वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
( ४३ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| स्वाप्नपदार्थ विचार | १२१ |
| स्वाप्नपदार्थों के शुद्धचैतन्य पर आरोप के अनौचित्य की आशंका | १२६ |
| कार्यविनाश की द्विविधता बताते हुए उसका समाधान | १३० |
| प्रातिभासिकसत्ता के स्वीकार करने पर निषेध की अनुपपत्ति और व्यधिकरणधर्मावच्छिन्न-प्रतियोगिताक-अभाव के स्वीकार करने पर उक्त अनुपपत्ति का निरास | १३४ |
| इसी प्रसंग पर कुछ शंका-समाधान | १३७ |
| उक्त प्रत्यक्ष के प्रकारान्तर से पुनः दो विभाग | १४२ |
| पाँच इन्द्रियाँ | १४३ |
अनुमान-परिच्छेदः
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| अनुमान-प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा तथा अनुमान का लक्षण | १४८ |
| असाधारण कारणत्वरूप का खण्डन | १५० |
| अनुमिति में व्याप्तिज्ञान की करणता पर शंका-समाधान | १५४ |
| उद्बुद्ध संस्कार से ही अनुमिति होती है | १५६ |
| अनुमिति में व्याप्तिस्मरण आदि की हेतुत्वेन कल्पना का खण्डन | १५८ |
| 'पर्वतो वह्निमान्' इत्याकारक अनुमित्यात्मक ज्ञान का खण्डन | १६० |
| व्याप्तिस्वरूप का उपपादन | १६१ |
| अनुमान की त्रिविधता का अनंगीकार | १६३ |
| अनुमान के दो भेद | १६६ |
| प्रकृत में अनुमान का उपयोग | १६८ |
| मिथ्यात्व का लक्षण | १६६ |
| मिथ्यात्व में अनुमान प्रमाण | १७२ |
| मिथ्यात्व के अनुमान पर शंका-समाधान | १७४ |
| पूर्वोक्त समाधान में अरुचि होने पर दूसरा समाधान | १७६ |
उपमान-परिच्छेदः
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| उपमान प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा तथा उपमान प्रमाण का लक्षण | १७६ |
| उपमान को स्वतन्त्र प्रमाण मानने की आवश्यकता | १८२ |
आगम-परिच्छेदः
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| आगमप्रमाण (शब्दप्रमाण) के निरूपण की प्रतिज्ञा तथा उसका लक्षण और प्रमाणभूत वाक्य का लक्षण तथा उसकी शाब्द बोध में कारणता | १८७ |
( ४४ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| आकांक्षा पदों के अर्थ और उनके लक्षणों का निरूपण | १६१ |
| इसी प्रसंग में बलाबलाधिकरण पर विचार | १६५ |
| आकांक्षा के लक्षण पर शंका-समाधान | १६८ |
| योग्यता का लक्षण और उस पर विचार | २०२ |
| आसत्ति का लक्षण और उस पर विचार | २०४ |
| पदार्थ के दो भेद | २०७ |
| पद की शक्ति पर विचार | २१० |
| लक्ष्यपदार्थ के निरूपण की प्रतिज्ञा और लक्षणा पर विचार | २२१ |
| शक्यपरंपरासम्बन्धरूप द्वितीय लक्षणा का प्रकार | २२३ |
| लक्षितलक्षणा में गौणी का अन्तर्भाव | २२४ |
| प्रकारान्तर से लक्षणा के तीन प्रकार तथा जहल्लक्षणा का स्वरूप और उदाहरण | २२५ |
| अजहल्लक्षणा का स्वरूप और उदाहरण | २२८ |
| जहदजहल्लक्षणा का स्वरूप और उदाहरण | २२८ |
| 'सोऽयं देवदत्तः' 'तत्त्वमसि' में अपना मत | २३० |
| विशिष्ट वाचक पद में केवल विशेषण की उपस्थिति लक्षणा से होती है | २३२ |
| तत्त्वमसि आदि वाक्यों में लक्षणा के बिना ही अखण्डार्थ की उपपत्ति | २३३ |
| लक्षणा के तीन प्रकार बताने का उपयोग | २३५ |
| लक्षणा में बीज | २३६ |
| लक्षणा वाक्य में भी होती है | २३८ |
| इस पर शंका-समाधान | २३६ |
| लौकिक वाक्य के समान वैदिक वाक्य में भी लक्षणा होती है | २४० |
| वाक्यैकवाक्यता | २४३ |
| आसत्ति में शाब्दबोध की हेतुता | २४४ |
| तात्पर्य-निरूपण | २४५ |
| अद्वैतियों का तात्पर्य लक्षण | २४७ |
| उस पर शंका समाधान | २४६ |
| तात्पर्यनिराकरणपरक विवरणवाक्य के आशय का उद्घाटन | २५४ |
| रत्नकार के मत से तात्पर्यनिरसनपरक विवरणग्रन्थ की उपपत्ति | २५५ |
| तात्पर्यज्ञान किससे होता है ? | २५६ |
| सिद्धार्थप्रतिपादक वाक्यों की भी प्रामाणिकता | २५८ |
| वेदप्रामाण्य की स्थापना के लिये नैयायिक तथा मीमांसकों के मतों का प्रतिपादन | २५६ |
( ४५ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| वेदप्रामाण्य पर ग्रन्थकार का मत और उस पर शंका-समाधान | २६० |
| अपने सिद्धान्त की स्पष्टता | २६५ |
| अर्थापत्ति-परिच्छेदः | |
| अर्थापत्ति-निरूपण की प्रतिज्ञा और उसका लक्षण | २६६ |
| एक ही अर्थापत्ति शब्द, प्रमा और प्रमाण का वाचक है | २६७ |
| अर्थापत्ति के दो भेद और दृष्टार्थापत्ति का उदाहरण | २६८ |
| श्रुतार्थापत्ति का लक्षण और उदाहरण | २६९ |
| श्रुतार्थापत्ति के अवान्तर भेद | २७० |
| उस पर शंका-समाधान | २७२ |
