वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २६ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमाल्लक्षणम् |
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से ग्रन्थकार ने 'उच्यते' कहकर समाधान का आरम्भ किया है। चक्षुरादि इन्द्रियों का अविशिष्ट (शुद्ध) चैतन्य के प्रति करण न बनना हमें इष्ट ही है। क्योंकि अविशिष्ट शुद्ध चैतन्य में स्वयं प्रकाशत्व होता है। इस कारण चैतन्यात्मा में प्रमाण व्यापार की अपेक्षा नहीं होती। अर्थात् स्वयंप्रकाश चैतन्यात्मा की सिद्धि में प्रमाण व्यापार की आवश्यकता नहीं पड़ती। परन्तु अप्रकाश-पदार्थ को साभास अन्तःकरणवृत्तिरूप प्रमाण की अपेक्षा रहती है।
शंका—वृत्ति को ही प्रत्यक्ष-प्रमा क्यों न कहा जाय ? क्योंकि व्यवहार में वृत्ति को ही ज्ञान शब्द से कहा जाता है। और वृत्ति, स्वरूपतः इन्द्रियों से उत्पन्न होती है। तब वृत्ति को प्रत्यक्ष-प्रमा न कहकर, चैतन्य ही प्रत्यक्ष-प्रमा है—ऐसा क्यों कहते हो ?
समाधान—'सत्यं ज्ञानम्' इत्यादि श्रुति से चैतन्य में ही मुख्यज्ञानत्व सिद्ध होता है। वृत्ति, जड़ अन्तःकरण का धर्म होने से जड़ है—इसलिए उसे प्रत्यक्ष-प्रमात्व नहीं है। परन्तु उसमें चैतन्यरूप ज्ञान का अवच्छेदकत्व होने से ज्ञानत्व का उपचार किया जाता है। इसी आशय से ग्रन्थकार ने 'ज्ञानावच्छेदकत्वाच्च' (प्रमाचैतन्योपाधित्वात्) पंक्ति लिखी है।
आप चैतन्य में ही प्रत्यक्ष-प्रमात्व कहते हैं। परन्तु चैतन्य में अनादित्व (नित्यत्व) होने से वह अजन्म है और अजन्म (पैदा न होने वाली) वस्तु को करण की अपेक्षा नहीं होती। जन्य (उत्पन्न होने वाली) वस्तु को ही करण की अपेक्षा हुआ करती है। क्योंकि करण का अर्थ है कारणविशेष अर्थात् एक प्रकार का विशिष्ट कारण। 'कारण', भी कारक ही है। क्रिया को उत्पन्न करने वाले पदार्थ को कारक कहते हैं। इसलिए कारण कहलाने वाले प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा चैतन्य में यदि कोई विशेषता उत्पन्न न की गयी तो उसे कारण कहना व्यर्थ है।' यह उपर्युक्त शंका का आशय है। इस पर समाधान ग्रन्थ का आशय यह है—
'प्रत्यक्ष-प्रमाण के द्वारा अविशिष्ट चैतन्य में कोई विशेष (अतिशय) उत्पन्न न किये जाने पर भी (अतिशय का आधान न करने पर भी) अन्तःकरण-वृत्ति-विशिष्ट चैतन्य में उसके द्वारा अतिशयाधान किया जा सकता है।'
अद्वैत-सम्प्रदाय के प्राचीन विद्वानों ने ऐसा कहीं नहीं कहा है, अतः यह अप-सिद्धान्त है—ऐसा कदाचित् वादी न कहे, एतदर्थ 'तदुक्तम्' इत्यादि ग्रन्थ से 'प्रकाशात्मसंज्ञक' आचार्य ने अपने विवरण ग्रन्थ में 'अन्तःकरण-वृत्ति में ज्ञानत्व का उपचार (प्रमात्व का अध्यास) किया जाता है' ऐसा कहा है। अतः यह अपसिद्धान्त नहीं है। इस पर शंका—
(अन्तःकरणवृत्तिः)
ननु¹ निरवयवस्यान्तःकरणस्य परिणामात्मिका वृत्तिः कथम् !
अर्थ—निरवयव (अवयवशून्य) अन्तःकरण की परिणामात्मक वृत्ति की संभावना कैसे हो सकती है ?
१. अत्र शङ्कते—'विषयसंसृष्ट वृत्त्यवच्छिन्नं चैतन्यं प्रमा' इति यदुक्तं तदयुक्तम्।'