भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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विषयपृष्ठ
एक ही प्रमात्मक चैतन्य में परोक्षत्व और अपरोक्षत्व रूप—परस्पर विरुद्ध दो धर्मों के रहने में कोई विरोध नहीं है६१
ज्ञप्तिगत प्रत्यक्ष का निष्कृष्ट लक्षण,,
विषयगत-प्रत्यक्षत्व का प्रयोजक६२
उस पर शंका-समाधान६३
लक्षण में 'प्रमातृचैतन्य' क्यों नहीं कहा६५
इसी पर अनेक शंकाएँ और समाधान६६
विषयप्रत्यक्ष का निष्कृष्ट लक्षण७३
वृत्ति के चार प्रकार७४
सविकल्पक और निर्विकल्पक भेद से प्रत्यक्ष के दो प्रकार७६
'सोऽयम्' इत्याकारक शब्द ज्ञान में निर्विकल्पक प्रत्यक्षत्व का व्यवस्थापन७८
वेदान्तवाक्यों की अखण्डार्थपरता८३
जीवसाक्षी और ईश्वरसाक्षी के भेद से प्रत्यक्ष के पुनः दो भेद८५
विशेषण और उपाधि के लक्षण,,
नैयायिक लोग उपाधि को ही 'परिचायक' कहते हैं,,
प्रत्येक जीवात्मा का साक्षिचैतन्य भिन्न-भिन्न होता है८७
ईश्वरसाक्षिचैतन्य तथा माया की एकता और अनादिता८८
ईश्वर का स्वरूप और वही ब्रह्मादि शब्दों से वाच्य है९२
औपाधिक सादित्व होने पर की चैतन्य के स्वाभाविक अनादित्व बाध नहीं९४
ज्ञप्तिगत प्रत्यक्ष का सामान्य लक्षण९६
शुक्ति-रजत के प्रत्यक्ष पर विचार९७
उस पर अन्यथाख्यातिवादी का शंका-समाधान९९
अनिर्वचनीय रजत की उत्पत्ति१०३
तूलाविद्या और मूलाविद्या में अन्तर ( टीका१०४
परिणाम और विवर्त के लक्षण१०७
प्रातिभासिक रजत, अविद्या का परिणाम है और चैतन्य का विवर्त है,,
रजत का साक्षी में अध्यास तथा विविध आध्यासिक प्रत्यय१०८
रजतविषयक अविद्यावृत्ति के निष्प्रयोजनत्व की शंका समाधान११४
रजतवृत्ति और इदंवृत्ति की भिन्नविषयता के स्वीकार करने पर गुरुमत के प्रवेश की आशंका११६
प्रातिभासिक और व्यावहारिक पदार्थों में भेद११८