसारदशा में घटादि पदार्थों का बाध नहीं होता इस विषय में 'यत्र हि०' इत्यादि श्रुति प्रमाण है। जिस संसार दशा में प्रमाता, प्रमाण और प्रमेयादि द्वैत का-सा प्रत्यय
१. 'आ + आत्मनिश्चयात्' अत्र 'आङ्' इत्युपसर्गो मर्यादार्थकः।
२. घटादिनां नाशेऽपि तदुपादानस्य अज्ञानस्य सद्भावान्नबाधः, किन्तु निवृत्तिः।
प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १९
होता है¹, उस द्वैतावस्था में चेतन-आत्मा, स्वरूप से च्युत होकर उपाधिलक्षण प्रमाता बन जाता है, और अपने से भिन्न विषयों को देखता है, इस प्रकार इस श्रुति का तात्पर्यार्थ है।
यदि घटादि पदार्थों को त्रैकालिक अबाधितत्व नहीं है, केवल संसार दशा में ही अबाधितत्व है तो प्रमा का पूर्वोक्त लक्षण घटादि प्रमा में अव्याप्त ही रहा, इस शंका का समाधान 'तथा च' इस ग्रन्थ से किया है—'संसारदशा में घटादि विषयों का बाध न होने से उनकी प्रमा को लक्ष्य समझा जाता है। अतः पूर्वोक्त लक्षण में प्रतीत होने वाले अव्याप्ति दोष को दूर करने के लिए लक्षणगत 'अबाधित' पद से 'संसारदशा में अबाधितत्व' यह अर्थ विवक्षित है। उससे घटादि-प्रमा में लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती। यही समाधान-ग्रन्थ का तात्पर्य है।
'व्यवहारदशा में घटादिज्ञान प्रमा है' अपने (ग्रन्थकार के) इस कथन को पुष्ट करने के लिए प्राचीन साम्प्रदायिक विद्वानों की सम्मति को 'तदुक्तम्' इस ग्रन्थ से प्रदर्शित किया है। "आत्मनिश्चय होने तक 'देह ही आत्मा' यह अनुभव सर्वप्राणि-साधारण है और वह प्रमाण (प्रमारूपसे) माना जाता है। उसी तरह आत्मनिश्चय होने तक सभी लौकिक-ज्ञान (क्रिया-कारक-फलादि-विषयकज्ञान) प्रमाण (प्रमा) हैं" इस प्रकार उस लौकिक वचन का तात्पर्य है।
संसारदशा में भी 'यह मैं' ऐसा आत्मनिश्चय रहता है, तब 'आत्मनिश्चय होने तक' इस कथन का क्या आशय है ? ऐसी शङ्का यदि किसी को हो तो उसके समाधानार्थ ग्रन्थकार ने 'आ आत्मनिश्चयात्' इन पदों का ब्रह्मसाक्षात्कार होने तक यह अर्थ बताया है। ब्रह्मसाक्षात्कार का अर्थ है आ ब्रह्मस्तम्बपर्यन्त सब प्राणियों में एकात्मा का अनुभव होना, अर्थात् संसारदशा में 'यह मैं' इस प्रकार आत्मनिश्चय होना भ्रान्त प्रत्यय है। 'यत्र त्वस्य०' इस पूर्वोक्त श्रुति वचन से यही सिद्धान्त सूचित किया है। 'लौकिकम्' शब्द से 'केवल प्रत्यक्ष प्रमाणजन्य-ज्ञान' यह अर्थ न समझा जाय, इसलिए ग्रन्थकार ने उसका अर्थ 'घटादिज्ञान' बताया है। 'ब्रह्मसाक्षात्कार होने तक' ऐसा कहने से श्लोकस्थ 'लौकिक घटादिज्ञान' इन पदों से 'ब्रह्मातिरिक्त सब वस्तुओं का ज्ञान' समझना चाहिए। तब 'ज्योतिष्टोमादिकों में स्वर्गादि इष्ट फलों की साधनता है' इत्यादि ज्ञान के अलौकिक होने पर भी कोई दोष नहीं। क्योंकि 'ब्रह्मसाक्षात्कार होने तक ब्रह्म-भिन्न सब वस्तुओं का ज्ञान प्रमाण (प्रमा) है' यह अर्थ स्पष्ट होता है²।
यहाँ तक प्रमा का स्मृतिव्यावृत्त और स्मृतिसाधारण ऐसा लक्षण बताया। अब
१. व्यवहारदशायां ( संसारदशायां ) द्वैतमिव = द्वैतं भवतीव। प्रपञ्चोपादानभूतेन अज्ञानेन द्विचन्द्रादिदर्शनवत् क्रिया-कारक-फल लक्षण-कल्पितभेदवदिव भवति, वास्तविकं द्वैतं न भवति।
२. प्रमासामान्यलक्षणम्—
'अनधिगत-ब्रह्मप्रमातिरिक्त-अबाधितार्थ-विषयकज्ञानत्वं प्रमात्वम्'।
२० | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम्
उस लक्षण से लक्षित (अवगत) होने वाला जो प्रमा-करण प्रमाण है, वह कितने प्रकार का है ? ऐसी आकांक्षा होने पर प्रमाण के प्रकारों को बताते हैं—
( प्रमाणभेदनिरूपणम् )
तानि च प्रमाणानि षट्, प्रत्यक्षानुमानोपमानागमार्थापत्त्यनुपलब्धिभेदात् ।
**अर्थ—**ये प्रमाण यथार्थ ज्ञान (प्रमा) के साधन अर्थात् करण छह हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति और शब्द, अनुपलब्धि ।
**विवरण—**चार्वाक के मत में केवल 'प्रत्यक्ष' ही एक प्रमाण है। कणाद, वैशेषिक और बौद्ध, के मत में 'प्रत्यक्ष और अनुमान' दो प्रमाण हैं। सांख्य के मत में 'प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द' तीन प्रमाण हैं। नैयायिक के मत में प्रत्यक्षादि तीन और 'उपमान' चार प्रमाण हैं। प्रभाकर मीमांसक के मत में पूर्वोक्त चार और 'अर्थापत्ति' ये पाँच प्रमाण हैं। पौराणिक के मत में पूर्वोक्त पाँच और 'सम्भव' तथा 'ऐतिह्य' सात प्रमाण हैं।¹ इन सबका निराकरण करने के लिए तथा वे छह प्रमाण कौन से ? ऐसी आकांक्षा होने पर उनका 'प्रत्यक्ष, अनुमान' इत्यादि ग्रन्थ से उद्देश (नाम-निर्देश) किया है। पौराणिकों के अभिमत सम्भवादि अधिक प्रमाणों का इन छह प्रमाणों में ही अन्तर्भाव हो जाता है। अतः उन्हें पृथक् मानने की आवश्यकता नहीं है।
इन छह प्रमाणों में से 'प्रत्यक्ष' प्रमाण, अन्य सब प्रमाणों का उपजीव्य अर्थात् कारण है, और वह अन्य किसी भी प्रमाण से पूर्व प्रवृत्त होने के कारण ज्येष्ठ भी है। इसलिए ग्रन्थकार प्रथमतः 'तत्र प्रत्यक्षप्रमायाः करणम्', इत्यादि ग्रन्थ से उसी का निरूपण प्रारम्भ करते हैं—
( प्रत्यक्षप्रमाणनिरूपणम् )
तत्र प्रत्यक्षप्रमायाः करणं प्रत्यक्षप्रमाणम् । प्रत्यक्षप्रमा चात्र चैतन्यमेव । 'यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' ( बृ० ३-४-१ ) इति श्रुतेः । अपरोक्षादित्यस्यापरोक्षामित्यर्थः ;
**अर्थ—**उन छह प्रमाणों में से प्रत्यक्ष प्रमा के करण को प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैं ।
१. 'प्रत्यक्षमेकं चार्वाकाः कणाद-सुगतौ पुनः ।
अनुमानञ्च तच्चाथ सांख्याः शब्दश्च ते अपि ॥
न्यायैकदेशिनोऽप्येवमुपमानञ्च केचन ।
अर्थापत्त्या सहैतानि चत्वार्याह प्रभाकरः ॥
अभावषष्ठान्येतानि भाट्टावेदान्तिनस्तथा ।
सम्भवैतिह्ययुक्तानि तानि पौराणिका जगुः ॥—( तार्किकरक्षा )
प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः २१
वेदान्त-सिद्धान्त में प्रत्यक्ष-प्रमा, 'चैतन्य' ही है। क्योंकि 'यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' जो 'साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म', (बृ० ३।४।१) यह श्रुति है। मूल श्रुतिवाक्य में 'अपरोक्षात्' ऐसा पञ्चम्यन्त पाठ होने पर भी उसे 'अपरोक्षम्' ऐसा नपुंसकलिंग प्रथमान्त समझना चाहिए। कारण यह है कि 'साक्षात्' यह शब्द अव्यय होने से वह सदैव एक-सा ही रहेगा, परन्तु 'अपरोक्ष' शब्द ब्रह्म का विशेषण होने से 'अपरोक्षम्' यही उसका रूप समझना चाहिए।
विवरण—'प्रमाकरणं प्रमाणम्' यह प्रमाण का सामान्य लक्षण पहले बताया जा चुका है। अब उन छह प्रमाणों में से प्रत्येक का विशेष लक्षण बताना है। पूर्वोक्त छह प्रमाणों में से 'प्रत्यक्ष प्रमा का जो करण, वह प्रत्यक्ष प्रमाण', यह प्रत्यक्ष प्रमाण का लक्षण है। इसमें 'प्रत्यक्षप्रमाणं' यह लक्ष्य है और 'प्रत्यक्षप्रमायाः करणम्' यह लक्षण है। अब इस लक्षण में 'प्रत्यक्ष प्रमा का' इतना लम्बा कहने के बजाय केवल 'प्रमा का' इतना ही क्यों नहीं कहा ? इस शंका का उत्तर यह है कि 'प्रमा' का अर्थ है यथार्थ ज्ञान, और वह छह प्रकार का है, तब 'प्रमा का करण' इतना ही लक्षण करने पर उसकी अनुमान, उपमान इत्यादि अन्य प्रमा-करणों में भी अतिव्याप्ति होगी, वह न हो इसलिए 'प्रत्यक्षप्रमा का' इतना कहना पड़ा।
