वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
DevanagariHindipublished482 पृष्ठ
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| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| इसी पर वाचस्पति मिश्र का मत | ३८७ |
| ब्रह्मसाक्षात्कार में साधन सुसंस्कृत मन ही है | " |
| इस पर श्रुतिविरोध की आशंका और समाधान | " |
| शास्त्रदृष्टिसूत्र की भी उपपत्ति हो जाती है | ३८६ |
| कर्म का ज्ञान प्राप्ति में उपयोग | ३६० |
| श्रवण-मनन-निदिध्यासन का भी ज्ञानप्राप्ति में उपयोग | ३६१ |
| श्रवण-मंनन-निदिध्यासन की व्याख्या | " |
| ज्ञान के उपायों में वाचस्पति का मत | ३६२ |
| ज्ञान के उपायों में विवरणकार का मत | ३६३ |
| मनन-निदिध्यासन में मीमांसाशास्त्रोक्त श्रवणांगत्व नहीं हैं | ३६४ |
| प्रकरण प्रमाण के द्वारा मनन-निदिध्यासन में श्रवणांगत्व की शंका और उसका निरसन | ३६५ |
| दृष्टान्त और दाष्ट्रान्त में वैषम्य | ३६६ |
| श्रवण से मनन-निदिध्यासन के सम्बन्ध में अपना मत | ३६७ |
| इस पर विवरणाचार्य की सम्मति | " |
| श्रवण का अधिकारी कौन हो सकता है ? | " |
| शमादिषट्क के लक्षण | ३६८ |
| उपरति शब्द के अर्थ में दो पक्ष | " |
| श्रवणजन्य तत्त्वज्ञान की मोक्षसाधनता पर शंका-समाधान | ३६६ |
| कर्म करने वालों की गति | ४०० |
| निर्गुंण ब्रह्मसाक्षात्कार करनेवालेकी प्रारब्ध कर्मों का विनाश होने परमुक्ति | ४०१ |
| इस पर शंका-समाधान | ४०३ |
| संचित कर्मों के प्रकार और उनका वर्गीकरण | ४०५ |
| इस पर शंका-समाधान | ४०५ |
| नाना अविद्या के मानने में गौरव होने से लाघवार्थ तीसरा पक्ष | ४०७ |
| इसी पक्ष में ग्रंथकार की सम्मति | " |
| उक्त पक्ष वाचस्पति मिश्र का है | " |
| इसी पक्ष की समीचीनता | ४०८ |
| प्रयोजन-परिच्छेद का उपसंहार | " |
| चित्रपट के द्वारा वेदान्तपरिभाषा का पुनरवलोकन | ४०६ |
| वेदान्तपरिभाषागत-उद्धरण-संकेत-सूची | ४२२ |
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