वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३६ )
"यया यया भवेत् पुंसां व्युत्पत्तिः प्रत्यगात्मनि ।
सा सैव प्रक्रियेह स्यात् साध्वी सा चानवस्थिता ॥"
वेदान्तपरिभाषाकार की विवरणानुगामिता तथा क्वचित्-क्वचित् अननुगामिता
यह वेदान्त-परिभाषा नामक प्रकरणग्रन्थ विवरणप्रस्थान को आधार मानकर रचा गया है। कहीं-कहीं भामतीकार के मत को भी प्रदर्शित किया है किन्तु उधर ग्रन्थकार का झुकाव नहीं है। क्योंकि 'मन की अनिन्द्रियता', 'ज्ञान का प्रत्यक्षत्व' 'शाब्दापरोक्षत्व', 'जीवप्रतिबिम्बत्व', 'श्रवणविधेयत्व', आदि का विशेष रूप से समर्थन करना ही विवरणानुयायित्व को प्रकट कर रहा है। परन्तु कहीं-कहीं विवरणमत से वैमत्य भी दिखलाई पड़ता है।
| विवरणकार | परिभाषाकार |
|---|---|
| १. अनधिगतार्थविषयकबोध ही 'प्रमा' है। | अनधिगत-अबाधित अर्थविषयक ज्ञान ही 'प्रमा' है। |
| २. स्मृति, प्रमारूप नहीं है। | स्मृति, प्रमारूप है। |
| ३. अविद्याप्रतिबिम्बितचैतन्य ही 'जीव' है। | अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य 'जीव' है। |
| ४. अन्तःकरण दो प्रकार का है। | अन्तःकरण चार प्रकार का है। |
| ५. सादृश्य, अध्यास के होने में कारण नहीं है। | सादृश्य, अध्यास के कारण है। |
| ६. प्रातिभासिक अध्यासों की अवस्था, अज्ञान का कार्य है। | प्रातिभासिक अध्यास, तूलाज्ञान का कार्य है। |
| ७. स्फटिकगतलौहित्य, अनिर्वचनीय है। | स्फटिकगत लौहित्य सत्य है। |
| ८. व्याप्तिज्ञान, अनुमिति के प्रति कारण नहीं है। | व्याप्तिज्ञान, अनुमिति के प्रति कारण है। |
| ९. शाब्दबोध में तात्पर्यज्ञान हेतु नहीं है। | तात्पर्यज्ञान शाब्दबोध में हेतु है। |
| १०. अभावज्ञान की अप्रत्यक्षता। | अभावज्ञान की प्रत्यक्षता। |
इस ग्रन्थ की प्रमाण-प्रमेय प्रतिपादन की शैली अपने ढंग की अनोखी है। इस स्वल्पकाय ग्रन्थ में सभी आवश्यक विषयों को बताया गया है। उनमें भी कतिपय विशिष्ट विषय—जैसे 'मन का' अनिन्द्रियत्व। 'वह्निमान् पर्वतः' में पर्वतांश की प्रत्यक्षत्वव्यवस्था। ज्ञानगतप्रत्यक्ष और विषयगतप्रत्यक्ष के भिन्न-भिन्न प्रयोजक। शब्द से भी प्रत्यक्षज्ञान की उत्पत्ति। जातिशक्तिवाद। अर्थापत्ति तथा अनुपलब्धि का पृथक् प्रमाणत्व। स्वतः प्रामाण्यवाद। महावाक्य में लक्षणा का खण्डन। एक अविद्यापक्ष का स्वीकार आदि विशिष्ट विषयों का प्रतिपादन इस ग्रन्थ में किया गया है।