| अभिहितानुपपत्तिरूप श्रुतार्थापत्ति का लक्षण और उदाहरण | २७३ |
| व्यतिरेक-व्याप्ति से अर्थापत्ति की अचरितार्थता | २७४ |
| उस पर शंका-समाधान | २७६ |
| नैयायिकों के व्यतिरेकी अनुमान का अनावश्यकता | २७७ |
| अनुपलब्धि-परिच्छेदः | |
| अनुपलब्धि प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा और उसका लक्षण | २७८ |
| उस पर शंका-समाधान | २८२ |
| योग्यानुपलब्धि में योग्यता के स्वरूप में अनेक विकल्पपूर्वक प्रश्न | २८३ |
| उनका समाधान | २८५ |
| अनुपलब्धि को पृथक् प्रमाण मानने पर शंका-समाधान | २८८ |
| अभाव के चार प्रकार | ३०० |
| प्रध्वंसाभाव का निरूपण | ३०१ |
| उस पर शंका-समाधान | ३०३ |
| अत्यन्ताभाव का निरूपण | ३०५ |
| अन्योन्याभाव का निरूपण | ३०६ |
| अन्योन्याभाव के भेद | ३०९ |
| उस पर शंका-समाधान | ३१० |
| अभाव की चतुर्विधता पर पूर्वाचार्यों की सम्मति | ३१२ |
| स्वतः प्रामाण्यवाद | ३१४ |
| अप्रामाण्य की परतोग्राह्यता | ३२३ |
| विषय-परिच्छेदः | |
| प्रमाणों में प्रामाण्य के दो प्रकार | ३२६ |
| 'तत्' पदार्थ के निरूपण की प्रतिज्ञा और लक्षण के दो प्रकार तथा स्वरूपलक्षण की परिभाषा तथा उस पर शंका-समाधान | ३२७ |
( ४६ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| तटस्थ लक्षण की परिभाषा | ३२८ |
| कर्तृत्व की परिभाषा | ३२६ |
| ज्ञान, इच्छा, कृति—तीनों मिलकर एक लक्षण नहीं हैं | ३३० |
| ब्रह्म का लघु लक्षण | ३३२ |
| उस पर शंका-समाधान | ३३३ |
| जगत् के जन्मक्रम और सूक्ष्म भूतों के गुणों का निरूपण | ३३४ |
| शब्द केवल आकाश का गुण नहीं है | ३३६ |
| इन्द्रियादि सृष्टि का निरूपण | ३३७ |
| पञ्च कर्मेन्द्रियाँ और प्राणों की उत्पत्ति | ३३८ |
| स्थूल महाभूतों की उत्पत्ति और पंचीकरण का प्रकार | ३३६ |
| लिङ्ग ( सूक्ष्म ) शरीर की उत्पत्ति | ३४० |
| चतुर्विध स्थूल शरीरों की उत्पत्ति | ३४१ |
| ईश्वर में समस्तजगत्कर्तृत्व का निरूपण | ३४२ |
| शंका-समाधान के द्वारा निद्रित और मृत मनुष्य में अन्तर | ३४५ |
| प्राकृत प्रलय का निरूपण | ३४६ |
| नैमित्तिक प्रलय | ३४८ |
| प्राकृत प्रलय और नैमित्तिक प्रलय में प्रमाण | ३४८ |
| आत्यन्तिक प्रलय | ३४६ |
| प्रलय के क्रम का निरूपण | ३५० |
| ब्रह्म का तटस्थ लक्षण | ३५१ |
| ब्रह्म के जगत्कारणात्मक लक्षण पर शंका-समाधान | ३५२ |
| सृष्टिवाक्यों का तात्पर्य | ३५२ |
| उपासनादि वाक्यों का तात्पर्य-निरूपण | ३५४ |
| ईश्वर और जीव के स्वरूप का निरूपण | ३५५ |
| ( प्रतिबिम्बवाद ) 'अनेक जीववाद' पक्ष में दोष होने से अन्य मत-प्रदर्शन | ३५६ |
| एकजीववाद पक्ष पर कुछ आक्षेप और उनका निराकरण | ३५८ |
| सिद्धान्ती के द्वारा प्रदर्शित दृष्टान्त पर शंका-समाधान और 'तत्' पदार्थ के निरूपण की समाप्ति | ३५६ |
| 'त्वं' पदार्थ का निरूपण | ३६० |
| जीव की तीन अवस्थाओं का निरूपण | ३६० |
| अन्तःकरण वृत्ति के अङ्गीकार में मतभेद | ३६१ |
( ४७ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| वृत्ति की आवश्यकता पर दूसरा मत | |
| उस पर शंका-समाधान | ३६५ |
| ग्रन्थकार द्वारा इसी मत का स्पष्टीकरण | ३६६ |
| इस मत में अभियुक्तों की संमति | " |
| अपरिच्छन्न पक्ष में भी वृत्ति की सम्बन्धार्थता | ३६७ |
| परिच्छिन्न पक्ष में वृत्ति की संबन्धार्थता | ३६८ |
| उस पर शंका-समाधान | ३६९ |
| स्वप्नावस्था का निरूपण | ३७० |
| सुषुप्ति का लक्षण | " |
| मरण और मूर्च्छा अवस्थाओं का विवेचन | ३७१ |
| जीव के सम्बन्ध में पुनर्वििवेचन | " |
| जीव की स्वयं प्रकाशता | ३७२ |
| 'तत्' और 'त्वम्' दोनों का ऐक्य | " |
| इस पर शंका और समाधान | ३७३ |
| पूर्वपक्षी के बताये गये अनुमान की व्यवस्था | ३७५ |
| पूर्वपक्षी के किये गये आगम प्रमाण की व्यवस्था | ३७६ |
| जीवात्मा और परमात्मा का ऐक्य मानने पर उनकी विरुद्धधर्माश्रयता की उपपत्ति | ३७६ |
| जीव पर कर्तृत्व के आरोप पर शंका-समाधान | ३७७ |
| इस पर पूर्वपक्षी का पुनः प्रश्नोत्तर | ३७८ |
| विषय-परिच्छेद का उपसंहार | ३८० |
प्रयोजन-परिच्छेदः
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| वेदान्तशास्त्र के प्रयोजन का निरूपण | ३८१ |
| प्रयोजन का लक्षण | ' |
| प्रयोजन की द्विविधता | " |
| मोक्ष का स्वरूप | ३८२ |
| मोक्ष के सम्बन्ध में शंका-समाधान | ३८३ |
| मोक्ष का साधन केवल ज्ञान ही हैं | ३८४ |
| उक्त ज्ञान का विषय जीव ब्रह्म की एकता है | " |
| यह ज्ञान अपरोक्ष है, परोक्ष नहीं | ३८५ |
