वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअन्तःकरणस्य सावयवत्वनिरूपणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः २७
विवरण—( प्रतिज्ञा ) अन्तःकरण ( मन ) द्रव्य, परिणामी ( परिणाम को प्राप्त होने वाला ) नहीं है । ( हेतु ) क्योंकि वह निरवयव है । ( दृष्टान्त ) आकाश के समान, ऐसा अनुमान¹ करने से अन्तःकरण की परिणामरूप वृत्ति नहीं हो सकती । दूध से दही की तरह किंवा मिट्टी से घट की तरह यह वृत्ति, परिणाम न होकर सूर्य प्रकाश के समान विकासरूप है । यह कहने पर भी निरवयव वस्तु का आकाश के समान ही विकास रूप परिणाम भी नहीं हो सकता । इसलिए अन्तःकरण-वृत्ति-विशिष्ट चैतन्य को ज्ञान रूप नहीं माना जा सकता । इस कारण ज्ञान, आत्मा से भिन्न ही है और वह इन्द्रियजन्य होने से प्रत्यक्ष है, इस आशय से नैयायिकों ने यह शंका की है । नैयायिक 'ज्ञान' को आत्मा का गुण मानते हैं । किन्तु वेदान्ती वृत्तिविशिष्ट-चैतन्य को जन्य-ज्ञान कहते हैं । यह जन्य-ज्ञान, आत्मा का गुण नहीं है । क्योंकि आत्मा, निर्गुण है । 'ज्ञप्ति-रूप अविशिष्ट ज्ञान,' आत्मा का स्वरूप है । नैयायिकों के मत में अन्तःकरण ( मन ) निरवयव, अणुपरिमाण, एक और नित्य है । वेदान्त-सिद्धान्त में वह सावयव, विरल, सादिद्रव्य है । इसलिए ग्रन्थकार स्वसिद्धान्त के अनुसार नैयायिकों की उपर्युक्त शंका का समाधान करते हैं ।
( कामादीनां मनोधर्मत्वम् )
इत्थम् । न तावदन्तःकरणं निरवयवं, सादिद्रव्यत्वेन सावय-
वत्वात् । सादित्वं च 'तन्मनोऽसृजत' इत्यादिश्रुतेः ! वृत्तिरूपज्ञानस्य
मनोधर्मत्वे च 'कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा श्रद्धा अश्रद्धा धृतिरधृति-
र्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव' ( बृ० १-५-३ ) इति श्रुतिर्मानम्, धी-
शब्देन वृत्तिरूप-ज्ञानाभिधानात् । अत एव कामादेरपि मनोधर्मत्वम् ॥
अर्थ —( सावयव पदार्थ का परिणाम होता है । निरवयव का नहीं । अतः अन्तःकरण तो निरवयव पदार्थ होने से उसकी परिणामात्मक वृत्ति कैसे संभव हो सकती है ? इस प्रश्न पर हम बताते हैं कि वह ऐसे सम्भव हो सकती है ) पहले तो अन्तःकरण निरवयव पदार्थ नहीं है । ( वह तो सावयव है ) क्योंकि उसमें सादिद्रव्यत्व होने से सावयवत्व है । ( सादि = उत्पन्न होने वाला । जो उत्पन्न होने वाला द्रव्य होता है वह सावयव होता है ) उसका सादित्व 'तन्मनः असृजत' उस ब्रह्म ने मन ( अन्तःकरण ) को उत्पन्न किया । इत्यादि श्रुतियों से सिद्ध होता है । और 'अन्तःकरण-वृत्ति रूप ज्ञान'
१. अनुमानप्रयोगः—'अन्तःकरणं न परिणामि, निरवयवत्वात् आकाशवत् ।' किन्तु अत्रानुमाने 'निरवयवत्वं' हेतुः चेतनत्वोपाधिना सोपाधिकः, स्वरूपासिद्धश्च । तथा चानुमानप्रयोगः—
'अन्तःकरणं सावयवं सादित्वेसति द्रव्यत्वात् ।' तथा च सादिद्रव्यत्वेन अन्तःकरणस्य सावयवत्वसिद्धौ निरवयवत्वासिद्धिरिति हेतोः स्वरूपासिद्धत्वं सिद्धं भवति ।