वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १९
होता है¹, उस द्वैतावस्था में चेतन-आत्मा, स्वरूप से च्युत होकर उपाधिलक्षण प्रमाता बन जाता है, और अपने से भिन्न विषयों को देखता है, इस प्रकार इस श्रुति का तात्पर्यार्थ है।
यदि घटादि पदार्थों को त्रैकालिक अबाधितत्व नहीं है, केवल संसार दशा में ही अबाधितत्व है तो प्रमा का पूर्वोक्त लक्षण घटादि प्रमा में अव्याप्त ही रहा, इस शंका का समाधान 'तथा च' इस ग्रन्थ से किया है—'संसारदशा में घटादि विषयों का बाध न होने से उनकी प्रमा को लक्ष्य समझा जाता है। अतः पूर्वोक्त लक्षण में प्रतीत होने वाले अव्याप्ति दोष को दूर करने के लिए लक्षणगत 'अबाधित' पद से 'संसारदशा में अबाधितत्व' यह अर्थ विवक्षित है। उससे घटादि-प्रमा में लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती। यही समाधान-ग्रन्थ का तात्पर्य है।
'व्यवहारदशा में घटादिज्ञान प्रमा है' अपने (ग्रन्थकार के) इस कथन को पुष्ट करने के लिए प्राचीन साम्प्रदायिक विद्वानों की सम्मति को 'तदुक्तम्' इस ग्रन्थ से प्रदर्शित किया है। "आत्मनिश्चय होने तक 'देह ही आत्मा' यह अनुभव सर्वप्राणि-साधारण है और वह प्रमाण (प्रमारूपसे) माना जाता है। उसी तरह आत्मनिश्चय होने तक सभी लौकिक-ज्ञान (क्रिया-कारक-फलादि-विषयकज्ञान) प्रमाण (प्रमा) हैं" इस प्रकार उस लौकिक वचन का तात्पर्य है।
संसारदशा में भी 'यह मैं' ऐसा आत्मनिश्चय रहता है, तब 'आत्मनिश्चय होने तक' इस कथन का क्या आशय है ? ऐसी शङ्का यदि किसी को हो तो उसके समाधानार्थ ग्रन्थकार ने 'आ आत्मनिश्चयात्' इन पदों का ब्रह्मसाक्षात्कार होने तक यह अर्थ बताया है। ब्रह्मसाक्षात्कार का अर्थ है आ ब्रह्मस्तम्बपर्यन्त सब प्राणियों में एकात्मा का अनुभव होना, अर्थात् संसारदशा में 'यह मैं' इस प्रकार आत्मनिश्चय होना भ्रान्त प्रत्यय है। 'यत्र त्वस्य०' इस पूर्वोक्त श्रुति वचन से यही सिद्धान्त सूचित किया है। 'लौकिकम्' शब्द से 'केवल प्रत्यक्ष प्रमाणजन्य-ज्ञान' यह अर्थ न समझा जाय, इसलिए ग्रन्थकार ने उसका अर्थ 'घटादिज्ञान' बताया है। 'ब्रह्मसाक्षात्कार होने तक' ऐसा कहने से श्लोकस्थ 'लौकिक घटादिज्ञान' इन पदों से 'ब्रह्मातिरिक्त सब वस्तुओं का ज्ञान' समझना चाहिए। तब 'ज्योतिष्टोमादिकों में स्वर्गादि इष्ट फलों की साधनता है' इत्यादि ज्ञान के अलौकिक होने पर भी कोई दोष नहीं। क्योंकि 'ब्रह्मसाक्षात्कार होने तक ब्रह्म-भिन्न सब वस्तुओं का ज्ञान प्रमाण (प्रमा) है' यह अर्थ स्पष्ट होता है²।
यहाँ तक प्रमा का स्मृतिव्यावृत्त और स्मृतिसाधारण ऐसा लक्षण बताया। अब
१. व्यवहारदशायां ( संसारदशायां ) द्वैतमिव = द्वैतं भवतीव। प्रपञ्चोपादानभूतेन अज्ञानेन द्विचन्द्रादिदर्शनवत् क्रिया-कारक-फल लक्षण-कल्पितभेदवदिव भवति, वास्तविकं द्वैतं न भवति।
२. प्रमासामान्यलक्षणम्—
'अनधिगत-ब्रह्मप्रमातिरिक्त-अबाधितार्थ-विषयकज्ञानत्वं प्रमात्वम्'।