वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः २३
अतिव्याप्ति न होने पावे इसलिए लक्षण में 'प्रमा' शब्द के निवेश करने की आवश्यकता है। 'शुक्तिरजत-ज्ञान' यद्यपि प्रत्यक्ष-ज्ञान है तथापि उसका विषय (शुक्तिरजत) बाधित होने वाला है इसलिए वह 'प्रमा' नहीं है। यही कारण है कि प्रमा के लक्षण में 'अबाधितविषयज्ञानत्व' इन पदों की योजना की है।
शंका—'प्रत्यक्ष-प्रमा' शब्द का अर्थ क्या है ? 'इन्द्रियजन्यज्ञानत्वं प्रत्यक्षप्रमात्वम्' इन्द्रिय से पैदा होने वाला ज्ञान—प्रत्यक्ष प्रमा है, ऐसा यदि कहें तो यह भूलना नहीं होगा कि, वेदान्त के सिद्धान्त में 'मन' की इन्द्रियों में गिनती नहीं है। तथापि सुख-दुःखादिकों का प्रत्यक्ष रूप से अनुभव होता है तब 'इन्द्रियजन्यज्ञानत्वं' इस प्रत्यक्ष-लक्षण की सुखादिप्रत्यक्ष-प्रमा में अव्याप्ति होती है क्योंकि आपके मत से सुखादिज्ञान प्रत्यक्ष होने पर भी इन्द्रियजन्य नहीं है। यदि हम दूसरे प्रकार से ऐसा कहें-अनुमिति, शाब्द, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि ये पाँचों प्रमाएं क्रम से व्याप्तिज्ञान, सादृश्यज्ञान, तात्पर्यवत्पदज्ञान, अनुपलब्धिज्ञान इन पाँच ज्ञानों से पैदा होती है। इसलिए परिशेषन्याय से 'ज्ञानाजन्यं ज्ञानं' ज्ञान से उत्पन्न न होने वाले ज्ञान को प्रत्यक्ष-ज्ञान कहते हैं। इस प्रकार प्रत्यक्ष-प्रमा का लक्षण करें तो दूसरों के मत से 'सभी प्रत्यक्ष-ज्ञान, ईश्वरज्ञानाजन्य होने से इस दूसरे लक्षण पर भी अव्याप्ति दोष आता है।'
इस अव्याप्तिदोष का निवारण करने के लिए 'ज्ञानाकरणकं ज्ञान'—ज्ञान जिसका करण नहीं हो ऐसा ज्ञान—प्रत्यक्ष प्रमा ! ऐसा लक्षण करें तो अनुभव, संस्कार को उत्पन्न करके क्षीण हो जाता है, तब अनुभवज्ञान, स्मृतिज्ञान का करण हो नहीं सकता। अनुभव और स्मृति की प्रक्रिया इस प्रकार है—
पूर्वानुभूत पदार्थ के संस्कार मन में स्थिर रहते हैं। अदृष्टवशात् संनिकर्षादि निमित्तों के कारण संस्कारों के उद्बुद्ध होने पर पूर्वानुभूत पदार्थ की स्मृति होती है। कुछ लोग अबाधित पूर्वानुभूत पदार्थ की स्मृति को भी प्रमा नहीं कहते हैं। उनके मत में 'ज्ञानाकरणं ज्ञान' ज्ञान जिसका करण नहीं है ऐसा ज्ञान ही प्रत्यक्षप्रमा है, इस लक्षण के अनुसार स्मृति भी संस्कारजन्य होने से प्रमा कोटि में आवेगी। कारण यह है कि अनुभवरूपज्ञान का संस्कार में ही क्षय हो जाने से वह अनुभवज्ञान, स्मृति का कारण नहीं बन सकता, इसलिए 'ज्ञानाकरणकं ज्ञानं' इस प्रत्यक्ष प्रमालक्षण की स्मृति में अतिव्याप्ति होती है। क्योंकि स्मृति के प्रमा न होने पर भी उसमें प्रत्यक्षप्रमा का लक्षण घटित हो रहा है।
इस दोष का निवारण करने के लिए—'स्मृति का करण अनुभवज्ञान ही है, संस्कार तो उसका अवान्तर व्यापार है। इस व्यापार से युक्त अनुभव में स्मृति की कारणता सिद्ध होने से 'व्यापारवत् असाधारणं कारणं करणम्'—'व्यापार से युक्त जो असाधारण कारण वह करण है' यह करण का लक्षण अनुभव में है, अतः अनुभवज्ञान स्मृति का करण होने से 'ज्ञानाकरणकं' यह लक्षण स्मृति में अतिव्याप्त नहीं है, क्योंकि