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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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पृष्ठ 78

२० | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम्

उस लक्षण से लक्षित (अवगत) होने वाला जो प्रमा-करण प्रमाण है, वह कितने प्रकार का है ? ऐसी आकांक्षा होने पर प्रमाण के प्रकारों को बताते हैं—

( प्रमाणभेदनिरूपणम् )

तानि च प्रमाणानि षट्, प्रत्यक्षानुमानोपमानागमार्थापत्त्यनुपलब्धिभेदात् ।

**अर्थ—**ये प्रमाण यथार्थ ज्ञान (प्रमा) के साधन अर्थात् करण छह हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति और शब्द, अनुपलब्धि ।

**विवरण—**चार्वाक के मत में केवल 'प्रत्यक्ष' ही एक प्रमाण है। कणाद, वैशेषिक और बौद्ध, के मत में 'प्रत्यक्ष और अनुमान' दो प्रमाण हैं। सांख्य के मत में 'प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द' तीन प्रमाण हैं। नैयायिक के मत में प्रत्यक्षादि तीन और 'उपमान' चार प्रमाण हैं। प्रभाकर मीमांसक के मत में पूर्वोक्त चार और 'अर्थापत्ति' ये पाँच प्रमाण हैं। पौराणिक के मत में पूर्वोक्त पाँच और 'सम्भव' तथा 'ऐतिह्य' सात प्रमाण हैं।¹ इन सबका निराकरण करने के लिए तथा वे छह प्रमाण कौन से ? ऐसी आकांक्षा होने पर उनका 'प्रत्यक्ष, अनुमान' इत्यादि ग्रन्थ से उद्देश (नाम-निर्देश) किया है। पौराणिकों के अभिमत सम्भवादि अधिक प्रमाणों का इन छह प्रमाणों में ही अन्तर्भाव हो जाता है। अतः उन्हें पृथक् मानने की आवश्यकता नहीं है।

इन छह प्रमाणों में से 'प्रत्यक्ष' प्रमाण, अन्य सब प्रमाणों का उपजीव्य अर्थात् कारण है, और वह अन्य किसी भी प्रमाण से पूर्व प्रवृत्त होने के कारण ज्येष्ठ भी है। इसलिए ग्रन्थकार प्रथमतः 'तत्र प्रत्यक्षप्रमायाः करणम्', इत्यादि ग्रन्थ से उसी का निरूपण प्रारम्भ करते हैं—

( प्रत्यक्षप्रमाणनिरूपणम् )

तत्र प्रत्यक्षप्रमायाः करणं प्रत्यक्षप्रमाणम् । प्रत्यक्षप्रमा चात्र चैतन्यमेव । 'यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म' ( बृ० ३-४-१ ) इति श्रुतेः । अपरोक्षादित्यस्यापरोक्षामित्यर्थः ;

**अर्थ—**उन छह प्रमाणों में से प्रत्यक्ष प्रमा के करण को प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैं ।


१. 'प्रत्यक्षमेकं चार्वाकाः कणाद-सुगतौ पुनः ।
अनुमानञ्च तच्चाथ सांख्याः शब्दश्च ते अपि ॥
न्यायैकदेशिनोऽप्येवमुपमानञ्च केचन ।
अर्थापत्त्या सहैतानि चत्वार्याह प्रभाकरः ॥
अभावषष्ठान्येतानि भाट्टावेदान्तिनस्तथा ।
सम्भवैतिह्ययुक्तानि तानि पौराणिका जगुः ॥—( तार्किकरक्षा )