| अपरोक्ष ज्ञान के साधनों में मतभेद | " |
| इस सम्बन्ध में पद्मपादाचार्य का मत | " |
( ४८ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| इसी पर वाचस्पति मिश्र का मत | ३८७ |
| ब्रह्मसाक्षात्कार में साधन सुसंस्कृत मन ही है | " |
| इस पर श्रुतिविरोध की आशंका और समाधान | " |
| शास्त्रदृष्टिसूत्र की भी उपपत्ति हो जाती है | ३८६ |
| कर्म का ज्ञान प्राप्ति में उपयोग | ३६० |
| श्रवण-मनन-निदिध्यासन का भी ज्ञानप्राप्ति में उपयोग | ३६१ |
| श्रवण-मंनन-निदिध्यासन की व्याख्या | " |
| ज्ञान के उपायों में वाचस्पति का मत | ३६२ |
| ज्ञान के उपायों में विवरणकार का मत | ३६३ |
| मनन-निदिध्यासन में मीमांसाशास्त्रोक्त श्रवणांगत्व नहीं हैं | ३६४ |
| प्रकरण प्रमाण के द्वारा मनन-निदिध्यासन में श्रवणांगत्व की शंका और उसका निरसन | ३६५ |
| दृष्टान्त और दाष्ट्रान्त में वैषम्य | ३६६ |
| श्रवण से मनन-निदिध्यासन के सम्बन्ध में अपना मत | ३६७ |
| इस पर विवरणाचार्य की सम्मति | " |
| श्रवण का अधिकारी कौन हो सकता है ? | " |
| शमादिषट्क के लक्षण | ३६८ |
| उपरति शब्द के अर्थ में दो पक्ष | " |
| श्रवणजन्य तत्त्वज्ञान की मोक्षसाधनता पर शंका-समाधान | ३६६ |
| कर्म करने वालों की गति | ४०० |
| निर्गुंण ब्रह्मसाक्षात्कार करनेवालेकी प्रारब्ध कर्मों का विनाश होने परमुक्ति | ४०१ |
| इस पर शंका-समाधान | ४०३ |
| संचित कर्मों के प्रकार और उनका वर्गीकरण | ४०५ |
| इस पर शंका-समाधान | ४०५ |
| नाना अविद्या के मानने में गौरव होने से लाघवार्थ तीसरा पक्ष | ४०७ |
| इसी पक्ष में ग्रंथकार की सम्मति | " |
| उक्त पक्ष वाचस्पति मिश्र का है | " |
| इसी पक्ष की समीचीनता | ४०८ |
| प्रयोजन-परिच्छेद का उपसंहार | " |
| चित्रपट के द्वारा वेदान्तपरिभाषा का पुनरवलोकन | ४०६ |
| वेदान्तपरिभाषागत-उद्धरण-संकेत-सूची | ४२२ |
—: ० :—
इस पृष्ठ पर कोई पाठ (टेक्स्ट/श्लोक/सूत्र) उपलब्ध नहीं है। यह केवल जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी का एक चित्र (इलस्ट्रेशन) है।
॥ श्रीः ॥
वेदान्तपरिभाषा
'प्रकाश'-हिन्दीव्याख्योपेता
प्रत्यक्षपरिच्छेदः
( मङ्गलाचरणम् )
यदविद्याविलासेन भूत-भौतिक-सृष्टयः ।
तं नौमि परमात्मानं सच्चिदानन्दविग्रहम्¹ ॥ १ ॥
अन्वयः— यदविद्याविलासेन भूतभौतिकसृष्टयः ( भवन्ति ) तं सच्चिदानन्दविग्रहं परमात्मानं नौमि ।
अर्थ— जिसके अविद्यापरिणाम से आकाशादि भूत और उनके समस्त स्थूल सूक्ष्म विकार ( चराचर शरीर ) उत्पन्न होते हैं, उस सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा को मैं प्रणाम करता हूँ ।
विवरण— 'वेदान्तपरिभाषा' वेदान्तशास्त्र का प्रकरण² ग्रन्थ है। धर्मराजाध्वरीन्द्र, इसके रचयिता हैं। ग्रन्थ के आरम्भ में प्रथम श्लोक के द्वारा ग्रन्थकार ने—परमात्मा को नमस्कार रूप-मङ्गलाचरण किया है। आरम्भ किये हुए कार्य की निर्विघ्नतया समाप्ति के लिए आस्तिक जन मङ्गलाचरण किया करते हैं—यह एक शिष्टाचार है। वेदज्ञान-पूर्वक वेदोक्त धर्म का अनुष्ठान करने वालों को शिष्ट कहते हैं, इसलिए शिष्ट लोग धर्म-बुद्धि से जिसे करते हों वह आचार वेदमूलक कहलाता है। अतः कार्य के आरम्भ में मङ्गलाचरण करने का शिष्टाचार भी वेदमूलक है। आस्तिक ग्रन्थकार ग्रन्थ के आरम्भ में 'अपना ग्रन्थ निर्विघ्नतया समाप्त हो, गुरुशिष्यों के अध्ययनाध्यापन द्वारा उसका सम्प्रदाय दीर्घकाल तक चलता रहे' इस आशय से मङ्गलाचरण किया करते हैं। प्रकृत ग्रन्थकार ने भी इसी आशय से पद्यमय मङ्गलाचरण करके, विद्वानों की अपने ग्रन्थ के अवलोकन में प्रवृत्ति कराने के लिए उस मङ्गलाचरण द्वारा विषय और प्रयोजन रूप दो अनुबन्धों को भी प्रदर्शित किया है। 'तं परम् आत्मानं नौमि' उस पर—आत्मा को मैं
१. लक्षणम्-इति पाठान्तरम् ।
२. शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम् ।
आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चित ॥—( वि० ध० पु० )
२ वेदान्तपरिभाषा [ मंगलाचरणम्
नमस्कार करता हूँ। उपर्युक्त श्लोक में यह मुख्य वाक्य है। अवशिष्ट पदों में से 'यदविद्याविलासेन भूतभौतिकसृष्टयः' ये पद परमात्मा का तटस्थलक्षण¹ सूचित करते हैं और 'सच्चिदानन्दविग्रहम्' यह पद स्वरूपलक्षण² को बता रहा है। 'यदविद्याविलासेन' जिस परमात्मा की शक्तिभूत माया के परिणाम से आकाशादि-भूत और उन भूतों के शरीरेन्द्रियादि कार्यों की उत्पत्ति, स्थिति और लय होते हैं (जो परमात्मा भूतभौतिक कार्यों के उत्पत्त्यादिकों का विवर्तोपादान³ है) उस परमात्मा को मैं प्रणाम करता हूँ।