प्रमा, प्रमाण इत्यादि शब्द और उनके अर्थ के विषय में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रमा और प्रमाण इन दोनों अर्थों में 'प्रत्यक्ष' शब्द का एक-सा ही उपयोग किया जाता है। 'घट' से चक्षुरिन्द्रिय का संनिकर्ष होने पर 'यह घट है' इस आकार (स्वरूप) का प्रमात्मकज्ञान होता है। इस ज्ञान (प्रमा) को 'प्रत्यक्ष' कहते हैं। और इस ज्ञान (प्रमा) का करण 'चक्षुरिन्द्रिय' है, उसे भी प्रत्यक्ष कहते हैं। इसलिए प्रत्यक्ष शब्द का उपयोग प्रत्यक्षप्रमा और उसका करण इन दोनों अर्थों में एक-सा किया जाता है।
न्यायशास्त्र में प्रत्यक्ष-ज्ञान छह प्रकार का बताया गया है। चक्षु, श्रोत्रादि पांच ज्ञानेन्द्रियों से होने वाला चाक्षुष, श्रोत्रादि पाँच प्रकार का तथा मनरूप इन्द्रिय से होने वाला मानस-प्रत्यक्ष, यह छठा। परन्तु वेदान्तमत में ग्रन्थकार ने 'मन को इन्द्रियत्व नहीं है' ऐसा कहा है। इसलिए श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच ही हैं और उनसे होने वाला प्रत्यक्ष-ज्ञान भी पाँच ही प्रकार का है।
जिस आदमी को अपने घर के रसोईघर आदि में 'जहाँ धुआँ होता है वहाँ अग्नि भी होती है' इस प्रकार व्याप्ति ग्रहण (नित्य सम्बन्ध का ज्ञान) हुआ हो, वही आदमी कहीं दूर जाकर पर्वतादि स्थल पर मूल से लेकर ऊपर तक जाती हुई अविच्छिन्न धुएँ की रेखा को यदि देखे तो उसे 'जहाँ-जहाँ धुआँ होता है वहाँ-वहाँ अग्नि होती है' इस व्याप्ति (सम्बन्ध) की याद आ जाती है। तदनन्तर उसे 'यह (पर्वत) वह्निमान् है (इसमें अग्नि है) ऐसा जो ज्ञान (प्रमा) होता है, उसे अनुमिति कहते हैं और उसमें करण (साधन) जो व्याप्तिज्ञान है, उसे अनुमान कहते हैं।'
| २२ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम् |
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जिस पुरुष ने अपने गांव में गाय अथवा बैल देखा हो वह कभी वन ( जंगल ) चला जाय और वहां पर गवय नामक पशु को अपनी आंखों से देखे तो वह मन में कहने लगता है कि मैंने गांव में देखी हुई गाय के आकार जैसा ही इस ( गवय ) का आकार देखा है, और 'गोसदृशो गवयः' गाय जैसा ही गवय होता है, यह लोगों को कहते हुए भी सुना है, तथा इस पशु का देह गाय या बैल के देह जैसा ही है, इसलिए यही 'गवय' है, इस प्रकार उसे निश्चय ( प्रमा ) होता है। इसी को उपमिति ( प्रमा ) कहते हैं। इस प्रमा का करण सादृश्यज्ञान है, उसे उपमान कहते हैं।
'अहरहः सन्ध्यामुपासीत' प्रतिदिन सन्ध्या की उपासना करनी चाहिये। इस वैदिक वाक्य को और 'गाय के बछड़े को बांधो' इस लौकिक वाक्य को श्रोत्रेन्द्रिय से सुनकर जो शब्दार्थज्ञान उत्पन्न होता है उसे शाब्दी प्रमा कहते हैं। और वैदिक अथवा लौकिक तात्पर्ययुक्त वाक्य-ज्ञान उसका कारण है। वाक्य का उच्चारण करने वाले पुरुष ने जिस विवक्षित अर्थ से वाक्य का उच्चारण किया हो, उस अर्थ में उस वाक्य का तात्पर्य रहता है। ऐसे तात्पर्य-युक्त वाक्य का ज्ञान ही शाब्दी प्रमा का कारण है। वाक्य-ज्ञान को ही शब्दप्रमाण कहते हैं।
'प्रत्यक्ष' शब्द की तरह 'अर्थापत्ति' शब्द का भी प्रभा और प्रमाण इन दोनों अर्थों में समान ( साधारण ) प्रयोग किया जाता है। जैसे—( पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते ) 'यह मोटा-ताजा देवदत्त दिन में भोजन नहीं करता' यह वाक्य सुनने पर देखी हुई अथवा सुनी हुई देवदत्त की मोटाई रात्रि-भोजन के अभाव में असम्भव है इस कारण उसकी मोटाई के ज्ञान होने के अनन्तर पैदा होने वाली—'रात्रौ भुङ्क्ते' यह रात में अवश्य भोजन करता है,—जो प्रमा ( ज्ञान ) है, उसे अर्थापत्ति कहते हैं। और उस प्रमा को उत्पन्न करने वाले पुष्टत्वज्ञान रूप करण को भी अर्थापत्ति कहते हैं।
घट से रहित ( खाली ) स्थान पर घटाभाव रूप जो विलक्षण प्रमा ( ज्ञान ) होती है उसे अभाव-प्रमा ( अभाव का अनुभव ) कहते हैं। घट की अनुपलब्धि ( घट का अनुभव न होना ) यही उस अनुपलब्धि रूप प्रमा का करण है। इस विवेचन से यह स्पष्टतया समझ में आ सकता है कि 'प्रत्यक्ष ( इन्द्रिय ) प्रत्यक्ष-प्रमा का करण है' और व्याप्तिज्ञान, सादृश्यज्ञान, शब्दज्ञान, पुष्टत्वादिज्ञान तथा अभावज्ञान यह सब यथाक्रम अनुमिति, उपमिति, शब्द, अर्थापत्ति तथा अनुपलब्धि इन प्रमाओं के करण हैं।
शंका--प्रत्यक्षेतर पाँच प्रमाओं में प्रत्यक्षकरण की अतिव्याप्ति न होने पाये यही उद्देश्य यदि 'प्रमायाः करणम्' न कहकर 'प्रत्यक्ष-प्रमायाः' के कहने में हो तो 'प्रत्यक्षज्ञानकरणं प्रत्यक्ष-प्रमाणम्' इतना ही लक्षण किया जाय। लक्षण में 'प्रमा' शब्द के निवेश करने की आवश्यकता नहीं।
समाधान--सीप में रजत ( चाँदी ) का ज्ञान होना भले ही भ्रम हो परन्तु वह प्रत्यक्ष ज्ञान है और उसका साधन 'साक्षी' है। उसमें प्रत्यक्ष-प्रमाण के लक्षण क
प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः २३
अतिव्याप्ति न होने पावे इसलिए लक्षण में 'प्रमा' शब्द के निवेश करने की आवश्यकता है। 'शुक्तिरजत-ज्ञान' यद्यपि प्रत्यक्ष-ज्ञान है तथापि उसका विषय (शुक्तिरजत) बाधित होने वाला है इसलिए वह 'प्रमा' नहीं है। यही कारण है कि प्रमा के लक्षण में 'अबाधितविषयज्ञानत्व' इन पदों की योजना की है।
शंका—'प्रत्यक्ष-प्रमा' शब्द का अर्थ क्या है ? 'इन्द्रियजन्यज्ञानत्वं प्रत्यक्षप्रमात्वम्' इन्द्रिय से पैदा होने वाला ज्ञान—प्रत्यक्ष प्रमा है, ऐसा यदि कहें तो यह भूलना नहीं होगा कि, वेदान्त के सिद्धान्त में 'मन' की इन्द्रियों में गिनती नहीं है। तथापि सुख-दुःखादिकों का प्रत्यक्ष रूप से अनुभव होता है तब 'इन्द्रियजन्यज्ञानत्वं' इस प्रत्यक्ष-लक्षण की सुखादिप्रत्यक्ष-प्रमा में अव्याप्ति होती है क्योंकि आपके मत से सुखादिज्ञान प्रत्यक्ष होने पर भी इन्द्रियजन्य नहीं है। यदि हम दूसरे प्रकार से ऐसा कहें-अनुमिति, शाब्द, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि ये पाँचों प्रमाएं क्रम से व्याप्तिज्ञान, सादृश्यज्ञान, तात्पर्यवत्पदज्ञान, अनुपलब्धिज्ञान इन पाँच ज्ञानों से पैदा होती है। इसलिए परिशेषन्याय से 'ज्ञानाजन्यं ज्ञानं' ज्ञान से उत्पन्न न होने वाले ज्ञान को प्रत्यक्ष-ज्ञान कहते हैं। इस प्रकार प्रत्यक्ष-प्रमा का लक्षण करें तो दूसरों के मत से 'सभी प्रत्यक्ष-ज्ञान, ईश्वरज्ञानाजन्य होने से इस दूसरे लक्षण पर भी अव्याप्ति दोष आता है।'
इस अव्याप्तिदोष का निवारण करने के लिए 'ज्ञानाकरणकं ज्ञान'—ज्ञान जिसका करण नहीं हो ऐसा ज्ञान—प्रत्यक्ष प्रमा ! ऐसा लक्षण करें तो अनुभव, संस्कार को उत्पन्न करके क्षीण हो जाता है, तब अनुभवज्ञान, स्मृतिज्ञान का करण हो नहीं सकता। अनुभव और स्मृति की प्रक्रिया इस प्रकार है—
