वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २२ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम् |
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जिस पुरुष ने अपने गांव में गाय अथवा बैल देखा हो वह कभी वन ( जंगल ) चला जाय और वहां पर गवय नामक पशु को अपनी आंखों से देखे तो वह मन में कहने लगता है कि मैंने गांव में देखी हुई गाय के आकार जैसा ही इस ( गवय ) का आकार देखा है, और 'गोसदृशो गवयः' गाय जैसा ही गवय होता है, यह लोगों को कहते हुए भी सुना है, तथा इस पशु का देह गाय या बैल के देह जैसा ही है, इसलिए यही 'गवय' है, इस प्रकार उसे निश्चय ( प्रमा ) होता है। इसी को उपमिति ( प्रमा ) कहते हैं। इस प्रमा का करण सादृश्यज्ञान है, उसे उपमान कहते हैं।
'अहरहः सन्ध्यामुपासीत' प्रतिदिन सन्ध्या की उपासना करनी चाहिये। इस वैदिक वाक्य को और 'गाय के बछड़े को बांधो' इस लौकिक वाक्य को श्रोत्रेन्द्रिय से सुनकर जो शब्दार्थज्ञान उत्पन्न होता है उसे शाब्दी प्रमा कहते हैं। और वैदिक अथवा लौकिक तात्पर्ययुक्त वाक्य-ज्ञान उसका कारण है। वाक्य का उच्चारण करने वाले पुरुष ने जिस विवक्षित अर्थ से वाक्य का उच्चारण किया हो, उस अर्थ में उस वाक्य का तात्पर्य रहता है। ऐसे तात्पर्य-युक्त वाक्य का ज्ञान ही शाब्दी प्रमा का कारण है। वाक्य-ज्ञान को ही शब्दप्रमाण कहते हैं।
'प्रत्यक्ष' शब्द की तरह 'अर्थापत्ति' शब्द का भी प्रभा और प्रमाण इन दोनों अर्थों में समान ( साधारण ) प्रयोग किया जाता है। जैसे—( पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते ) 'यह मोटा-ताजा देवदत्त दिन में भोजन नहीं करता' यह वाक्य सुनने पर देखी हुई अथवा सुनी हुई देवदत्त की मोटाई रात्रि-भोजन के अभाव में असम्भव है इस कारण उसकी मोटाई के ज्ञान होने के अनन्तर पैदा होने वाली—'रात्रौ भुङ्क्ते' यह रात में अवश्य भोजन करता है,—जो प्रमा ( ज्ञान ) है, उसे अर्थापत्ति कहते हैं। और उस प्रमा को उत्पन्न करने वाले पुष्टत्वज्ञान रूप करण को भी अर्थापत्ति कहते हैं।
घट से रहित ( खाली ) स्थान पर घटाभाव रूप जो विलक्षण प्रमा ( ज्ञान ) होती है उसे अभाव-प्रमा ( अभाव का अनुभव ) कहते हैं। घट की अनुपलब्धि ( घट का अनुभव न होना ) यही उस अनुपलब्धि रूप प्रमा का करण है। इस विवेचन से यह स्पष्टतया समझ में आ सकता है कि 'प्रत्यक्ष ( इन्द्रिय ) प्रत्यक्ष-प्रमा का करण है' और व्याप्तिज्ञान, सादृश्यज्ञान, शब्दज्ञान, पुष्टत्वादिज्ञान तथा अभावज्ञान यह सब यथाक्रम अनुमिति, उपमिति, शब्द, अर्थापत्ति तथा अनुपलब्धि इन प्रमाओं के करण हैं।
शंका--प्रत्यक्षेतर पाँच प्रमाओं में प्रत्यक्षकरण की अतिव्याप्ति न होने पाये यही उद्देश्य यदि 'प्रमायाः करणम्' न कहकर 'प्रत्यक्ष-प्रमायाः' के कहने में हो तो 'प्रत्यक्षज्ञानकरणं प्रत्यक्ष-प्रमाणम्' इतना ही लक्षण किया जाय। लक्षण में 'प्रमा' शब्द के निवेश करने की आवश्यकता नहीं।
समाधान--सीप में रजत ( चाँदी ) का ज्ञान होना भले ही भ्रम हो परन्तु वह प्रत्यक्ष ज्ञान है और उसका साधन 'साक्षी' है। उसमें प्रत्यक्ष-प्रमाण के लक्षण क