इसी तरह सत्स्वरूप, चित्स्वरूप और आनन्दस्वरूप परमात्मा को मैं प्रणाम करता हूँ। 'सत्, चित् और आनन्द' इन तीन पदों से शून्यवादी बौद्ध, प्रधानकारणवादी सांख्य और परमाणुकारणवादी वैशेषिकों के मत का निरसन किया गया है।
जगत्कारण ब्रह्म, 'सत्' है, क्योंकि 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' (छां० उ० ६-१) यह सब जगत्, उत्पत्ति से पूर्व 'सत्' ब्रह्मरूप था, ऐसी श्रुति है। उसी तरह 'कथमसतः सज्जायेत' असत् से (शून्य से) सद्रूप जगत् कैसे उत्पन्न होगा? (छां० उ० ६-२), शून्यवाद का निषेध करनेवाली यह साक्षात् श्रुति है। इसके अतिरिक्त बौद्ध भी जगत् को अलीक रूप से स्वीकार करते हैं। किन्तु कोई भ्रम, बिना अधिष्ठान के नहीं होता। इसलिये 'जगत्कारण-शून्य' है यह कथन युक्तिरहित है।
'सन्मूलाः सोम्य इमाः सर्वाः प्रजाः' यह सब कार्य (सृष्टि) 'सन्मूल' है—'सत्' ही सब प्रजाओं का मूल है। (छां० उ० ६-८) इत्यादि अन्यान्य अनेक श्रुतियाँ, शून्यवाद के विरोध में हैं।
'अचेतन' (जड) जगत् का कारण जड 'प्रधान' और जड 'परमाणु' हैं, ऐसा क्रमशः सांख्य और वैशेषिक कहते हैं। परन्तु 'तदैक्षत' (छां० ४-२६) 'सोऽकामयत' (तै० १।६) 'आनन्दाद्धयेव खलु इमानि भूतानि जायन्ते' (तै० १।६२) इत्यादि श्रुतियों से जगत्कारण, विज्ञान और आनन्द रूप है—यह निश्चय होता है, इस प्रकार प्रधानकारणवादी और परमाणुकारणवादी सांख्य तथा वैशेषिकों का निरसन हो जाता है। 'परमात्मानम्' इन पदों में से 'आत्मानम्' पद से परमेश्वर के तटस्थत्व (तटस्थता) का निरसन किया है। तटस्थ का अर्थ है आत्मा से पृथक्। परमेश्वर आत्मा से पृथक् नहीं है किन्तु वह, आत्मा ही है। इस बात को 'आत्मानम्' पद से सूचित करके 'परम्' विशेषण से देह, प्राण, मन, बुद्धि और सुषुप्ति के अन्नमय प्रभृति पांच कोशों से पृथक् 'अन्तर्यामी आत्मा' है—यह अर्थ अभिव्यक्त किया गया है। 'अन्तर्यामी' यह 'परमात्मा' पद का वाच्यार्थ है, और पर (माया-सम्बन्धरहित = माया से विलक्षण)
१. यावल्लक्ष्यकालमनवस्थाायित्वे सति यद् व्यावर्तकं तत् तटस्थलक्षणम्।
—(न्या० को०)
२. स्वरूपान्तर्गतत्वे सति व्यावर्तकं यत्, तत् स्वरूपलक्षणम्।—(सर्वद० सं०)
३. ब्रह्मणो विवर्तोपादानत्वात् मायायाश्च परिणाम्युपादानत्वाद् ब्रह्मकारणवादः सूचितो भवति।
मङ्गलाचरणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ३
'आत्मा' ब्रह्म ( शुद्ध चित् ) यह लक्ष्यार्थ है। अर्थात् ग्रन्थकार ने पर और अपर दोनों प्रकार की आत्माओं का वन्दन किया है, और उसी के द्वारा जीव और ब्रह्म का संदिग्ध ( जो प्रत्यक्ष या अनुमान से अज्ञात है ) ऐक्य, इस ग्रन्थ का विषय है, और अज्ञान-निवृत्ति या आनन्दावाप्ति, प्रयोजन है—यह सूचित किया है।
इस प्रकार प्रथम श्लोक में परापर ब्रह्मरूप इष्ट देवता को वन्दन कर 'गुरुप्रसादात् परमार्थलाभः' इत्यादि वचन से 'गुरुप्रसाद', ब्रह्मविद्या प्राप्ति में अन्तरङ्ग साधन है—यह प्रतीत होता है। अतः ग्रन्धारम्भ में गुरु की पूजा अवश्य की जानी चाहिए। इस आशय से प्रथमतः परम गुरु को ग्रन्थकार प्रणाम करते हैं।
( मंगलाचरणम् )
यदन्तेवासि-पञ्चास्यैर्निरस्ता भेदिधारणाः ।
तं प्रणौमि नृसिंहाख्यं यतीन्द्रं परमं गुरुम् ॥ २ ॥
अन्वयः—यदन्तेवासिपञ्चास्यैः भेदिधारणाः निरस्ताः तं यतीन्द्रं नृसिंहाख्यं परमं गुरुं प्रणौमि।
अर्थ—जिनके शिष्यरूपी सिंहों ने भेदवादी गजों का निवारण किया है, उन यति-श्रेष्ठ नृसिंह नामक परम गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।
विवरण—जिसे प्रणाम किया जाय उसकी श्रेष्ठता सिद्ध करनी चाहिए। इसलिये ग्रन्थकार अपने परम गुरु-चरणों का द्वैतनिरसपूर्वक अद्वैत प्रस्थापन रूप कार्य, इस श्लोक में कैमुतिक-न्याय¹ से अभिव्यक्त करते हैं। अन्तेवासी का अर्थ है—जिनका गुरु के समीप रहने का शील है, अर्थात् शिष्य। जिनके अन्तेवासीरूप सिंहों ने, भेदवादिरूप गजों का निरसन किया, उन परम गुरुचरणों को मैं प्रणाम करता हूँ। यति का अर्थ है यत्नशील परमहंस परिव्राजक, उनमें श्रेष्ठ ऐसे 'नृसिंह' नाम के परम गुरु ( गुरु के गुरु ) को मैं शरीर, वाणी और मन के प्रणिधान ( नम्रता व एकाग्रता ) से प्रणाम करता हूँ।
जिन परम गुरु के शिष्यों ने ही द्वैतवाद का खण्डन किया उन गुरु की योग्यता का वर्णन क्या किया जाय ! व्यवहार में भी गुरु की योग्यता, शिष्यों से अभिव्यक्त हुआ करती है। अतः ग्रन्थकार के लिए परम गुरु सर्वथा वन्द्य हैं।