पूर्वानुभूत पदार्थ के संस्कार मन में स्थिर रहते हैं। अदृष्टवशात् संनिकर्षादि निमित्तों के कारण संस्कारों के उद्बुद्ध होने पर पूर्वानुभूत पदार्थ की स्मृति होती है। कुछ लोग अबाधित पूर्वानुभूत पदार्थ की स्मृति को भी प्रमा नहीं कहते हैं। उनके मत में 'ज्ञानाकरणं ज्ञान' ज्ञान जिसका करण नहीं है ऐसा ज्ञान ही प्रत्यक्षप्रमा है, इस लक्षण के अनुसार स्मृति भी संस्कारजन्य होने से प्रमा कोटि में आवेगी। कारण यह है कि अनुभवरूपज्ञान का संस्कार में ही क्षय हो जाने से वह अनुभवज्ञान, स्मृति का कारण नहीं बन सकता, इसलिए 'ज्ञानाकरणकं ज्ञानं' इस प्रत्यक्ष प्रमालक्षण की स्मृति में अतिव्याप्ति होती है। क्योंकि स्मृति के प्रमा न होने पर भी उसमें प्रत्यक्षप्रमा का लक्षण घटित हो रहा है।
इस दोष का निवारण करने के लिए—'स्मृति का करण अनुभवज्ञान ही है, संस्कार तो उसका अवान्तर व्यापार है। इस व्यापार से युक्त अनुभव में स्मृति की कारणता सिद्ध होने से 'व्यापारवत् असाधारणं कारणं करणम्'—'व्यापार से युक्त जो असाधारण कारण वह करण है' यह करण का लक्षण अनुभव में है, अतः अनुभवज्ञान स्मृति का करण होने से 'ज्ञानाकरणकं' यह लक्षण स्मृति में अतिव्याप्त नहीं है, क्योंकि
२४ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम्
स्मृति, ज्ञान-करणक है। यदि ऐसा कहें तो स्मृतिज्ञान जिसमें करण है ऐसे प्रत्यभिज्ञा प्रत्यक्ष में 'ज्ञानाकरणकं ज्ञानम्' इस लक्षण की अव्याप्ति होती है। 'सोऽयं देवदत्तः' प्रत्यभिज्ञा-प्रत्यक्ष का उदाहरण है।
कारण यह है कि हमारे पक्ष में 'प्रत्यभिज्ञा' प्रत्यक्ष प्रमा है। ओर उसका करण स्मृतिज्ञान है। आप प्रत्यक्षप्रमा का लक्षण कर रहे हैं 'ज्ञानाकरणकं ज्ञानम्', जो प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्ष में घटित नहीं हो सकता। क्योंकि प्रत्यभिज्ञा तो 'ज्ञानकरणक' ही है। ज्ञानाकरणक नहीं।
उपर्युक्त विवेचन से यह सिद्ध हुआ कि प्रत्यक्ष-प्रमा का उपपादन किसी भी लक्षण से नहीं बन सकता। अतः ग्रन्थकार 'प्रत्यक्षप्रमा' शब्द से वेदान्त शास्त्र में क्या विवक्षित है ? उसे 'प्रत्यक्षप्रमाचात्र¹ चैतन्यमेव²' इस वाक्य से बतला रहे हैं। सिद्धान्त में चैतन्य ही प्रत्यक्षप्रमा है। वेदान्त शास्त्र में--ज्ञान, चैतन्य, ब्रह्म, आत्मा, चिति, संविद्, भान इत्यादि शब्द समानार्थक हैं (पर्याय हैं)। प्रमा का अर्थ है ज्ञान का एक प्रकार। अतः प्रत्यक्षप्रमा को चैतन्य शब्द से कहना उचित ही है।
इस विषय में 'यत्साक्षात्' यह श्रुति प्रमाण है। इस श्रुति में 'ब्रह्म' इस विशेष्य के 'साक्षात् और अपरोक्ष' ये दो विशेषण दिये गये हैं। इन्द्रियादि प्रमाणों से अथवा साधनों से ब्रह्म का प्रत्यक्ष नहीं होता, यह बताने के लिए श्रुति में 'साक्षात्' पद दिया गया है। अपरोक्ष प्रमाण से ब्रह्म का साक्षात्कार होता है, ऐसा भ्रम किसी को न हो जाय इसलिए 'अपरोक्ष' पद दिया गया है।
वेदान्त सिद्धान्त में 'चैतन्य ही प्रत्यक्षप्रमा है' इस दिये गये उत्तर पर पुनः शंका--
ननु चैतन्यमनादि तत्कथं चक्षुरादेस्तत्करणत्वेन प्रमाणत्वमिति ।
अर्थ—चैतन्य अनादि (उत्पन्न न होने वाला) अर्थात् अकार्य है। तब चक्षुरादिकों में उनकी कारणता होने से प्रमाणत्व कैसे प्राप्त हो सकता है ?
विवरण—अनादि का अर्थ है कारणरहित; अत एव उत्पन्न न होने वाला, अकार्य। जो नित्य वस्तु है उसके कारण की तो संभावना ही नहीं हो सकती। क्योंकि 'कारण' का अर्थ है विशिष्ट कारण। कार्य को उसकी अपेक्षा रहती है। अकार्य (नित्यपदार्थ) को उसकी अपेक्षा नहीं होती। ऐसी स्थिति में प्रत्यक्ष प्रमा रूप चैतन्य में चक्षुःश्रोत्रादिरूप इन्द्रियाँ प्रमाण (करण) कैसे हो सकती हैं ?
१. अत्र – अद्वैतसिद्धान्ते ।
२. चैतन्यमेव = वृत्तिप्रतिबिम्बितचैतन्यं वृत्त्यभिव्यक्तचैतन्यं वा प्रमा । न तु शुद्धचैतन्यं, तस्य अज्ञानाऽनिवर्तकत्वेन प्रमात्वायोगात् । एवकारेण इन्द्रियजन्यज्ञानादीनां
प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः २५
इस प्रश्न का उत्तर—
उच्यते। चैतन्यस्यानादित्वेऽपि तदभिव्यञ्जकान्तःकरणवृत्ति-रिन्द्रियसन्निकर्षादिना जायते, इति वृत्तिविशिष्टं चैतन्यमादिम^१दित्युच्यते^२। ज्ञानावच्छेदकत्वाच्च वृत्तौ ज्ञानत्वोपचारः। तदुक्तं विवरणे—'अन्तःकरणवृत्तौ ज्ञानत्वोपचारात्' इति ॥
अर्थ—अनादि चैतन्य में करण बनकर चक्षुरादि इन्द्रियों की प्रमाणता बताई जाती है—चैतन्य अनादि (नित्य) होने पर भी उसे अभिव्यक्त करने वाली अन्तःकरणवृत्ति, इन्द्रिय-सन्निकर्षादि निमित्त से ही पैदा होती है। इसी से वृत्तिविशिष्ट-चैतन्य (चिदाभास) आदिमत् (उत्पत्तिमान् = उत्पन्न होनेवाला) है, ऐसा कहा जाता है। वृत्ति को ज्ञान शब्द से क्यों कहा जाता है? उत्तर—अन्तःकरण-वृत्ति को ज्ञानावच्छेदकत्व है। वृत्ति, ज्ञान को मर्यादित (भिन्न) करती है। इसलिए उसमें ज्ञानत्व का उपचार होता है। उस वृत्ति को ही गौणोवृत्ति से 'ज्ञान' कहते हैं। विवरणकार ने भी इस सम्बन्ध में 'अन्तःकरण की वृत्ति में ज्ञानत्व का उपचार होने से' ऐसा कहा है। इसलिए अन्तःकरण-वृत्ति को ही ज्ञान कहते हैं। उसमें ज्ञानत्व का उपचार अर्थात् गौण^३ प्रयोग किया जाता है—अतः यह कथन अनुचित नहीं है।
विवरण—साक्षात् ब्रह्मात्मभूत चैतन्य, अनादि (नित्य) है, इसमें किञ्चित् मात्र भी सन्देह नहीं। तथापि अन्तःकरण-वृत्ति उस नित्य-चैतन्य को अभिव्यक्त करती है। अन्तःकरणवृत्ति में नित्य-चैतन्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है। उसी को 'चिदाभास' कहते हैं। अन्तःकरण की वृत्ति, इन्द्रिय सन्निकर्षादि के कारण प्रतिक्षण उत्पन्न होती रहती है। अर्थात् वह स्वभावतः (स्वाभाविक ही) जन्य है। इस कारण इस जन्य वृत्ति से विशिष्ट (युक्त) चैतन्य हुए को भी आदिमत्व है। अर्थात् वह भी वृत्ति के साथ उत्पन्न होता है—कह सकते हैं। इसलिए चक्षुरादि इन्द्रियों में उस जन्य चैतन्य के प्रति करणत्व प्रतीत होता है। जिससे उन्हें प्रमाण कहा जा सकता है—इस आशय
१. दुच्य-इति पाठान्तरम्।
२. चतुर्भागस्य अन्तःकरणस्य अतिस्वच्छत्वात् चैतन्यं तत्र अभिव्यज्यते। तस्य च अभिव्यक्तचैतन्यस्य एकत्वेऽपि व्यञ्जकान्तःकरणभागभेदात् चतुर्धा व्यपदेशो भवति—प्रमाता, प्रमाणं-प्रमितिः-प्रमेयमिति।
३. चैतन्यस्य स्वरूपतः अजन्यत्वेऽपि वृत्तिचैतन्ययोः। अन्योन्यतादात्म्याध्यासेन वृत्तिधर्मस्य जन्यत्वस्य चैतन्ये अध्यासात् प्रमारूपस्य विषयसंसृष्टवृत्त्यभिव्यक्तचैतन्यस्य गौणं जन्यत्वम्। तथाचोक्तं सिद्धान्तलेशसंग्रहे—"तस्य स्वरूपेण अकार्यत्वेऽपि दृश्यावच्छिन्नरूपेण ब्रह्माकार्यत्वात्।"
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से ग्रन्थकार ने 'उच्यते' कहकर समाधान का आरम्भ किया है। चक्षुरादि इन्द्रियों का अविशिष्ट (शुद्ध) चैतन्य के प्रति करण न बनना हमें इष्ट ही है। क्योंकि अविशिष्ट शुद्ध चैतन्य में स्वयं प्रकाशत्व होता है। इस कारण चैतन्यात्मा में प्रमाण व्यापार की अपेक्षा नहीं होती। अर्थात् स्वयंप्रकाश चैतन्यात्मा की सिद्धि में प्रमाण व्यापार की आवश्यकता नहीं पड़ती। परन्तु अप्रकाश-पदार्थ को साभास अन्तःकरणवृत्तिरूप प्रमाण की अपेक्षा रहती है।
शंका—वृत्ति को ही प्रत्यक्ष-प्रमा क्यों न कहा जाय ? क्योंकि व्यवहार में वृत्ति को ही ज्ञान शब्द से कहा जाता है। और वृत्ति, स्वरूपतः इन्द्रियों से उत्पन्न होती है। तब वृत्ति को प्रत्यक्ष-प्रमा न कहकर, चैतन्य ही प्रत्यक्ष-प्रमा है—ऐसा क्यों कहते हो ?
