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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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रहता है, उसका साक्षात् अनुभव ही मुक्ति है। जैसे कण्ठस्थित मुक्ताहार को विस्मरणवश इधर उधर ढूँढ़ते फिरते हैं अन्त में अपनी ओर देखनेपर वह हार मिल जाता है उसी तरह मुमुक्षु को मोक्षप्राप्ति के लिए इधर उधर भटकने की आवश्यकता नहीं है, केवल अपने को समझने की आवश्यकता है। बन्धन अज्ञानकृत है। उस अज्ञान रूप आवरण को दूर कर देना ही मुक्ति है।

वेदान्त परिभाषा ग्रन्थ का स्वरूप परिचय

प्रस्तुत वेदान्तपरिभाषा नामक प्रकरण ग्रंथ में आठ परिच्छेद हैं। उनमें से छः परिच्छेदों में छः प्रमाणों का तथा सप्तम परिच्छेद में जीव-ब्रह्मैक्यरूप प्रमेय का और अष्टम परिच्छेद में सपरिकर मोक्ष का निरूपण किया गया है।

विवरण और भामती प्रस्थान में भेद

वेदान्त-शास्त्र में मुख्यतया विवरण प्रस्थान और भामती प्रस्थान प्रसिद्ध हैं। ये दोनों प्रस्थान व्याख्या उपव्याख्याओं से अच्छी तरह सुसमृद्ध हैं। दोनों का लक्ष्य अद्वैततत्त्व का निर्धारण करना ही है। तथापि उस अद्वैततत्त्व के निर्धारण में उपायभूत प्रसिद्ध व्यावहारिक प्रमेयों में कहीं-कहीं ऐकमत्य परिलक्षित नहीं होता है।

विवरणकार के मत सेभामतीकार के मत से
१. ब्रह्म-विचार श्रवण विधि प्रयुक्त है।ब्रह्म-विचार अध्ययन-विधि प्रयुक्त है।
२. कर्म, विचार्य है।कर्म, विविदिषार्थ है।
३. मन, इन्द्रिय नहीं है।मन, इन्द्रिय है।
४. श्रवण-मनन-निदिध्यासन में श्रवण विधेय और मनन-निदिध्यासन उसके अंग हैं।श्रवण, विधेय नहीं है और श्रवण-मनन, निदिध्यासन के अङ्ग हैं।
५. जीव, प्रतिबिम्बरूप है।जीव, अन्तःकरणावच्छिन्न है।
६. शुद्ध चैतन्य में अज्ञानाश्रयता है।जीव में अज्ञानाश्रयता है।
७. अज्ञान, एक है।अज्ञान, अनेक है।
८. शुद्ध ब्रह्म, वृत्ति का विषय है।उपहित ब्रह्म, वृत्ति का विषय है।
९. अध्ययन-विधि का प्रयोजन अक्षर-ग्रहण है।अध्ययन-विधि का प्रयोजन अर्थ-ज्ञान है।
१०. भौतिक पदार्थ पञ्चीकृत हैं।भूतों को त्रिवृत्कृत बताया है।
११. सादृश्य, अध्यास के कारण नहीं है।सादृश्य, अध्यास में कारण है।
१२. शब्द से अपरोक्ष ज्ञान होता है।शब्द से अपरोक्ष ज्ञान नहीं होता है।
१३. स्वप्नप्रपञ्च अविद्या का परिणाम है।स्वप्नप्रपञ्च, मन का परिणाम है।

इसके अतिरिक्त और भी कितने ही स्थलों पर वैमत्य है। किन्तु इस वैमत्य से अद्वैत सिद्धान्त की कोई हानि नहीं है। सभी प्रस्थानों का उपेय तो एक ही है। उपाय मात्र भिन्न-भिन्न हैं। इसी अभिप्राय से वार्तिककार ने कहा है—