इस श्लोक में 'अन्तेवासिपञ्चास्यैः' बहुवचन का प्रयोग किया है। इससे यह प्रतीत होता है कि ग्रन्थकार के परम गुरु के अनेक विद्वान् शिष्य थे। तथापि इस शब्द का प्रयोग अपने विद्यागुरु के ही उद्देश्य से किया है, क्योंकि अग्रिम श्लोक में विद्यागुरु का
१. कैमुतिकन्याये हि अन्यार्थे तात्पर्यं मर्थवसीयते, स्वार्थे निषेधश्च भवति। यथा 'दोषा वाच्या गुरोरपि' इत्यत्र गुरोस्तु दोषा नैव वाच्याः' छात्रत्वभङ्गापत्तेः। अन्येषां तु सर्वेषामपि वाच्या इत्यर्थः।
४ | वेदान्तपरिभाषा | [ मङ्गलाचरणम्
'जगद्गुरून्' ऐसा बहुवचन से उल्लेख किया है। इससे बहुवचन यहाँ आदरार्थ है—ऐसा व्यक्त होता है। अपने विद्यागुरु को 'पञ्चास्य' कहकर ग्रन्थकार ने अपना अधिकार भी व्यक्त किया है।
वैदिक सम्प्रदाय में वंश दो प्रकार से माना जाता है, एक विद्या द्वारा और दूसरा जन्म द्वारा (एक शिष्य, प्रशिष्य, प्रप्रशिष्य और दूसरा पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र इत्यादि)।
ग्रन्थकार के परम गुरु नृसिंह, उनके शिष्य सिंह और उनके ही विद्यावंश में पैदा हुआ मैं भी सिंह ही हूँ। इसलिये द्वैतवाद का निरसन करने में मैं समर्थ हूँ—यह बात ग्रन्थकार ने यहाँ ध्वनित की है।
'भेदिवारणाः' जीव और ईश्वर में भेद, जड़ और ईश्वर में भेद, जीवों का परस्पर भेद, जड़ और जीव में भेद, और जड़ों का परस्पर भेद—पांच प्रकार के इस भेद को जो लोग सत्य मानते हैं वे भेदी (द्वैतवादी) हैं, उन्हें गज का रूपक देकर अभेदवादी सिंह से वे भेदवादी निरस्त हैं। अर्थात् अभेदवादियों ने उनके भेदवाद का निरसन किया है। यहाँ दृष्टान्त के अनुसार 'निरसन' शब्द से 'नाश' अर्थ विवक्षित न होकर लक्षणा से 'उनके मत का असारत्व व्यक्त करके उनसे अद्वैत सिद्धान्त का ग्रहण करवाया' इतना ही अर्थ समझना चाहिए।
इस प्रकार ग्रन्थकार, परमगुरु को प्रणाम करके अग्रिम श्लोक में प्रत्यक्ष विद्यागुरु को वन्दन करते हैं।$^१$
( मङ्गलाचरणम् )
श्रीमद्वेङ्कटनाथाख्यान् वेलाङ्गुडिनिवासिनः ।
जगद्गुरून्नहं वन्दे सर्वतन्त्रप्रवर्त्तकान् ॥ ३ ॥
**अन्वय—**अहं सर्वतन्त्रप्रवर्त्तकान् वेलाङ्गुडिनिवासिनः श्रीमद्वेङ्कटनाथाख्यान् जगद्गुरून् वन्दे।
**अर्थ—**वेलाङ्गुड़ि ग्राम में रहनेवाले, समस्त शास्त्रों का अध्यापन करनेवाले श्रीमद् वेङ्कटनाथ नामक जगद्गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ।
विवरण—'सर्वतन्त्रप्रवर्त्तकान्' अध्यापन के द्वारा सर्वशास्त्रों के प्रवर्त्तक—इस विशेषण से अपने विद्यागुरु की योग्यता को प्रकट किया है। 'जगद्गुरून्' विशेषण से भी परमतखण्डनपूर्वक स्वसिद्धान्तस्थापन करने का सामर्थ्य सूचित किया है। इन तीन श्लोकों में व्यावहारिक कल्पित भेद का ग्रहण करके अपने इष्टदेवता, परमगुरु और विद्यागुरु को प्रणाम किया है, क्योंकि अद्वैतवाद में वन्द्यवन्दकभाव सम्भव नहीं।
१. श्वेताश्वतर उपनिषद् के 'यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः" इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि पूजा, प्रणाम आदि से उपोद्वलित भक्ति, विद्याप्राप्ति में अङ्ग है।
ग्रन्थारम्भप्रतिज्ञा ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ५
अब ग्रन्थकार अपने चिकीर्षित ग्रन्थ का ग्राह्यत्व तथा श्रद्धेयता सूचित करने के लिए और अपने यश के प्रदर्शनार्थ अपने विविध-ग्रन्थों की रचना को प्रदर्शित कर चिकीर्षित ग्रन्थ की प्रतिज्ञा करते हैं—
( ग्रन्थकर्तुः ग्रन्थनिर्माणयोग्यताप्रदर्शनम् )
येन चिन्तामणौ टीका दशटीकावि(प्र)भञ्जिनी ।
तर्कचूडामणिर्नाम कृता विद्वन्मनोरमा ॥ ४ ॥
( ग्रन्थारम्भप्रतिज्ञा )
ब्रह्म¹-बोधाय मन्दानां वेदान्तार्थविलम्बिनी ।
धर्मराजाध्वरीन्द्रेण परिभाषा वितन्यते ॥ ५ ॥
अन्वयः—येन ( धर्मराजाध्वरीन्द्रेण ) चिन्तामणौ दशटीकाविभञ्जिनी विद्वन्मनोरमा तर्कचूडामणिः नाम टीका कृता ( तेन ) धर्मराजाध्वरीन्द्रेण मन्दानां ब्रह्मबोधाय वेदान्तार्थविलम्बिनी परिभाषा वितन्यते ।
अर्थ—जिस धर्मराजाध्वरीन्द्र ने 'तत्त्वचिन्तामणि' नाम के ग्रन्थ पर दस टीकाओं का खण्डन करने वाली और विद्वानों को आह्लाद देनेवाली 'तर्कचूडामणि' नाम की टीका की, उसी धर्मराजाध्वरीन्द्र के द्वारा मन्दजनों के तत्त्व (ब्रह्म) बोधार्थ वेदान्त के अर्थ का अवलम्बन करने वाली यह परिभाषा ( वेदान्तपरिभाषा ) की जाती है ।