समाधान—'सत्यं ज्ञानम्' इत्यादि श्रुति से चैतन्य में ही मुख्यज्ञानत्व सिद्ध होता है। वृत्ति, जड़ अन्तःकरण का धर्म होने से जड़ है—इसलिए उसे प्रत्यक्ष-प्रमात्व नहीं है। परन्तु उसमें चैतन्यरूप ज्ञान का अवच्छेदकत्व होने से ज्ञानत्व का उपचार किया जाता है। इसी आशय से ग्रन्थकार ने 'ज्ञानावच्छेदकत्वाच्च' (प्रमाचैतन्योपाधित्वात्) पंक्ति लिखी है।
आप चैतन्य में ही प्रत्यक्ष-प्रमात्व कहते हैं। परन्तु चैतन्य में अनादित्व (नित्यत्व) होने से वह अजन्म है और अजन्म (पैदा न होने वाली) वस्तु को करण की अपेक्षा नहीं होती। जन्य (उत्पन्न होने वाली) वस्तु को ही करण की अपेक्षा हुआ करती है। क्योंकि करण का अर्थ है कारणविशेष अर्थात् एक प्रकार का विशिष्ट कारण। 'कारण', भी कारक ही है। क्रिया को उत्पन्न करने वाले पदार्थ को कारक कहते हैं। इसलिए कारण कहलाने वाले प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा चैतन्य में यदि कोई विशेषता उत्पन्न न की गयी तो उसे कारण कहना व्यर्थ है।' यह उपर्युक्त शंका का आशय है। इस पर समाधान ग्रन्थ का आशय यह है—
'प्रत्यक्ष-प्रमाण के द्वारा अविशिष्ट चैतन्य में कोई विशेष (अतिशय) उत्पन्न न किये जाने पर भी (अतिशय का आधान न करने पर भी) अन्तःकरण-वृत्ति-विशिष्ट चैतन्य में उसके द्वारा अतिशयाधान किया जा सकता है।'
अद्वैत-सम्प्रदाय के प्राचीन विद्वानों ने ऐसा कहीं नहीं कहा है, अतः यह अप-सिद्धान्त है—ऐसा कदाचित् वादी न कहे, एतदर्थ 'तदुक्तम्' इत्यादि ग्रन्थ से 'प्रकाशात्मसंज्ञक' आचार्य ने अपने विवरण ग्रन्थ में 'अन्तःकरण-वृत्ति में ज्ञानत्व का उपचार (प्रमात्व का अध्यास) किया जाता है' ऐसा कहा है। अतः यह अपसिद्धान्त नहीं है। इस पर शंका—
(अन्तःकरणवृत्तिः)
ननु¹ निरवयवस्यान्तःकरणस्य परिणामात्मिका वृत्तिः कथम् !
अर्थ—निरवयव (अवयवशून्य) अन्तःकरण की परिणामात्मक वृत्ति की संभावना कैसे हो सकती है ?
१. अत्र शङ्कते—'विषयसंसृष्ट वृत्त्यवच्छिन्नं चैतन्यं प्रमा' इति यदुक्तं तदयुक्तम्।'
अन्तःकरणस्य सावयवत्वनिरूपणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः २७
विवरण—( प्रतिज्ञा ) अन्तःकरण ( मन ) द्रव्य, परिणामी ( परिणाम को प्राप्त होने वाला ) नहीं है । ( हेतु ) क्योंकि वह निरवयव है । ( दृष्टान्त ) आकाश के समान, ऐसा अनुमान¹ करने से अन्तःकरण की परिणामरूप वृत्ति नहीं हो सकती । दूध से दही की तरह किंवा मिट्टी से घट की तरह यह वृत्ति, परिणाम न होकर सूर्य प्रकाश के समान विकासरूप है । यह कहने पर भी निरवयव वस्तु का आकाश के समान ही विकास रूप परिणाम भी नहीं हो सकता । इसलिए अन्तःकरण-वृत्ति-विशिष्ट चैतन्य को ज्ञान रूप नहीं माना जा सकता । इस कारण ज्ञान, आत्मा से भिन्न ही है और वह इन्द्रियजन्य होने से प्रत्यक्ष है, इस आशय से नैयायिकों ने यह शंका की है । नैयायिक 'ज्ञान' को आत्मा का गुण मानते हैं । किन्तु वेदान्ती वृत्तिविशिष्ट-चैतन्य को जन्य-ज्ञान कहते हैं । यह जन्य-ज्ञान, आत्मा का गुण नहीं है । क्योंकि आत्मा, निर्गुण है । 'ज्ञप्ति-रूप अविशिष्ट ज्ञान,' आत्मा का स्वरूप है । नैयायिकों के मत में अन्तःकरण ( मन ) निरवयव, अणुपरिमाण, एक और नित्य है । वेदान्त-सिद्धान्त में वह सावयव, विरल, सादिद्रव्य है । इसलिए ग्रन्थकार स्वसिद्धान्त के अनुसार नैयायिकों की उपर्युक्त शंका का समाधान करते हैं ।
( कामादीनां मनोधर्मत्वम् )
इत्थम् । न तावदन्तःकरणं निरवयवं, सादिद्रव्यत्वेन सावय-
वत्वात् । सादित्वं च 'तन्मनोऽसृजत' इत्यादिश्रुतेः ! वृत्तिरूपज्ञानस्य
मनोधर्मत्वे च 'कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धा अश्रद्धा धृतिरधृति-
र्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव' ( बृ० १-५-३ ) इति श्रुतिर्मानम्, धी-
शब्देन वृत्तिरूप-ज्ञानाभिधानात् । अत एव कामादेरपि मनोधर्मत्वम् ॥
अर्थ —( सावयव पदार्थ का परिणाम होता है । निरवयव का नहीं । अतः अन्तःकरण तो निरवयव पदार्थ होने से उसकी परिणामात्मक वृत्ति कैसे संभव हो सकती है ? इस प्रश्न पर हम बताते हैं कि वह ऐसे सम्भव हो सकती है ) पहले तो अन्तःकरण निरवयव पदार्थ नहीं है । ( वह तो सावयव है ) क्योंकि उसमें सादिद्रव्यत्व होने से सावयवत्व है । ( सादि = उत्पन्न होने वाला । जो उत्पन्न होने वाला द्रव्य होता है वह सावयव होता है ) उसका सादित्व 'तन्मनः असृजत' उस ब्रह्म ने मन ( अन्तःकरण ) को उत्पन्न किया । इत्यादि श्रुतियों से सिद्ध होता है । और 'अन्तःकरण-वृत्ति रूप ज्ञान'
१. अनुमानप्रयोगः—'अन्तःकरणं न परिणामि, निरवयवत्वात् आकाशवत् ।' किन्तु अत्रानुमाने 'निरवयवत्वं' हेतुः चेतनत्वोपाधिना सोपाधिकः, स्वरूपासिद्धश्च । तथा चानुमानप्रयोगः—
'अन्तःकरणं सावयवं सादित्वेसति द्रव्यत्वात् ।' तथा च सादिद्रव्यत्वेन अन्तःकरणस्य सावयवत्वसिद्धौ निरवयवत्वासिद्धिरिति हेतोः स्वरूपासिद्धत्वं सिद्धं भवति ।
२८ | वेदान्तपरिभाषा | [ कामादीनां मनोधर्मत्वम्
मनोधर्म ( अन्तःकरण का धर्म है ) है । इस विषय में 'काम, संकल्प, विचिकित्सा ( संशय ), श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति ( शिथिल हुए शरीरादि को उत्तेजित करने वाली वृत्ति ) अधृति, लज्जा, धी ( प्रज्ञा ), भय इत्यादि सब मन के ( अन्तःकरण के ) ही रूप हैं ।' यह श्रुति प्रमाण है । ( बृ० उ० १-५-३ ) इस श्रुति-वचन के 'धी' शब्द से वृत्तिरूप ज्ञान कहा गया है । 'कामादि समस्त मन ही है,' यह कहने से कामादि भी मनोधर्म ही हैं ।
विवरण—( प्रतिज्ञा ) अन्तःकरण निरवयव नहीं है । ( हेतु ) क्योंकि वह सादिद्रव्य है । ( दृष्टान्त ) घट के समान । इस अनुमान से आपके पूर्वोक्त अनुमान में 'निरवयवत्वात्' = क्योंकि वह निरवयव है, हेतु 'असिद्ध' ठहरता है । अन्तःकरण के सादित्व से उसके सावयवत्व की सिद्धि होती है ओर सावयवत्व से उसके परिणामित्व की सिद्धि होती है । इस विषय में "( प्रतिज्ञा )—अन्तःकरण परिणामी है । ( हेतु )—कारण वह अन्त्यावयवी ( अन्तिम कार्य ) न होकर सावयव है । ( दृष्टान्त )—मृत्तिका के समान ।" ऐसा अनुमान करना चाहिए । इस प्रकार अन्तःकरण सादिद्रव्य होने से सावयव है । और वह घट की तरह अन्त्यावयविद्रव्य नहीं है । इसलिए उसकी परिणामात्मक वृत्ति हो सकती है । इस कारण—अन्तःकरण वृत्तिविशिष्ट आत्मचैतन्य ही ज्ञान है । उससे भिन्न दूसरा कोई भी ज्ञान नहीं । इस आशय से ग्रन्थकार ने 'इत्थम्' इत्यादि ग्रन्थ से उपर्युक्त शंका का समाधान किया है ।
यहाँ अन्तःकरण का सावयवत्व, अनुमान से सिद्ध करना है, इसलिए वह साध्य है । उसकी सिद्धि में 'सादिद्रव्यत्व के कारण' ( यह ) हेतु दिया है । इसमें 'सादि' विशेषण और 'द्रव्यत्व' विशेष्य है । इनका प्रयोजन ( उपयोग ) बताना ही 'पदकृत्य' कहा जाता हैं । 'द्रव्यत्व के कारण' इतना ही यदि कहा होता तो तार्किकों ने अपने दर्शन के अनुसार हेतु में व्यभिचार दिखाया होता क्योंकि 'आत्मा, आकाश, काल इत्यादि द्रव्य तो हैं किन्तु वे सावयव नही हैं ।' यह व्यभिचार वे न दिखा पावें, एतदर्थ हेतु में 'सादि' विशेषण देने से उनका निवारण हो जाता है ।
शंका--आकाशादि नित्य द्रव्यों में सादित्व न होने से अन्तःकरण का सावयवत्व सिद्ध करने के लिए 'सादित्वात्' हेतु ही पर्याप्त है । पुनः 'द्रव्यत्वात्' विशेष्यांश क्यों दिया गया ?
