भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 482 में से

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पृष्ठ 83

प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः २५

इस प्रश्न का उत्तर—

उच्यते। चैतन्यस्यानादित्वेऽपि तदभिव्यञ्जकान्तःकरणवृत्ति-रिन्द्रियसन्निकर्षादिना जायते, इति वृत्तिविशिष्टं चैतन्यमादिम^१दित्युच्यते^२। ज्ञानावच्छेदकत्वाच्च वृत्तौ ज्ञानत्वोपचारः। तदुक्तं विवरणे—'अन्तःकरणवृत्तौ ज्ञानत्वोपचारात्' इति ॥

अर्थ—अनादि चैतन्य में करण बनकर चक्षुरादि इन्द्रियों की प्रमाणता बताई जाती है—चैतन्य अनादि (नित्य) होने पर भी उसे अभिव्यक्त करने वाली अन्तःकरणवृत्ति, इन्द्रिय-सन्निकर्षादि निमित्त से ही पैदा होती है। इसी से वृत्तिविशिष्ट-चैतन्य (चिदाभास) आदिमत् (उत्पत्तिमान् = उत्पन्न होनेवाला) है, ऐसा कहा जाता है। वृत्ति को ज्ञान शब्द से क्यों कहा जाता है? उत्तर—अन्तःकरण-वृत्ति को ज्ञानावच्छेदकत्व है। वृत्ति, ज्ञान को मर्यादित (भिन्न) करती है। इसलिए उसमें ज्ञानत्व का उपचार होता है। उस वृत्ति को ही गौणोवृत्ति से 'ज्ञान' कहते हैं। विवरणकार ने भी इस सम्बन्ध में 'अन्तःकरण की वृत्ति में ज्ञानत्व का उपचार होने से' ऐसा कहा है। इसलिए अन्तःकरण-वृत्ति को ही ज्ञान कहते हैं। उसमें ज्ञानत्व का उपचार अर्थात् गौण^३ प्रयोग किया जाता है—अतः यह कथन अनुचित नहीं है।

विवरण—साक्षात् ब्रह्मात्मभूत चैतन्य, अनादि (नित्य) है, इसमें किञ्चित् मात्र भी सन्देह नहीं। तथापि अन्तःकरण-वृत्ति उस नित्य-चैतन्य को अभिव्यक्त करती है। अन्तःकरणवृत्ति में नित्य-चैतन्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है। उसी को 'चिदाभास' कहते हैं। अन्तःकरण की वृत्ति, इन्द्रिय सन्निकर्षादि के कारण प्रतिक्षण उत्पन्न होती रहती है। अर्थात् वह स्वभावतः (स्वाभाविक ही) जन्य है। इस कारण इस जन्य वृत्ति से विशिष्ट (युक्त) चैतन्य हुए को भी आदिमत्व है। अर्थात् वह भी वृत्ति के साथ उत्पन्न होता है—कह सकते हैं। इसलिए चक्षुरादि इन्द्रियों में उस जन्य चैतन्य के प्रति करणत्व प्रतीत होता है। जिससे उन्हें प्रमाण कहा जा सकता है—इस आशय


१. दुच्य-इति पाठान्तरम्।

२. चतुर्भागस्य अन्तःकरणस्य अतिस्वच्छत्वात् चैतन्यं तत्र अभिव्यज्यते। तस्य च अभिव्यक्तचैतन्यस्य एकत्वेऽपि व्यञ्जकान्तःकरणभागभेदात् चतुर्धा व्यपदेशो भवति—प्रमाता, प्रमाणं-प्रमितिः-प्रमेयमिति।

३. चैतन्यस्य स्वरूपतः अजन्यत्वेऽपि वृत्तिचैतन्ययोः। अन्योन्यतादात्म्याध्यासेन वृत्तिधर्मस्य जन्यत्वस्य चैतन्ये अध्यासात् प्रमारूपस्य विषयसंसृष्टवृत्त्यभिव्यक्तचैतन्यस्य गौणं जन्यत्वम्। तथाचोक्तं सिद्धान्तलेशसंग्रहे—"तस्य स्वरूपेण अकार्यत्वेऽपि दृश्यावच्छिन्नरूपेण ब्रह्माकार्यत्वात्।"