विवरण—वेदान्त के इस प्रकरण ग्रन्थ का विशेषतः नैयायिकों के मत की निःसारता को उन्हीं की प्रक्रिया के द्वारा प्रदर्शित करने के लिए आरम्भ किया गया है । इसलिए ग्रन्थकार न्यायशास्त्र में अपना अधिकार प्रदर्शित करने के लिए स्वरचित पूर्व-ग्रन्थ का निर्देश कर रहे हैं । प्रसिद्ध नैयायिक गंगेशोपाध्याय ने न्याय-शास्त्र पर 'तत्त्वचिन्तामणि' नाम का सुप्रसिद्ध ग्रन्थ लिखा है । उन्हीं से नवीन-न्याय प्रवृत्त हुआ । उनसे पूर्व के नैयायिकों को प्राचीन या जरन्नैयायिक कहते हैं । उनके मत को प्राचीन-न्याय-मत कहते हैं । आजकल प्राचीन-न्याय मत की अपेक्षा नवीन-न्याय का ही अध्ययनाध्यापन अधिकता से चलता है । इस नवीन-न्याय ग्रंथ पर टीका, उपटीका, प्रकरण-ग्रन्थ इत्यादिकों की रचना होने से उसका बहुत बड़ा विस्तार हुआ है । इस ग्रन्थ पर ग्रन्थकार ने दस टीकाओं का खण्डन करने वाली 'चूडामणि' नाम की विद्वन्मान्य टीका लिखी है । यह कहकर न्यायशास्त्र में अपना अधिकार तथा उस ग्रन्थ का महत्त्व और विद्वन्मान्यतादि तीन गुणों को प्रदर्शित किया है । इससे ग्रन्थकार के विद्यागुरु की योग्यता प्रकट होती है । ग्रन्थकार स्वयं महानैयायिक होते हुए भी वेदान्त-सम्प्रदाय के प्रवर्तक थे । अतएव न्यायशास्त्र पर विद्वन्मान्य ग्रन्थ लिखकर भी अपनी कृतकृत्यता न मानकर मन्दबुद्धि, आलसी लोगों को भी सुगमता से तत्त्वज्ञान कराने के लिए वेदान्त के मुख्य तथा अवान्तर प्रतिपाद्य विषयों का प्रतिपादन करने के लिए उन्होंने इस ग्रन्थ का प्रारम्भ किया है । जिन बुद्धिमान् तथा निरलस लोगों को सूत्रभाष्यादि
१. तेन-इति पाठान्तरम् ।
६ | वेदान्तपरिभाषा | [ पुरुषार्थनिरूपणम्
ग्रन्थों के अभ्यास से तत्त्वबोध होता है। उन्हें इस ग्रन्थ की ऐसी आवश्यकता नहीं है। तथापि 'मैं इस ग्रन्थ को मन्दबुद्धियों पर अनुग्रह करने के हेतु लिख रहा हूँ' यह कह-कर ग्रन्थकार ने प्राचीन आकर-ग्रन्थों के विषय में अपना आदर अभिव्यक्त करके वेदान्तसारादि अन्यान्य संक्षिप्त ग्रन्थों से, समस्त वेदान्त के तात्पर्यार्थ-प्रतिपादक इस ग्रन्थ का विषय गतार्थ नहीं हो पाया है, यह भी सूचित किया है। इस ग्रन्थ में वेदान्त की प्रक्रिया से प्रमाण-प्रमेयादि पदार्थों का निरूपण किया गया है। इसलिए इस ग्रन्थ को 'परिभाषा' यह अन्वर्थ नाम दिया गया है।$^१$ 'वेदान्तार्थविलम्बिनी' विशेषण से यह परिभाषा स्वकपोलकल्पित न होकर वेदान्त (उपनिषद्) के प्रतिपाद्य अर्थों का प्रतिपादन करने वाली है। उपनिषदों का मूल आधार होने से इस 'परिभाषा' की प्रामाणिकता ध्वनित होती है।
'बोधाय' पद से तत्त्वज्ञानरूप प्रयोजन (फल) साक्षात् कहा है। इस प्रकार पूर्वोक्त पाँच श्लोकों से इष्ट देवता, देवता, परमगुरु और साक्षात् गुरु को प्रणाम करके 'वेदान्त परिभाषा' ग्रन्थ लिखने की प्रतिज्ञा की गई है। अब इस चिकीर्षित ग्रन्थ की शारीरक मीमांसा से संगति सूचित करने के लिए प्रथमतः इस ग्रन्थ का प्रतिपाद्य बताते हैं—
( पुरुषार्थनिरूपणम् )
इह खलु धर्मार्थ-काम-मोक्षाख्येषु चतुर्विध-पुरुषार्थेषु मोक्ष एव परमपुरुषार्थः, 'न स$^२$ पुनरावर्त्तते' छां० ८-१५-१ इति$^३$ श्रुत्या तस्य नित्यत्वावगमात्। इतरेषां त्रयाणां (तु) प्रत्यक्षेण,$^४$ 'तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते' छां० ८-१-६ इत्यादिश्रुत्या चानित्यत्वावगमात्। स च ब्रह्मज्ञानात्—इति ब्रह्म तज्ज्ञानं तत्प्रमाणं च सप्रपञ्चं निरूप्यते$^५$॥
अर्थ—इस श्लोक में तथा वेदों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चतुर्विध पुरुषार्थों में से मोक्ष ही परम-पुरुषार्थ$^६$ है—यह प्रसिद्ध है। क्योंकि "वह आत्मज्ञ पुनः इस
१. 'परितोव्याप्तां भाषां प्रचक्षते'—[ न्या० को० पृ० ४८० ]
२. न च—इति पाठान्तरम्। ३. इत्यादि—इति पाठान्तरम्।
४. धर्मादित्रयाणां परमपुरुषार्थत्वाभावे प्रत्यक्षेण, यत्कृतकं तत् अनित्यमिति सामा-न्यतोदृष्टानुमानाऽनुगृहीतश्रुत्या च अवगतमनित्यत्वं हेतुः।
५. मोक्ष एव परमः पुरुषार्थः। परमत्वं च निरतिशयत्वे सति क्षयशून्यत्वम्।
६. ननु ब्रह्मज्ञानस्य मोक्षोपायत्वात् ब्रह्मज्ञानमेव निरूपणीयम्। किमर्थं तावद् ब्रह्म-निरूपणम्? इति चेन्न, विषयनिरूपणं विना ज्ञानस्य निरूपणं दुःशकं, यतो ज्ञानस्य विषय-निरूप्यत्वात्। प्राधान्याच्च ब्रह्मणोऽपि निरूपणीयत्वम्। तज्ज्ञानं ब्रह्मज्ञानमित्यर्थः। इत-
पुरुषार्थनिरूपणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ७