समाधान—सादि निरवयव गुणों का निवारण करने के लिए विशेष्यांश जोड़ा गया है । रूपादि गुण सादि हैं पर सावयव नहीं हैं ।
शंका—परन्तु अन्तःकरण सादि ( उत्पन्न होने वाला ) द्रव्य है—इस विषय में कोई प्रमाण न होने से 'सादि-द्रव्यत्वात्' हेतु में 'सादि' विशेषण 'असिद्ध' है—यह हेतु विशेषणासिद्ध है ।
समाधान—अन्तःकरण के सादित्व में ( जन्यत्व में ) 'ब्रह्म ने मन (अन्तःकरण) को उत्पन्न किया'—श्रुति प्रमाण है । इस प्रकार अन्तःकरण के सादित्व में श्रुतिप्रमाण बताकर उसके ( अन्तःकरण के ) परिणामित्व में, पूर्वोक्त अनुमान ही केवल प्रमाण न
कामादीनां मनोधर्मत्वम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः २९
होकर भगवती श्रुति भी प्रमाण है। इस आशय से 'कामः संकल्पः' इत्यादि श्रुति का निर्देश किया है।
शंका—इस श्रुतिवचन में 'ज्ञान' शब्द तो कहा नहीं है तब उसके अन्तःकरण-धर्मत्व में श्रुति कैसे प्रमाण हो सकती है ?
समाधान—इस श्रुति में 'धी' शब्द से वृत्तिरूप ज्ञान ही विवक्षित है। 'धी' शब्द का अर्थ वृत्तिरूप ज्ञान होने से उसमें मनोधर्मत्व है।
शंका—( प्रतिज्ञा )—श्रुतिगत 'धी'¹ शब्द-वाच्य ज्ञान, मन का धर्म नहीं है, ( अन्तःकरण उसका उपादान कारण नहीं है )—( हेतु )—क्योंकि उसमें मानस-प्रत्यक्षत्व है ( वह मन, इस अन्तरिन्द्रिय को प्रत्यक्ष ज्ञात होता है )। ( दृष्टान्त )—कामादि अन्य पदार्थों के समान। परन्तु 'उसे अन्तःकरणोपादानक न मानने पर 'सर्वं मन एव' श्रुति से विरोध होगा--यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि उस 'धी' शब्दवाच्य ज्ञान का मनोजन्यत्व है ( वह मन से उत्पन्न होता है ) इस अर्थ में उस श्रुति की व्यवस्था लगाई जा सकती है।
समाधान—'सर्वं मन एव'—कामादि समस्त, मन ही ( अन्तःकरण ही ) है, इस श्रुति में 'कामादि समस्त' और 'मन' का सामानाधिकरण्य है। इस कारण 'मृद्घटः' मृत्तिका ही घट है इस वाक्य के मृत्तिका और घट–इन दो शब्दों के सामानाधिकरण्य से ( एक विभक्ति में होने के कारण ) मृत्तिका उपादान है और घट, कार्य अर्थात् उपादेय है, यह जैसे सिद्ध होता है, उसी तरह 'सर्वं मन एव' इस वाक्य में भी 'धी' शब्दवाच्य ज्ञान में भी अन्तःकरणोपादानकत्व है, यह निश्चित किया जाता है। 'अन्तःकरण उस ज्ञान का उपादान नहीं है, वह मनोजन्य है' यह स्वीकार करने में 'सर्वम्' और 'मनः' शब्दों का सामानाधिकरण्य बाधक है। इसके अतिरिक्त आपने उपर्युक्त अनुमान में 'कामादि अन्य पदार्थों के समान' दृष्टान्त दिया है। परन्तु यह दृष्टान्त साध्यविकल है। 'ज्ञान का अन्तःकरणोपादानकत्व न रहना' साध्य है। उसमें कामादि को तो अन्तःकरणोपादानकत्व ही है, तदनुपादानकत्व नहीं है। इसलिए 'कामादिक' साध्य से विकल ( शून्य ) हैं। इस आशय से ग्रन्थकार कहते हैं—'अत एव' उस कारण ही अर्थात् 'सर्वं मन एव' ऐसी सामानाधिकरण्यश्रुति होने से ही श्रुत्युक्त कामादि समस्त वृत्तियों में मनोधर्मत्व है। वे सब वृत्तियाँ अन्तःकरणोपादानक हैं। अब श्रुत्युक्त कामादिकों में भी अन्तःकरणोपादानकत्व ( मनोधर्मत्व ) है—इस सिद्धान्त पर शंका—
१. 'धी'-शब्दवाच्यं ज्ञानं, अन्तःकरणोपादानकं न भवति, मानसप्रत्यक्षत्वात् कामादिवत्।'
अत्र दृष्टान्तः साध्यविकलः। ज्ञाने अन्तःकरणोपादानकत्वाभाववत्त्वस्य साध्यत्वात्। कामादीनां तु अन्तःकरणोपादानकत्वमेवेति।
३० | वेदान्तपरिभाषा | [ कामादीनां मनोधर्मत्वम् ]
ननु कामादेरन्तःकरणधर्मत्वेऽहमिच्छाम्यहंजानाम्यहं बिभेमीत्या-
द्यनुभव आत्मधर्मत्वमवगाहमानः कथमुपपद्यते ?
अर्थ—'काम, संकल्प, संशय आदि अन्तःकरण के धर्म हैं—कहने पर 'मैं इच्छा करता हूँ, मैं जानता हूँ, मैं डरता हूँ, इत्यादि आत्मधर्मत्व को विषय करने वाला ( इच्छा, ज्ञान, भय, ये सब अहं शब्द-वाच्य आत्मा के धर्म हैं इस प्रतीति का विषय होने वाला ) अनुभव कैसे उपपन्न होता है ?
