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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 482 में से

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पृष्ठ 82

२४ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम्

स्मृति, ज्ञान-करणक है। यदि ऐसा कहें तो स्मृतिज्ञान जिसमें करण है ऐसे प्रत्यभिज्ञा प्रत्यक्ष में 'ज्ञानाकरणकं ज्ञानम्' इस लक्षण की अव्याप्ति होती है। 'सोऽयं देवदत्तः' प्रत्यभिज्ञा-प्रत्यक्ष का उदाहरण है।

कारण यह है कि हमारे पक्ष में 'प्रत्यभिज्ञा' प्रत्यक्ष प्रमा है। ओर उसका करण स्मृतिज्ञान है। आप प्रत्यक्षप्रमा का लक्षण कर रहे हैं 'ज्ञानाकरणकं ज्ञानम्', जो प्रत्यभिज्ञाप्रत्यक्ष में घटित नहीं हो सकता। क्योंकि प्रत्यभिज्ञा तो 'ज्ञानकरणक' ही है। ज्ञानाकरणक नहीं।

उपर्युक्त विवेचन से यह सिद्ध हुआ कि प्रत्यक्ष-प्रमा का उपपादन किसी भी लक्षण से नहीं बन सकता। अतः ग्रन्थकार 'प्रत्यक्षप्रमा' शब्द से वेदान्त शास्त्र में क्या विवक्षित है ? उसे 'प्रत्यक्षप्रमाचात्र¹ चैतन्यमेव²' इस वाक्य से बतला रहे हैं। सिद्धान्त में चैतन्य ही प्रत्यक्षप्रमा है। वेदान्त शास्त्र में--ज्ञान, चैतन्य, ब्रह्म, आत्मा, चिति, संविद्, भान इत्यादि शब्द समानार्थक हैं (पर्याय हैं)। प्रमा का अर्थ है ज्ञान का एक प्रकार। अतः प्रत्यक्षप्रमा को चैतन्य शब्द से कहना उचित ही है।

इस विषय में 'यत्साक्षात्' यह श्रुति प्रमाण है। इस श्रुति में 'ब्रह्म' इस विशेष्य के 'साक्षात् और अपरोक्ष' ये दो विशेषण दिये गये हैं। इन्द्रियादि प्रमाणों से अथवा साधनों से ब्रह्म का प्रत्यक्ष नहीं होता, यह बताने के लिए श्रुति में 'साक्षात्' पद दिया गया है। अपरोक्ष प्रमाण से ब्रह्म का साक्षात्कार होता है, ऐसा भ्रम किसी को न हो जाय इसलिए 'अपरोक्ष' पद दिया गया है।

वेदान्त सिद्धान्त में 'चैतन्य ही प्रत्यक्षप्रमा है' इस दिये गये उत्तर पर पुनः शंका--

ननु चैतन्यमनादि तत्कथं चक्षुरादेस्तत्करणत्वेन प्रमाणत्वमिति ।

अर्थ—चैतन्य अनादि (उत्पन्न न होने वाला) अर्थात् अकार्य है। तब चक्षुरादिकों में उनकी कारणता होने से प्रमाणत्व कैसे प्राप्त हो सकता है ?

विवरण—अनादि का अर्थ है कारणरहित; अत एव उत्पन्न न होने वाला, अकार्य। जो नित्य वस्तु है उसके कारण की तो संभावना ही नहीं हो सकती। क्योंकि 'कारण' का अर्थ है विशिष्ट कारण। कार्य को उसकी अपेक्षा रहती है। अकार्य (नित्यपदार्थ) को उसकी अपेक्षा नहीं होती। ऐसी स्थिति में प्रत्यक्ष प्रमा रूप चैतन्य में चक्षुःश्रोत्रादिरूप इन्द्रियाँ प्रमाण (करण) कैसे हो सकती हैं ?


१. अत्र – अद्वैतसिद्धान्ते ।
२. चैतन्यमेव = वृत्तिप्रतिबिम्बितचैतन्यं वृत्त्यभिव्यक्तचैतन्यं वा प्रमा । न तु शुद्धचैतन्यं, तस्य अज्ञानाऽनिवर्तकत्वेन प्रमात्वायोगात् । एवकारेण इन्द्रियजन्यज्ञानादीनां

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