संसार में जन्म नहीं लेता" छां० उ० ८।१५। इस श्रुति से मोक्ष की नित्यता ज्ञात होती है। उसी प्रकार मोक्ष के अतिरिक्त अन्य (धर्म, अर्थ, काम) तीन पुरुषार्थों की अनित्यता प्रत्यक्ष से तथा श्रुति से ज्ञात होती है। इस विषय में दृष्टान्त "जैसे इस लोक में कृष्यादि कर्म से संपादन किया हुआ धान्यादि, लोक (फल) क्षीण होता है, उसी तरह परलोक में पुण्यरूप अदृष्ट से संपादन किया हुआ स्वर्गादिलोक भी क्षय को प्राप्त होता है।" छां० उ० ८।१। यह श्रुति दृष्टान्त द्वारा धर्म के फल की अनित्यता को बताती है। और अर्थ तथा काम इन दो पुरुषार्थों की अनित्यता प्रत्यक्ष और श्रुतिरूप प्रमाणों से अवगत होती है। वह नित्य मोक्ष, ब्रह्मज्ञानरूप साधन से ही प्राप्त होता है। इसलिए इस ग्रन्थ में ब्रह्म, उसका ज्ञान और उसमें प्रमाण का सविस्तर निरूपण करते हैं।
विवरण—पुरुष जिसे चाहता है उसे पुरुषार्थ कहते हैं। आब्रह्मस्तम्बपर्यन्त सब जीव, उत्कृष्ट सुख की इच्छा करते हैं। धर्म, अर्थ, काम साक्षात् सुख न होकर सुख के साधन हैं और मोक्ष साक्षात् सुखस्वरूप है। इसलिए वही परम (उत्कृष्ट) पुरुषार्थ है।
परम (निरतिशय) अर्थात् जिससे अधिक सुख नहीं और जिसका कभी क्षय नहीं होता ऐसा पुरुषार्थ सुख ही मोक्ष है। मोक्ष की परम पुरुषार्थता '(सः) न च पुनरावर्तते' इस छान्दोग्य श्रुति ने बताई है। (सः) = ब्रह्मज्ञान से मुक्त हुआ जीव, 'पुनः च' अन्य कल्प के आरम्भ में भी 'न आवर्तते' बार-बार जन्म-मरणरूप ससार को प्राप्त नहीं होता। यह श्रुति का अर्थ है।
इस प्रकार मोक्ष के परम पुरुषार्थत्व में श्रुत्युक्त हेतु बताकर धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थों में नित्यत्व नहीं—इस विषय में भी प्रत्यक्ष और श्रुति इन दो प्रमाणों को दिखाते हैं। अर्थ (वित्त) और काम (पुत्रादि) इनसे पुरुष को सुख होता है, परन्तु ये दोनों सुखसाधन विनाशी हैं। यह हमें 'अतोऽन्यदार्तम्' नित्य भूमाख्य आत्मा से अन्य समस्त विनाशी हैं, इस श्रुति से और प्रत्यक्ष-प्रमाण से भी ज्ञात होता है।
श्रुतिस्मृतिविहित धर्म भी सुख का साधन है, क्योंकि धर्माचरण से पुण्याख्य अदृष्ट अथवा अपूर्व उत्पन्न होता है और उससे मरणोत्तर स्वर्गादि सुख प्राप्त होता है। परन्तु धर्माचरण भी एक प्रकार का कर्म ही है और कर्म से मिलने वाला फल अनित्य होता है, यह प्रत्यक्ष अनुभव है। कृषि, राजसेवा आदि कर्मों से मिला हुआ धान्य, धन आदि फल, उपभोग से क्षीण होता है, यह प्रसिद्ध ही है। इसी प्रकार पुण्याचरण से मरणोत्तर
भयनिरूपणम्प्रमाणाधीनमिति प्रमाणनिरूपणमपि कर्तव्यं भवति । सप्रपञ्चमिति ब्रह्मादित्रितयस्य विशेषणं बोध्यम् । सप्रपञ्चं सपरिकरमित्यर्थः । यस्य निरूपणे यः अपेक्षितो भवति स तस्य परिकरः । निर्गुणत्व-जीवाऽभिन्नत्व-सत्यत्वादयो ब्रह्मपरिकराः । निर्विकल्पकत्व-वेदान्तजन्यत्व-कर्मनिरपेक्षत्वाऽपरोक्षत्वादयो ब्रह्मज्ञानपरिकराः । सिद्धविषयकत्वाऽपरोक्षज्ञानजनकत्व-संसर्गाविषयकत्वादयः प्रमाणपरिकराः । तथा च सप्रपञ्चब्रह्मादिनिरूपणे षण्णाम्प्रमाणानामुपयोगः ।
८ | वेदान्तपरिभाषा | [ पुरुषार्थनिरूपणम्
संपादन किया हुआ स्वर्गादि फल भी क्षीण होता है । इस तथ्य को 'तद्यथेह' इत्यादि श्रुति से अनुगृहीत हुई—'यत्कृतकं तदनित्यम्' व्याप्ति के द्वारा निश्चित किया जाता है । इस विषय में अनुमान¹ इस प्रकार है :—'स्वर्गादिसुख (पक्ष), अनित्य है (साध्य), क्योंकि वह धर्मादिसाधनजन्य है (हेतु), कृषि, सेवा आदि साधनों से प्राप्त होनेवाले सुख की तरह (दृष्टान्त)' । परन्तु इस पर मीमांसक, 'अपाम सोमममृता अभूम' 'अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति' हमलोगों ने सोमपान किया और अमृतत्व पाया, चातुर्मास्य याग करनेवाले को कभी क्षीण न होनेवाला पुण्यफल मिलता है, इस श्रुति के आधार पर "धर्म, अर्थ और काम की भी नित्यता है (प्रतिज्ञा), क्योंकि उनमें पुरुषार्थत्व है (हेतु), मोक्ष के समान (दृष्टान्त) ।"—ऐसा प्रत्यनुमान² करते हैं । परन्तु यह अनुमान, पूर्वोक्त श्रुति के द्वारा अनुगृहीत न होने से बाधित होता है । तथाहि³—'वह्नि उष्ण है, क्योंकि उसमें पदार्थत्व है, सूर्य के समान' इस अनुमान में 'पदार्थत्व' हेतु जैसे बाधित⁴ होता है । क्योंकि जो पदार्थ हो वह उष्ण हो—यह अनुभूत नहीं है । उसी तरह जो पुरुषार्थ हो वह नित्य हो—यह भी अनुभव के विरुद्ध है । क्योंकि अर्थ वित्त, पुरुषार्थ है । परन्तु वह नित्य नहीं है । इसलिए सोमपान का 'अमृत' रूप फल, और चातुर्मास्ययाग का 'अक्षय्य सुख' रूप फल, कर्मजन्य होने से परमार्थ (नित्य) नहीं है । किन्तु वह प्रलय काल तक ही रहने वाला है । पूर्वोक्त श्रुति में 'अमृत' और 'अक्षय्य' शब्द इसी अभिप्राय को व्यक्त करते हैं ।