विवरण—'मैं इच्छा करता हूँ, मैं जानता हूँ', ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव होते रहने से काम, संकल्प, ज्ञान इत्यादि सब आत्मा के धर्म हैं, अन्तःकरण के नहीं। यह सिद्ध होता है, क्योंकि 'अहम्'—मैं अर्थात् आत्मा। अहंकार को बिना विषय किये आत्मा का अनुभव कभी नहीं होता। सोने के बाद जागने पर 'मैं सुखपूर्वक सोया' यह स्मरण होने से सुषुप्ति में भी अहंकार का भान होता है ऐसा मानना पड़ता है। परन्तु कामादि को अन्तःकरण का धर्म मानने पर 'मैं इच्छा करता हूँ' इस प्रत्यक्ष अनुभव से विरोध आता है। प्रत्यक्ष अनुभव, श्रुति से भी प्रबल है। क्योंकि वह ज्येष्ठ ( सब प्रमाणों से पहिले उपस्थित होनेवाला, सब ज्ञान और ज्ञानकरणों का कारण ) है। इसलिए 'मैं इच्छा करता हूँ', 'मैं जानता हूँ' इस प्रत्यक्ष अनुभव से विरोध न हो एतदर्थ कामादिकों को आत्मधर्म ही मानना चाहिए, उन्हें अन्तःकरणधर्म मानना उचित नहीं। अतः अन्तः-करण, कामादिकों में निमित्त है, उपादान नहीं। यह—इस शंका का आशय है।
उच्यते। अयःपिण्डस्य दग्धृत्वाभावेऽपि दग्धृत्वाश्रय-वह्नि-
तादात्म्याध्यासात् यथा अयोदहतीति व्यवहारस्तथा सुखाद्याकार-
परिणाम्यन्तःकरणैक्याध्यासात् अहं सुखी दुःखीत्यादिव्यवहारः¹ ॥
अर्थ—( उपर्युक्त शंका का समाधान किया जाता है ) कामादिकों को किस प्रकार मनोधर्मत्व है उसे बताते हैं—लोहे के गोले में दग्धृत्व ( दाह करने का सामर्थ्य ) न होने पर भी दग्धृत्व धर्म से युक्त हुए ( दग्धृत्व धर्म का आश्रय ) अग्नि के तादात्म्य का अध्यास होने से 'यह लोहा ( लोहे का गोला ) जला रहा है' ऐसा व्यवहार जिस तरह होता है, उसी तरह सुखादि आकारों में परिणत हुए अन्तःकरण से आत्मा के ऐक्य का अध्यास होने पर 'मैं सुखी, मैं दुःखी' इत्यादि व्यवहार होता है।
**विवरण—**यदि कामादि, अन्तःकरण के ही धर्म हैं तो 'मैं इच्छा करता हूँ' इत्यादि शब्द-व्यवहार कैसे होता है ? सुखादि विषयों के आकार में परिणत (विकसित) हुए अन्तःकरण के साथ आत्मा का ऐक्याध्यास (तादात्म्य) हो जाने से वैसा व्यवहार होता है। अर्थात् सब प्रमाणों में प्रत्यक्ष प्रमाण की प्रथमता होने से ही वह
१. रो जायते-इति पाठान्तरम् ।
मनसः इन्द्रियत्वखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ३१
श्रुति से प्रबल नहीं ठहरता। क्योंकि 'यह रजत है' ऐसा भ्रमज्ञान यद्यपि प्रथमतः होता है तथापि 'यह रजत नहीं, शुक्तिका है' आगे होने वाले इस सम्यक् ज्ञान से वह बाधित होता है। उसी तरह प्रत्यक्ष, अन्य प्रमाणों का उपजीव्य (कारण) होने से प्रबल है, यह सच होने पर भी वह प्रत्यक्ष, जिस व्यावहारिक प्रामाण्य से श्रुति का उपजीव्य होता है, उसके उस व्यावहारिक प्रामाण्य का बाध श्रुति नहीं करती। श्रुति तो केवल उसके तात्त्विक प्रामाण्य का ही बाध करती है।
कामादि वृत्तियों का अन्तःकरणधर्मत्व-बोधन कराने में ही प्रकृत श्रुति का तात्पर्य है। इसलिए 'मैं इच्छा करता हूँ' इत्यादि प्रत्यक्ष अनुभव का बाध करके ही कामादिक मनोधर्म हैं ऐसा समझना चाहिए।
व्यवहार में प्रत्यक्ष प्रमाण, श्रुति की अपेक्षा प्रबल है, परन्तु परीक्षित (प्रमाण से निरूपित किये हुए) प्रत्यक्ष का प्राबल्य है। 'मैं इच्छा करता हूँ' इत्यादि प्रत्यक्ष-अनुभव के प्रमाणों से निरूपण कर कामादिकों को आत्मधर्मत्व सिद्ध नहीं हुआ है। क्योंकि आप जैसा कह रहे हैं उस तरह 'आत्मा' अहं पदवाच्य नहीं है (अहं शब्द का अर्थ आत्मा नहीं है) क्योंकि सुषुप्ति में 'अहम्' इत्याकारक अनुभव नहीं हुआ करता। किन्तु 'मैं सुख से सोया था' यह चैतन्य-अंश में स्मरण है, और अन्तःकरण-अंश में अनुभव है। इस कारण अन्तःकरण और चैतन्य का परस्पर विवेक न होने से (वे दो भिन्न पदार्थ हैं यह ज्ञान न होने से) मैं दुःखी, मैं सुखी, मैं चाहता हूँ इत्यादि अनुभव, स्वरूप-चैतन्य के अज्ञान से अन्तःकरण में होने वाला तादात्म्य-भ्रम है। लोहा पार्थिव पदार्थ होने से उसका स्पर्श अनुष्णाशीत है। परन्तु उसे अग्नि में तप्त करने पर यदि स्पर्श किया जाय तो हाथ जलता है। किन्तु 'हाथ जलाना रूप दग्धृत्व' वस्तुतः लोहे का धर्म न होकर, अग्नि का है। तथापि 'इस लोहे से मेरा हाथ जल गया' यह शब्द व्यवहार होता है। क्योंकि अनुष्णाशीत लोहे का गोला और दाहक अग्नि का तादात्म्य होने से 'लोहे से ही हाथ जला' यह भ्रम होता है। इसी तरह 'मैं इच्छा करता हूँ' इत्यादि शब्द-व्यवहार कामसुखादि विषयाकार से परिणत होने वाले अन्तःकरण का चैतन्यरूप आत्मा से तादात्म्य हो जाने से होता है, परन्तु वह भ्रामक है। इस कारण 'मैं इच्छा करता हूँ' इस अपरीक्षित प्रत्यक्ष-प्रमाण से पूर्वोक्त श्रुति का बाध नहीं होता। इसलिए 'कामादि सब मन ही है' यह श्रुति कामादिकों के मनोधर्म होने में प्रमाण है। परन्तु लोहा और अग्नि की तरह आत्मा और अन्तःकरण के तादात्म्याध्यास का सम्भव ही नहीं होता, यह शंका करते हैं—
(मनसोऽनिन्द्रियत्वनिरूपणम्)
नन्वन्तःकरणस्येन्द्रियतयाऽतीन्द्रियत्वात् 'कथमहमिति प्रत्यक्षविषयतेति।
१. कथं प्रत्यक्षविषयतेति—पाठान्तरम्।
३२ वेदान्तपरिभाषा [ मनसः इन्द्रियत्वखण्डनम्
अर्थ-- अन्तःकरण के इन्द्रियत्व होने से (अर्थात् अन्तःकरण इन्द्रिय होने से) वह अतीन्द्रिय है (इन्द्रिय का विषय नहीं होता) कोई भी इन्द्रिय, प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देती तब उसे 'अहम्' इस प्रकार इन्द्रिय-विषयत्व कैसे? ('मैं' इस प्रकार प्रत्यक्ष अनुभव कैसे होता है)।
विवरण-- अग्नि और लोहे का गोला दोनों के प्रत्यक्ष होने से उनका परस्पर तादात्म्याध्यास होकर लोहा 'जलाता है' यह भ्रामक व्यवहार हो सकता है। परन्तु आत्मा और अन्तःकरण में से आत्मा, प्रत्यक्षविषय और अन्तःकरण, प्रत्यक्षाविषय (अतीन्द्रिय) है। तब प्रत्यक्षविषय आत्मा और अतीन्द्रिय अन्तःकरण का तादात्म्याध्यास कैसे हो सकेगा? और जब तादात्म्याध्यास का ही संभव नहीं तब 'मैं इच्छा करता हूँ' यह भ्रामक व्यवहार भी कैसे होगा?
'अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य' यह 'अहं' शब्द का अर्थ होना संभव नहीं। क्योंकि अन्तःकरण 'इन्द्रिय' है, और इन्द्रिय, अतीन्द्रिय होती है। इसलिए वह अन्तःकरण, प्रत्यक्षप्रमा का विषय नहीं बन सकता। इस विषय में अनुमान^१ इस प्रकार किया जाता है—
(प्रतिज्ञा)—अन्तःकरण अतीन्द्रिय है। (हेतु)—क्योंकि वह इन्द्रिय है। (दृष्टान्त)—चक्षुःश्रोत्रादि इन्द्रियों के समान। इस आशय से वादी के शंका करने पर समाधान—
उच्यते। न तावदन्तःकरणमिन्द्रियमित्यत्र मानमस्ति। 'मनः षष्ठानीन्द्रियाणि' इति भगवद्गीतावचनं प्रमाणमिति चेत् न। अनिन्द्रियेणाऽपि मनसा षट्त्वसङ्ख्यापूरणाविरोधात्। न हीन्द्रियगतसङ्ख्यापूरणमिन्द्रियेणैवेति नियमः। 'यजमानपञ्चमा इडां भक्षयन्ति' इत्यत्र ऋत्विग्गतपञ्चत्वसङ्ख्याया अनृत्विजाऽपि यजमानेन पूरणदर्शनात्। वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान्' इत्यत्र^२ वेदगतपञ्चत्वसङ्ख्याया अवेदेनापि महाभारतेन पूरणदर्शनात्। 'इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः' (का० १-३-१०) इत्यादिश्रुत्या मनसोऽनिन्द्रियत्वावगमाच्च।
अर्थ— (उपर्युक्त शंका का समाधान कहते हैं—'अन्तःकरण इन्द्रिय है' तुम्हारे इस
१. अनुमान प्रयोग:—
'अन्तःकरणम् अतीन्द्रियम् इन्द्रियत्वात् चक्षुरादिवत्'
२. त्यादौ–इति पाठान्तरम्।
मनसः इन्द्रियत्वखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ३३
इस कथन में पहिले तो कोई प्रमाण नहीं है।$^१$ 'जीव, मृत्यु के समय मन जिनमें छठवाँ है ऐसी इन्द्रियों का आकर्षण करता है'—गीता के पन्द्रहवें अध्याय का भगवान् का यह वचन ही मन के (अन्तःकरण के) इन्द्रियत्व में प्रमाण है—यह कहो तो ठीक नहीं है। क्योंकि इन्द्रिय न होकर भी मन से इन्द्रियों की छठी संख्या की पूर्ति करने में कोई विरोध नहीं है। क्योंकि इन्द्रियों की संख्या-पूर्ति इन्द्रिय से ही करने का कोई नियम नहीं है। इसी कारण 'यजमान जिनमें पाँचवाँ है ऐसे ऋत्विज, इडा का भक्षण करते हैं'$^१$ इस श्रौत (वैदिक) वचन में ऋत्विजों की पांचवीं संख्या ऋत्विजों से भिन्न यजमान के द्वारा भी पूर्ण की हुई दिखाई देती है। इसी तरह 'महाभारत जिसमें पाँचवाँ है ऐसे वेदों को पढ़ाया' इस स्मृतिवाक्य में भी वेदों की पांचवीं संख्या वेद से भिन्न महाभारत के द्वारा पूर्ण की हुई दिखाई देती है। इसी तरह 'इन्द्रियों से वासना- त्मक अर्थ परे है, उस वासनात्मक अर्थ से मन परे' है। इत्यादि श्रुति से भी मन का इन्द्रिय न होना ज्ञात होता है।
विवरण--'अन्तःकरण, इन्द्रिय होने से वह प्रत्यक्ष ज्ञान का विषय नहीं है' वादी के इस कथन का उत्तर हम इस प्रकार देते हैं—अन्तःकरण (मन) के अन्तरिन्द्रिय होने में कोई प्रमाण नहीं है। जब कि वह इन्द्रिय ही नहीं तब उसका अतीन्द्रियत्व कैसे सिद्ध हो सकता है। अतः अन्तःकरण प्रत्यक्ष-विषय नहीं होता, यह कथन अनुचित है। इसी बात को 'न तावद्' इत्यादि ग्रन्थ से सूचित किया है।
