वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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आचार्य शंकर के अद्वैत सिद्धान्तों को हृदयंगम करने में यह 'वेदान्त-परिभाषा' नामक प्रकरणग्रन्थ नितान्त उपकारक है। आचार्य शंकर के अद्वैत-सिद्धान्त से भारतीयजीवन अत्यधिक प्रभावित है। जड-चेतन पदार्थों को, मनुष्यों
| आचार्य शंकर के अद्वैतसिद्धान्त का समर्थन | तथा देवताओं को उस परमपुरुष का अंग माना गया है। उसी परमपुरुष को सत्-चित्-आनन्द-ब्रह्म बताया गया है। सत्-चित्-आनन्द-ब्रह्म ये सभी शब्द एकार्थक हैं। इस सत् से ही संसार की उत्पत्ति हुई है, उसी पर यह संसार आश्रित है तथा प्रलय होने पर इसी में विलीन हो जाता है। |
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संसार का नानात्व असत्य है और उसकी एकता ही एकमात्र सत्य है। १ अर्थात् संसार में एक ही सत्ता है। आत्मा या ब्रह्म ही एकमात्र सत्ता है, वह अनन्त ज्ञान तथा अनन्त आनन्द है। उसके अन्तर्गत कोई दूसरी सत्ता नहीं है। ब्रह्म ही एकमात्र विशुद्ध सत्ता है। तथापि अविद्या के कारण उसमें अनेक की प्रतीति होती है। अर्थात् अविद्या के कारण ब्रह्म का सत्य स्वरूप न जानकर हम उसे नानारूप में देखते हैं। यदि अज्ञान न होता तो हमें ब्रह्म की अनेकरूपता का भ्रम न होता। माया; अविद्या, अज्ञान वास्तव में एक ही हैं। दृष्टिभेद से यह भिन्न सी लगती हैं। माया (अज्ञान) और ब्रह्म दो शब्दों का प्रयोग करने पर भी विशुद्ध अद्वैत के प्रतिपादन में कोई बाधा उपस्थित नहीं हो पाती। क्योंकि माया को उस परमेश्वर ब्रह्म की ही एक शक्ति कहा है। आचार्य शंकर ने अद्वैत को हृदयंगम कराने के लिये दो दृष्टियाँ बताई हैं—एक व्यावहारिक-दृष्टि और दूसरी पारमार्थिक-दृष्टि। पहिली दृष्टि साधारण मनुष्यों के लिये है जो संसार को सत्य मानते हैं; हमारा व्यावहारिक जीवन इसीपर निर्भर है। इस दृष्टि के अनुसार आचार्य शंकर ब्रह्म को सगुण या ईश्वर कहते हैं। दूसरी दृष्टि ज्ञानियों की है, जो संसार को मायिक और ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कोई सत्ता नहीं है, ऐसा समझते हैं। इस दृष्टि के अनुसार ब्रह्म निर्गुण है। इस दृष्टि के अनुसार आत्मा और ब्रह्म में कोई भेद नहीं रह जाता। यह पारमार्थिक दृष्टि अविद्या के दूर होने पर ही संभव है। अविद्या का नाश वेदान्त के ज्ञान से ही होता है। इस अज्ञान के कारण ही यह जीव अपने को ब्रह्म से पृथक् समझता है। मिथ्याज्ञान (अज्ञान) के दूर होने पर उसके दुःखों का भी अन्त हो जाता है। जिस तरह ब्रह्म आनन्दमय है उसी तरह आत्मा भी आनन्दमय हो जाती है। इति शम्।
—गजाननशास्त्री मुसलगांवकर
१. 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म, नेह नानास्ति किञ्चन ।'