वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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'अभेद' अर्थ सिद्ध नहीं हो सकता। अजहल्लक्षणा के द्वारा 'अभेद' अर्थ इसलिये सिद्ध नहीं हो सकता कि इस लक्षणा में मुख्यार्थ का त्याग नहीं किया जाता। अतः मुख्यार्थ का त्याग न करने पर 'अभेद' अर्थ सिद्ध नहीं होगा। इसलिये तीसरे प्रकार की लक्षणा यहाँ की जाती है। यहाँ 'तत्' का अर्थ परोक्षत्वविशिष्ट चैतन्य है, और 'त्वम्' का अर्थ अपरोक्षत्वविशिष्ट चैतन्य है। यहां चैतन्यांश में विरोध नहीं है। केवल परोक्षत्व और अपरोक्षत्व इन अंशों में ही परस्पर विरोध है। अतः इन विरुद्ध अंशों का परित्याग कर अखण्ड चैतन्यांश का परिग्रह कर लिया जाता है। इस कारण इस लक्षणा को जहद्-अजहद्-लक्षणा कहते हैं तथा एक ही भाग (अंश) के ग्रहण या त्याग करने के कारण भाववृत्ति या भाग-त्याग लक्षणा भी कहते हैं।
वार्तिककार सुरेश्वराचार्य के मत से तीन सम्बन्धों की सहायता से यह महावाक्य अखण्डार्थ का बोध कराता है। ( १ ) पदों का सामानाधिकरण्य, ( २ ) पदार्थों का विशेषण-विशेष्यभाव, ( ३ ) आत्मा और ब्रह्म का लक्ष्य-लक्षण भाव।
किन्तु वेदान्त परिभाषाकार धर्मराजाध्वरीन्द्र ने बिना लक्षणा के ही 'तत्त्व-मसि' महावाक्य से अखण्डार्थ का बोध माना है। उनका कहना है कि 'तत्त्व-मसि' महावाक्य में विशिष्टवाचक पदों को एकदेशपरत्व रहने पर भी लक्षणा की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि शक्तिवृत्ति से उपस्थित हुए विशिष्टों का जब अभेदान्वय ( अभेद ) नहीं बन सकेगा तो शक्तिवृत्ति से ही उपस्थित हुए विशेष्य भागों में अभेदान्वयबोध का स्वयं पर्यवसान होगा, जैसे—'घटोऽनित्यः'
[परिभाषाकार के मत में लक्षणा के बिना ही महावाक्यार्थ का बोध] इस स्थल में घटपद के वाच्य का एक देश जो घटत्व, वह अनित्य पदार्थ के साथ अन्वित होने के योग्य न होने पर भी अन्वय के योग्य जो घटव्यक्ति, उसके साथ 'अनित्यत्व' का अन्वय स्वयं हो जाता है। अतः लक्षणा की यहाँ कोई आवश्यकता नहीं है। पदार्थ के एक देश की विशेषण रूप से स्वातन्त्र्येण उपस्थिति कराने के लिये लक्षणा की आवश्यकता होती है। जैसे 'घटो नित्यः' में केवल घट पद से शक्तिवृत्ति द्वारा स्वतन्त्र रूप से 'घटत्व' धर्म की उपस्थिति न होने से उसे उपस्थित कराने के लिए 'घट' पद की 'घटत्व' में लक्षणा करनी पड़ती है। एवं च 'तत्त्वमसि' महावाक्य में शक्ति-वृत्ति से स्वातन्त्र्येण उपस्थित हुए तत्त्व पदार्थों के अभेदान्वय बोधन में कोई अड़चन नहीं है।
'तत् त्वम्' पदार्थ का अभेदज्ञान होने पर, जीव-ब्रह्म की भेदबुद्धि से पैदा हुए सम्पूर्ण क्लेशों की निवृत्ति ही नहीं, अपितु 'आनन्दरूपमोक्ष' की प्राप्ति होती है। एवं च 'सत्, चित्, आनन्दरूप ब्रह्म' की अनुभूति होती है। मुक्तात्मा