वादी की पुनः शंका--'मनः षष्ठानीन्द्रियाणि०' मन जिनमें छठा है ऐसी इन्द्रियों का जीव आकर्षण करता है—इत्यादि भगवद्-वाक्य मन के इन्द्रिय होने में प्रमाण है।
समाधान--इन्द्रियों की षष्ठ—संख्यापूर्ति अनिन्द्रिय 'मन' से भी की जा सकती है। अतः वादी के द्वारा प्रदर्शित भगवद् वाक्य से कोई विरोध नहीं है। भगवद्-वाक्य का तात्पर्य मन को इन्द्रियत्व बताने में ही नहीं है। मन को इन्द्रिय बताने वाली कोई श्रुति भी नहीं है। 'मेरा मन' इस अनुभव से भी मन का अनिन्द्रियत्व सिद्ध होता है।
इस पर भी मन का इन्द्रियत्व सिद्ध करने के लिए यदि आप अनुमान$^२$—प्रमाण को
१. सिद्धेन हेतुना साध्यं साधनीयं भवति। अत्र तु सिद्धेन इन्द्रियत्व-हेतुना अन्तः- करणस्य अतीन्द्रियत्वं साधनीयं, न असिद्धेन। अत्र च हेतुरेव असिद्धः।
२. यद् यद्गतसंख्यापूरकं तत् तज्जातीयमितिनियमेन मनस इन्द्रियगतसंख्यापूरकत्व- मिन्द्रियत्वं विना अनुपपन्नमिति इन्द्रियत्वं कल्पयति। अतो मनस इन्द्रियत्वे अर्थापत्तिः प्रमाणम्। तथाऽनुमानमपि—'मनः, इन्द्रियम्, इन्द्रियगतसंख्यापूरकत्वात्, यन्नैवं तन्नैवमिति।
किन्तु उक्तनियमस्य अनैकान्तिकत्वम्, अनुमानस्य च अप्रयोजकत्वं वर्तते। नियमव्य- भिचारो यथा—'यजमानपञ्चमा इडां भक्षयन्ति'—इति श्रुत्या यजमानसहितानां चतुर्णां- मृत्विजामिडाभक्षणं विधीयते। तत्र यजमानो यदि ऋत्विक् स्यात्, ऋत्विजामिडाभक्ष-
३४ वेदान्तपरिभाषा [ मनसः इन्द्रियत्वखण्डनम्
उपस्थित करें—'( प्रतिज्ञा ) मन इन्द्रिय है, ( हेतु ) इन्द्रियों की संख्या का पूरक होने से' तो इसमें हेतु प्रयोजक ( साध्य साधन में असमर्थ ) है । क्योंकि अनिन्द्रिय मन से भी इन्द्रियों की संख्यापूर्ति की जा सकती है ।
शिवाय उपर्युक्त अनुमान में 'जो इन्द्रियगत संख्यापूरक हो इन्द्रिय है' यह विशेष व्याप्ति, उसका ( अनुमान का ) मूल है, अथवा 'जो जिसका संख्यापूरक हो वह उसकी जाति का होता है' यह सामान्य व्याप्ति, उसका ( अनुमान का ) मूल है, ऐसा विकल्प करते हैं, किन्तु यहाँ दोनों पक्ष सम्भव नहीं हैं, इस आशय से सिद्धान्ती का कथन है कि ' इन्द्रियगत संख्या की पूर्ति इन्द्रिय से ही की जाय' ऐसा नियम न होने से विशेष व्याप्ति का यहाँ सम्भव नहीं है क्योंकि ऐसा दृष्टान्त कहीं दिखाई नहीं देता ।
इसी तरह पूर्वोक्त सामान्य व्याप्ति भी उपर्युक्त अनुमान में मूल नहीं है—क्योंकि 'यजमान जिसमें पांचवां है ऐसे ऋत्विज इडा भक्षण करते हैं, इस उदाहरण में 'ऋत्विजों की पञ्च-संख्या का पूरक यजमान है, परन्तु वह ऋत्विक् नहीं है । इस कारण 'जो जिनकी संख्या का पूरक होता है वह उनकी जाति का होता है' यह सामान्य व्याप्ति भी यहाँ घटित नहीं होती । इस प्रकार श्रौत उदाहरणों में व्याप्ति का भंग दिखलाकर सिद्धान्ती स्मार्त्त-उदाहरण में भी उसका भंग दिखाता है—'महाभारत जिसमें पांचवां है ऐसे वेद को अध्यापक ने पढ़ाया' उदाहरण में वेदगत पंचत्व ( पाँच ) संख्या जिस महाभारत के योग से पूर्ण होती है वह इतिहास नाम से प्रसिद्ध महाभारत पौरुषेय ( व्यास रचित ) होने से अपौरुषेय वेद की कोटि में नहीं है । जैसे 'मैं नक्षत्रों में चन्द्र हूँ' यह वचन चन्द्र के नक्षत्र होने में प्रमाण नहीं, वैसे ही 'इन्द्रियों में मन मैं हूँ' यह वचन भी मन के इस इन्द्रिय होने में प्रमाण नहीं है ।
शंका—मन के इन्द्रिय होने में बाधक प्रमाण तो कोई है नहीं ।
उत्तर—'इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः' यह श्रुति 'इन्द्रियों से पर विषय ( सूक्ष्म ), व्यापक और नित्य विषयों से मन पर है' बताकर मन के अनिन्द्रियत्व का बोधन कराती है । अतः मन के इन्द्रिय होने में बाधक प्रमाण नहीं है यह कथन अनुचित है । उसके इन्द्रियत्व की बाधक प्रत्यक्ष श्रुति ही प्रमाण है ।
शंका—'इन्द्रियेभ्यः पराः०' इस श्रुति का अर्थ इस प्रकार भी संभव हो सकता है— मन इन्द्रिय को छोड़कर अन्य सब इन्द्रियों से अर्थ पर है, और मन-इन्द्रिय उन अर्थों से
णेनैव तस्यापि तत् प्राप्तमिति 'यजमानपञ्चमा' इति नोक्तं स्यात्, किन्तूच्यते । तस्मात् ज्ञायते—यजमानो न ऋत्विक् इति । तेन अनृत्विजापि यजमानेन तथा ऋत्विग्गतसंख्यापूरणं, तथैवानिन्द्रियेणाऽपि मनसा इन्द्रियगतसंख्यापूरणम् । एवञ्चात्र नियमस्य व्यभिचरितत्वात् न तेन मनसः इन्द्रियत्वसिद्धिः ।
मनसः इन्द्रियत्वखण्डनम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ३५
( विषयों से ) भी पर है । अतः 'मन विषयों से पर है' इतना कह देने मात्र से वह इन्द्रिय नहीं है, यह सिद्ध नहीं होता ।
समाधान—उपर्युक्त 'इत्यादिश्रुत्या' इस वाक्य के आदि शब्द से 'एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च' ( मुं० २।१।३ ) इस पुरुष से प्राण, मन, सब इन्द्रियाँ, आकाश इत्यादि उत्पन्न होते हैं' इस श्रुति का ग्रहण किया गया है। इसलिए आदि शब्द से गृहीत इस श्रुति से एक वाक्यता को प्राप्त होकर 'इन्द्रियों से पर रहनेवाले विषयों से मन पर है' यह श्रुति मन के अनिन्द्रियत्व का बोधन कराती है । तस्मात् मन ( अन्तःकरण ) को इन्द्रियत्व नहीं है । अर्थात् मन इन्द्रिय नहीं है ।
मन की इन्द्रियता मुख्य न होकर गौणरूप से मानी जा सकती है, इससे उसकी प्रत्यक्ष प्रतीति का भी बाध नहीं होगा । 'वेदानध्यापयामास' इस वाक्य में महाभारत भी सकल वेदार्थ प्रतिपादक होने से गौणरूप से वेद है, यह स्वीकार करना चाहिए । इस पर सिद्धान्ती, तार्किकों की एक शंका का अनुवाद करके इसका समाधान करता है ।
न चैवं मनसोऽनिन्द्रियत्वे सुखादिप्रत्यक्षस्य साक्षात्त्वं न ^१स्यादिन्द्रियाजन्यत्वादिति वाच्यम् । ^२न हीन्द्रियजन्यत्वेन ज्ञानस्य साक्षात्त्वम्, अनुमित्यादेरपि मनोजन्यतया साक्षात्त्वापत्तेः, ईश्वरज्ञानस्यानिनिन्द्रियजन्यस्य^३ साक्षात्त्वानापत्तेश्च ॥
अर्थ—मन की इन्द्रियता को स्वीकार न करने पर सुखादिकों के प्रत्यक्ष अनुभव की प्रत्यक्षता नहीं बन सकेगी, क्योंकि वह इन्द्रिय से जन्य नहीं है । परन्तु यह कहना उचित नहीं है, कारण ज्ञान को इन्द्रिय-जन्यत्व होने से ( ज्ञान इन्द्रियों से उत्पन्न होता है इसलिये ) उसका साक्षात्त्व ( प्रत्यक्षत्व ) है, यह नहीं कहा जा सकता । इन्द्रियजन्य होने से ज्ञान का साक्षात्त्व ( प्रत्यक्षत्व ) यदि स्वीकार किया जाय तो अनुमितिज्ञान, उपमितिज्ञान इत्यादि अन्य ज्ञान भी मन से ही उत्पन्न होने से उन्हें भी साक्षात्त्व ( प्रत्यक्षज्ञान ) कहना होगा । और ईश्वर का ज्ञान इन्द्रियजन्य न होने से उसे साक्षात्त्व नहीं है यह कहना होगा । ईश्वर का ज्ञान इन्द्रियों से पैदा न होने से उसे साक्षात्त्व की
१. "इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्" इति न्यायसूत्रात् प्रत्यक्षत्वे इन्द्रियजन्यत्वं प्रयोजकम् । अतो मनस अनिन्द्रियत्वाभ्युपगमे तज्जन्यसुखादिज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वं न भवेत्, यतो हि कारणाभाव एव कार्याभावे हेतुरितिनियमादिति शङ्काकर्तुर्नैयायिकस्याशयः।
२. अनुमित्यात्मकस्य ज्ञानस्य मनोरूपेन्द्रियजन्यत्वेऽपि अप्रत्यक्षत्वमिति प्रत्यक्षे इन्द्रियजन्यत्वम्प्रयोजकं नास्ति, इति सिद्धान्तिन आशयः।
३. 'तया'-इति पाठान्तरम् ।
३६ | वेदान्तपरिभाषा | [ मानसः इन्द्रियत्वखण्डनम्
अनापत्ति ( अप्राप्ति ) होगी । ( परन्तु अनुमित्यादि अप्रत्यक्ष ज्ञानों को प्रत्यक्षत्व प्राप्त होना और ईश्वरज्ञान का साक्षात्त्व नष्ट होना, ये दोनों अनिष्ट हैं ) ।
विवरण— 'इन्द्रियजन्य ज्ञान को तो प्रत्यक्षत्व है परन्तु मन में इन्द्रियत्व नहीं है' ऐसा कहने से सुखदुःखादि का प्रत्यक्षत्व नहीं है यह सिद्ध होगा । क्योंकि मन तो इन्द्रिय नहीं है और सुख-दुःखादि का ज्ञान उसी से होता है तब अनिन्द्रियमनोजन्य सुख-दुःखादिकों के अनुभव की प्रत्यक्षता कैसे बन सकेगी । परन्तु सुखादिकों की तो प्रत्यक्ष-रूपेण उपलब्धि होती है अतः उनके प्रत्यक्षत्व की सिद्धि के लिये मन का इन्द्रियत्व अवश्य स्वीकार करना होगा । यह शंका 'इन्द्रियजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्' ( इन्द्रिय से उत्पन्न होने वाले ज्ञान को प्रत्यक्ष कहते हैं ) प्रत्यक्ष ज्ञान का इस प्रकार लक्षण करने वाले तार्किकों की है । उसका अनुवाद करके सिद्धान्ती—
समाधान— ज्ञान की प्रत्यक्षता में इन्द्रियजन्यत्व प्रयोजक ( निमित्त ) नहीं है । अतः 'सुखादिकों के साक्षात् अनुभव में इन्द्रियजन्यत्व न होने से उसे साक्षात्त्व नहीं है, यह कहना ठीक नहीं है ।
प्रश्न— प्रत्यक्षत्व में इन्द्रियजन्यत्व को प्रयोजक मानने में क्या बाधक है ?
