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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 482 में से

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पृष्ठ 79

प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः २१

वेदान्त-सिद्धान्त में प्रत्यक्ष-प्रमा, 'चैतन्य' ही है। क्योंकि 'यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' जो 'साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म', (बृ० ३।४।१) यह श्रुति है। मूल श्रुतिवाक्य में 'अपरोक्षात्' ऐसा पञ्चम्यन्त पाठ होने पर भी उसे 'अपरोक्षम्' ऐसा नपुंसकलिंग प्रथमान्त समझना चाहिए। कारण यह है कि 'साक्षात्' यह शब्द अव्यय होने से वह सदैव एक-सा ही रहेगा, परन्तु 'अपरोक्ष' शब्द ब्रह्म का विशेषण होने से 'अपरोक्षम्' यही उसका रूप समझना चाहिए।

विवरण—'प्रमाकरणं प्रमाणम्' यह प्रमाण का सामान्य लक्षण पहले बताया जा चुका है। अब उन छह प्रमाणों में से प्रत्येक का विशेष लक्षण बताना है। पूर्वोक्त छह प्रमाणों में से 'प्रत्यक्ष प्रमा का जो करण, वह प्रत्यक्ष प्रमाण', यह प्रत्यक्ष प्रमाण का लक्षण है। इसमें 'प्रत्यक्षप्रमाणं' यह लक्ष्य है और 'प्रत्यक्षप्रमायाः करणम्' यह लक्षण है। अब इस लक्षण में 'प्रत्यक्ष प्रमा का' इतना लम्बा कहने के बजाय केवल 'प्रमा का' इतना ही क्यों नहीं कहा ? इस शंका का उत्तर यह है कि 'प्रमा' का अर्थ है यथार्थ ज्ञान, और वह छह प्रकार का है, तब 'प्रमा का करण' इतना ही लक्षण करने पर उसकी अनुमान, उपमान इत्यादि अन्य प्रमा-करणों में भी अतिव्याप्ति होगी, वह न हो इसलिए 'प्रत्यक्षप्रमा का' इतना कहना पड़ा।

प्रमा, प्रमाण इत्यादि शब्द और उनके अर्थ के विषय में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रमा और प्रमाण इन दोनों अर्थों में 'प्रत्यक्ष' शब्द का एक-सा ही उपयोग किया जाता है। 'घट' से चक्षुरिन्द्रिय का संनिकर्ष होने पर 'यह घट है' इस आकार (स्वरूप) का प्रमात्मकज्ञान होता है। इस ज्ञान (प्रमा) को 'प्रत्यक्ष' कहते हैं। और इस ज्ञान (प्रमा) का करण 'चक्षुरिन्द्रिय' है, उसे भी प्रत्यक्ष कहते हैं। इसलिए प्रत्यक्ष शब्द का उपयोग प्रत्यक्षप्रमा और उसका करण इन दोनों अर्थों में एक-सा किया जाता है।

न्यायशास्त्र में प्रत्यक्ष-ज्ञान छह प्रकार का बताया गया है। चक्षु, श्रोत्रादि पांच ज्ञानेन्द्रियों से होने वाला चाक्षुष, श्रोत्रादि पाँच प्रकार का तथा मनरूप इन्द्रिय से होने वाला मानस-प्रत्यक्ष, यह छठा। परन्तु वेदान्तमत में ग्रन्थकार ने 'मन को इन्द्रियत्व नहीं है' ऐसा कहा है। इसलिए श्रोत्रादि ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच ही हैं और उनसे होने वाला प्रत्यक्ष-ज्ञान भी पाँच ही प्रकार का है।

जिस आदमी को अपने घर के रसोईघर आदि में 'जहाँ धुआँ होता है वहाँ अग्नि भी होती है' इस प्रकार व्याप्ति ग्रहण (नित्य सम्बन्ध का ज्ञान) हुआ हो, वही आदमी कहीं दूर जाकर पर्वतादि स्थल पर मूल से लेकर ऊपर तक जाती हुई अविच्छिन्न धुएँ की रेखा को यदि देखे तो उसे 'जहाँ-जहाँ धुआँ होता है वहाँ-वहाँ अग्नि होती है' इस व्याप्ति (सम्बन्ध) की याद आ जाती है। तदनन्तर उसे 'यह (पर्वत) वह्निमान् है (इसमें अग्नि है) ऐसा जो ज्ञान (प्रमा) होता है, उसे अनुमिति कहते हैं और उसमें करण (साधन) जो व्याप्तिज्ञान है, उसे अनुमान कहते हैं।'