भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 482 में से

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विषय-विन्यास

प्रत्यक्ष-परिच्छेदः

विषयपृष्ठ
मंगलाचरण
ग्रन्थारम्भ-प्रतिज्ञा
मोक्ष ही परम पुरुषार्थ है और ग्रन्थ का प्रतिपाद्य विषय
प्रमाण और प्रमा का लक्षण—प्रमा के भेद और उसके सम्बन्ध में विचार
प्रमाण के भेद तथा प्रत्यक्ष प्रमाण का निरूपण२०
प्रत्यक्ष प्रमा के सिद्धान्त पर शंका-समाधान२४
प्रत्यक्ष में अन्तःकरण की परिणामात्मक वृत्ति पर विचार२६
अन्तःकरण के सावयव होने का प्रतिपादन२७
कामादिक मनोधर्म हैं—इस पर शंका समाधान३०
मन के इन्द्रियत्व का खण्डन३१
मन की अनिन्द्रियता पर शंका-समाधान३५
ज्ञप्तिगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक कौन है३७
वृत्ति के बहिर्निर्गमन का प्रकार३६
प्रत्यक्षप्रमा में प्रत्यक्षलक्षण का समन्वय४१
विचार का निष्कर्ष४२
सुखादिकों के प्रत्यक्ष में चक्षुरादिसन्निकर्ष की अनपेक्षता४३
स्मर्यमाण सुख में प्रत्यक्षलक्षण की अतिव्याप्ति और उसका निरास४४
पूर्वोक्त समाधान में अरुचि होने से दूसरा समाधान४५
धर्माधर्मविषयक शाब्द ज्ञान में पुनः अतिव्याप्ति और उसका निरसन"
'त्वं सुखी' इस ज्ञान पर पुनः शंका-समाधान४८
वह्नि की अनुमिति में 'पर्वत' अंश का प्रत्यक्ष होता है५०
न्यायमत में लोक-प्रसिद्धि का अतिक्रमण"
असन्निकृष्टपक्षक अनुमिति में ज्ञान सभी अंशों में परोक्ष होता है५२
'सुरभि चन्दनम्' इस ज्ञान में भी 'चन्दन खण्ड' का प्रत्यक्ष और 'सौरभ' अंश का प्रत्यक्ष होता है"
प्रसङ्गप्राप्त जातिखण्डन५४
समवायखण्डन( टीका ) ५७
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