उत्तर— तार्किक लोग मन को अन्तरिन्द्रिय कहते हैं और ज्ञान की प्रत्यक्षता में 'इन्द्रियजन्यत्व' को प्रयोजक मानते हैं । परन्तु सुखादिज्ञानों की प्रत्यक्षता सिद्ध करने के लिए उपर्युक्त प्रयोजक के अनुसार मन में इन्द्रित्व है तो मनोजन्य अनुमिति, उपमिति इत्यादि अन्य ज्ञान भी प्रत्यक्ष हैं ऐसा कहने का प्रसंग आवेगा । यही प्रत्यक्षत्व में इन्द्रियजन्यत्व को प्रयोजक मानने में बाधक है ।
इन्द्रियत्वरूप से इन्द्रियजन्यत्व, प्रत्यक्षता में प्रयोजक है और अनुमिति, उपमिति आदि ज्ञानों में मनस्त्वेन रूप से इन्द्रियजन्यत्व है, इस कारण ऐसा अतिप्रसंग ( अति-व्याप्ति ) नहीं हो पाता । ऐसा यदि आप कहें तो 'ईश्वर का ज्ञान' इन्द्रियजन्य न होने से उसे साक्षात्त्व नहीं है, यह कहने का प्रसंग आवेगा, अर्थात् आप का बताया हुआ 'प्रत्यक्षत्वप्रयोजक' ईश्वरज्ञान में अव्याप्त रहेगा । अथवा 'इन्द्रियजन्यत्व' का अर्थ 'इन्द्रियसन्निकर्षजन्यत्व' विवक्षित करेंगे तो अनुमिति आदि प्रमाएँ इन्द्रियसन्निकर्षजन्य न होने से प्रत्यक्षप्रयोजक का लक्षण अतिव्याप्त नहीं हो सकेगा । 'ईश्वर का ज्ञान अजन्य और प्रत्यक्षरूप है' यह कथन सर्वसम्मत नहीं है । अद्वैती उसे मायाजन्य मानते हैं । तथापि 'वह इन्द्रियजन्य नहीं' यह सर्वसम्मत है । तस्मात् मन के इन्द्रियत्व में कोई प्रमाण नहीं है, प्रत्युत बाधक प्रमाण हैं । इसलिए 'मन' इन्द्रिय नहीं है, इसी कारण 'मैं इच्छा करता हूँ'—इत्यादि अनुभव में अन्तःकरण का प्रत्यक्ष संभव होता है ।
इस प्रकार सिद्धान्ती के द्वारा तार्किकों के अभिमत प्रत्यक्षत्वप्रयोजक का निरसन किये जाने पर सिद्धान्तपक्ष में भी दूसरा प्रत्यक्षत्वप्रयोजक नहीं बन सकता, यह समझने-वाले तार्किक का आक्षेप—
प्रत्यक्षलक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ३७
सिद्धान्ते १प्रत्यक्षत्वप्रयोजकं किमिति चेत्, किं ज्ञानगतस्य प्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजकं पृच्छसि किं वा विषयगतस्य ? आद्ये प्रमाणचैतन्यस्य विषयावच्छिन्नचैतन्याभेद इति ब्रूमः । तथा हि त्रिविधं चैतन्यं २विषयचैतन्यं प्रमाणचैतन्यं प्रमातृचैतन्यं चेति । तत्र घटाद्यवच्छिन्नं चैतन्यं विषयचैतन्यम्, अन्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्नं चैतन्यं प्रमाणचैतन्यम्, अन्तःकरणावच्छिन्नं चैतन्यं प्रमातृचैतन्यम् ॥
अर्थ— ( इन्द्रियजन्यत्व यदि प्रत्यक्षता में प्रयोजक नहीं है तो ) आप के सिद्धान्त में भी प्रत्यक्षत्व का क्या प्रयोजक है ? इस प्रकार तार्किक के द्वारा पूछे जाने पर सिद्धान्ती प्रश्न को स्पष्ट कराने के लिए तार्किकों से ही प्रश्न करता है—हम (सिद्धान्ती) तुमसे पूछते हैं कि तुम ज्ञानगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक पूछ रहे हो, या विषयगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक पूछ रहे हो ? ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक यदि पूछो तो प्रमाणचैतन्य का विषयावच्छिन्न चैतन्य से अभेद ( तादात्म्य, ऐक्य ) होना, ज्ञानगत प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक है—ऐसा हम कहते हैं । ( परन्तु एक ही अद्वितीय चैतन्य का भेद कैसे संभव होता है ? उत्तर—वास्तव में चैतन्य के एक होने पर भी उसका उपाधि के कारण इस प्रकार भेद होता है ) तथाहि—चैतन्य त्रिविध है—एक विषय चैतन्य, दूसरा प्रमाण चैतन्य व तीसरा प्रमातृचैतन्य । इन तीन प्रकार के चैतन्यों में से घटादि विषयों से अवच्छिन्न ( मर्यादित ) हुआ चैतन्य–विषयचैतन्य, अन्तःकरण की वृत्ति से अवच्छिन्न हुआ चैतन्य–प्रमाणचैतन्य, और अन्तःकरणावाच्छिन्न हुआ चैतन्य–प्रमातृचैतन्य है ।
**विवरण—**प्रत्यक्ष प्रमा का प्रयोजक ( कारण ) कोई तो अवश्य ही होगा । इन्द्रिय-
१. 'प्रत्यक्ष' शब्दस्य व्यवहारो प्रत्यक्षात्मके ज्ञाने, तद्विषये, तत्प्रमाणे चोपलभ्यते, प्रत्यक्षं ज्ञानम्, प्रत्यक्षो विषयः, प्रत्यक्षम्प्रमाणमिति । तेषु प्रमाणगतस्य प्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजकं प्रत्यक्षप्रमाकरणत्वम् । तस्य प्रसिद्धत्वात् प्रागुक्तत्वाच्च तन्नैव जिज्ञास्यम् । ज्ञानगतस्य विषयगतस्य च प्रत्यक्षत्वस्य प्रयोजकं नैकं, किन्तु भिन्नम् । अतः तयोः कतरत् तव जिज्ञास्यमिति विभज्य पृच्छति ? इति सिद्धान्तिन आशयः ।
नैयायिकास्तावत् इन्द्रियजन्यत्वं ज्ञानगतप्रत्यक्षत्वे प्रयोजकम्, प्रत्यक्षज्ञानविषयत्वञ्च विषयगतप्रत्यक्षत्वे प्रयोजकम् इत्याहुः ।
वेदान्तिनस्तु प्रत्यक्षज्ञानविषयत्वरहितं स्वतोऽपरोक्षरूपं कञ्चन साक्षिणं मन्यन्ते । अतस्तस्य प्रत्यक्षत्वं न तद्विषयत्वप्रयुक्तम्, किन्तु अन्यप्रयुक्तमिति प्रयोजकद्वयजिज्ञासा समुचितेतिभावः ।
२. प्रमातृचैतन्यं प्रमाणचैतन्यं विषयचैतन्यं चेति । पाठान्तरम् ।