वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३७ )
| महावाक्यार्थ के ज्ञान से मोक्ष-प्राप्ति तथा मुक्त की चर्या | पुरुष को किसी प्रकार की आकांक्षा न रहने पर भी वह लोक-कल्याणार्थ अनासक्त भाव से कर्म करता रहता है। क्योंकि आसक्तिपूर्वक किया हुआ कर्म ही 'बन्धन' का हेतु होता है। पूर्ण ज्ञानी एवं पूर्ण आनन्द को प्राप्त किया हुआ व्यक्ति आसक्ति से रहित हो जाता |
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है। उसे किसी वस्तु की इच्छा नहीं रहती। वह लाभ, हानि, हर्ष, विषाद से प्रभावित नहीं होता। किन्तु जिसे पूर्णज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई हो उसे आत्म-शुद्धि के लिये निष्काम कर्म का अनुष्ठान अत्यावश्यक है। अहङ्कार और स्वार्थ के बन्धन से मुक्त होने के लिये निष्काम कर्म करना आवश्यक है, न कि निष्क्रियता। जीव ब्रह्मैक्य साक्षात्कार के होने से मोक्ष हो जाने पर भी शरीर रह सकता है, क्योंकि वह प्रारब्धकर्मों का फल है। संसाररूप मिथ्या प्रपञ्च उसके सामने रहने पर भी वह उससे ठगा नहीं जाता। सांसारिक विषयों में उसे तृष्णा नहीं रहती। अतएव उसे कोई दुःख नहीं होता। वह अपने को शरीररूप नहीं समझता। वह संसार में रहते हुए भी उससे बाहर है। ऐसे व्यक्ति को जीवन्मुक्त कहते हैं। अर्थात् जीवित अवस्था में ही वह मुक्ति पा जाता है। स्वर्ग की तरह यह मुक्ति अज्ञात तथा भविष्य की कोई अलौकिक वस्तु नहीं है। शास्त्र में निष्ठा रखकर साधक को आगे बढ़ना पड़ता है, उसके विश्वास का फल उसे इसी जीवन में मिल जाता है।
ये कर्म भी तीन प्रकार के होते हैं ( १ ) सञ्चित ( पूर्वकाल के वे कर्म जो जमा हैं ) ( २ ) प्रारब्ध ( पूर्वकाल के वे कर्म जिनका फलभोग हो रहा है) ( ३ ) क्रियमाण या सञ्चीयमान ( वे नये कर्म जो इस जीवन में जमा हो रहे हैं )।
| तत्त्वज्ञान से सञ्चित-क्रियमाण कर्मों का विनाश किन्तु प्रारब्धकर्म का भोग से ही विनाश और विदेह मुक्ति | तत्त्वज्ञान से अनारब्ध फलक का सञ्चित तथा अनारब्धफलक क्रियमाणकर्म का विनाश हो जाता है और पुनर्जन्म के बन्धन से छुटकारा मिल जाता है परन्तु प्रारब्ध कर्म का निवारण नहीं किया जा सकता। उसका फलभोग करने के लिये यह शरीर ( जो प्रारब्ध का फल है ) विद्यमान रहता है। जब प्रारब्धफलभोग के द्वारा प्रारब्ध कर्म समाप्त हो जाता है तब शरीर का भी अन्त हो जाता है। जैसे कुलाल चक्र, दण्ड के हटा लेने पर भी कुछ देर तक |
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घूमता रहता है और घूमते घूमते वेग शान्त होने पर अपने आप रुक जाता है, उसी तरह प्रारब्धकर्म का भोग के द्वारा विनाश हो जाने पर स्थूल और सूक्ष्म शरीर का अन्त हो जाता है तब विदेह मुक्ति कही जाती है।
वस्तुतः मुक्ति न तो उत्पन्न होती है और न पहले से अप्राप्त है। वह तो प्राप्त ही की प्राप्ति है। बन्धन की अवस्था में जो सत्त्व, अज्ञात रूप से विद्यमान