आभूतसंप्लवं स्थानममृतत्वं हि भाष्यते'—भूतों के, प्रलय पर्यन्त रहनेवाले स्थान को (आकल्प स्थायी पदार्थ को) 'अमृतत्व' कहते हैं, ऐसा वचन है । इस प्रकार मोक्ष ही परम-पुरुषार्थ है, इस बात को सिद्ध कर 'तरति शोकम् आत्मवित्' 'तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति' 'नान्यः पन्था विद्यते अयनाय'—"आत्मज्ञ, शोक को तर जाता है । उसी आत्मा को जान कर मनुष्य मृत्यु का उल्लंघन करता है, आत्मलाभ के लिए ज्ञान के सिवाय दूसरा मार्ग नहीं," इत्यादि श्रुतियों के आधार से ब्रह्मज्ञान ही उसका साधन है, यह मूल ग्रन्थ के 'स च ब्रह्मज्ञानात्' इन शब्दों से कहा गया है ।
'इति'—जबकि मोक्ष ही परम-पुरुषार्थ है और वह ब्रह्मज्ञान से ही प्राप्त होता है ऐसी परिस्थिति में मंदबुद्धि मुमुक्षुजनों पर उपकार करने के लिए ब्रह्म, ब्रह्मज्ञान और
१. स्वर्गादिसुखमनित्यं धर्मादिसाधनजन्यत्वात् कृषिसेवादिसाधनजन्यसुखवत् । २. धर्मार्थकामा नित्याः पुरुषार्थत्वात् मोक्षवत् । ३. वह्निः उष्णः पदार्थत्वात् सूर्यवत् । ४. 'यस्य साध्याभावः प्रमाणान्तरेण निश्चितः स बाधितः' । यत्र यत्र पदार्थत्वं तत्र तत्रोष्णत्व मितिव्याप्तिर्नास्ति । तथैव यः यः पुरुषार्थः स स नित्य इति व्याप्तिर्नास्ति, यतोऽर्थस्य पुरुषार्थत्वेऽपि नित्यत्वं नास्ति ।
प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ९
ब्रह्मज्ञान में प्रमाण इनका इस ग्रंथ में विस्तार के साथ ग्रन्थकार द्वारा निरूपण किया जा रहा है।
( प्रमालक्षणम् )
तत्र प्रमाकरणं प्रमाणम्।¹ तत्र स्मृतिव्यावृत्तं प्रमात्वं, ‘अनधिगताबाधित-²विषयज्ञानत्वम्’। स्मृतिसाधारणं तु ‘अबाधित³-विषयज्ञानत्वम्’ ।
अर्थ- 'तत्र'—ब्रह्म, ब्रह्मज्ञान और उसमें प्रमाण इनमें प्रमा का जो करण ( साधन ) वह प्रमाण है। प्रमा का अर्थ है यथार्थज्ञान। ( कुछ लोग⁴ स्मृति-ज्ञान को प्रमा नहीं मानते। इसलिए यहाँ प्रथमतः स्मृति में न जाने वाला 'प्रमा' का लक्षण कहते हैं— ) अनधिगत और अबाधित विषय का ज्ञान ही प्रमा है। ( परन्तु कुछ लोग स्मृति-ज्ञान को भी प्रमा मानते हैं। इसलिए स्मृति तथा अनुभव इन दोनों ज्ञानों के लिए जो साधारण हो ऐसा प्रमा का दूसरा लक्षण करते हैं ) अबाधित विषय का ज्ञान ही प्रमा है। यही स्मृति साधारण प्रमा है।
विवरण- 'न हि लक्षणप्रमाणाभ्यां विना वस्तुसिद्धिः'—लक्षण और प्रमाण के बिना किसी वस्तु की सिद्धि नहीं हुआ करती, ऐसा न्याय है। अतः यहाँ पर प्रमाण का
१. प्रमेयनिंरूपणम्प्रमाणाधीनमिति प्रथमं प्रमाणमेव निरूपणीयम्। विशेषज्ञानस्य सामान्यज्ञानपूर्वकत्वात् प्रथमं तावत् प्रमाणस्य सामान्यलक्षणं निरूप्यते। प्रमाणलक्षणस्य प्रमाघटितत्वात् प्रथमं तावत् प्रमात्वं निरूप्यते। तत्र अभिव्यक्तचैतन्यस्यैव प्रमात्वं, तस्यैव अज्ञानविरोधित्वात्। अतोऽज्ञानविरोधिचैतन्यस्यैव प्रमात्वमुच्यते। अन्तःकरणपरिणामरूपाया वृत्तेस्तु जडत्वात् नाऽज्ञानविरोधित्वमिति न प्रमात्वम् किन्तु प्रमाकरणत्वेन तस्याः प्रमाणत्वम्। इन्द्रियादेः प्रमाणत्वव्यवहारस्तु प्रमाणजनकतया गौणो विज्ञेयः। न्यायरत्नावलीकाराणामपि एतदभिमतम्— "चक्षुरादेः प्रमाणत्वव्यवहारस्तु वृत्तिजनक तयौपचारिकः" इति स्थितिः, तथापि प्रत्यक्षपरिच्छेदे चैतन्यस्य प्रमात्वम्, अनुमानपरिच्छेदे वृत्तेः प्रमात्वं दर्शितवान् ग्रन्थकारः। तत्र स्वाकार-वृत्त्यभिव्यक्तचैतन्यस्य प्रमात्वे वृत्तेः करणत्वम् व्यापारस्तु वृत्ति-विषययोः सम्बन्धः, स च सर्वप्रमाणसाधारणः। वृत्तेः प्रमात्वे तु करणानि इन्द्रियाणि व्याप्तिज्ञानादीनि च। व्यापारस्तु विषयेन्द्रियसम्बन्धरूपो व्याप्तिसंस्कारादिरूपश्च।
२-३. तार्थविषयक—इति पाठान्तरम्।
४. माध्व-वैशेषिकादयः स्मृतेः प्रमात्वं स्वीकुर्वन्ति, किन्तु नैयायिकादयः स्मृतेः प्रमात्वं न स्वीकुर्वन्तीतिमतद्वयम्। तथा च प्रमात्वं स्मृत्यवृत्ति स्मृतिवृत्तिचेति। तत्र व्यवहारे भाट्टनय इतिचित्सुखाचार्योक्तमनुस्मरन् भाट्टाभिमतं स्मृत्यवृत्ति-प्रमात्वस्य स्वरूपं 'स्मृतव्यावृत्त'मिति ग्रन्थेनोक्तवान् ग्रन्थकारः।
| १० | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम् |
|---|
निरूपण करने के लिए प्रारम्भ में ही प्रमाण-लक्षण बताया गया है ‘प्रमाकरणं प्रमाणम्’। यहाँ ‘प्रमाण’ यह लक्ष्य है और ‘प्रमाकरण’ यह उसका लक्षण है। अब इस लक्षण में पदकृत्य बताते हैं—यहाँ यह शंका हो सकती है कि ‘करणम्’ इतना ही प्रमाण का लक्षण न करके ‘प्रमाकरणम्’ इतना बड़ा लक्षण क्यों किया है ? और ‘करण’ क्या वस्तु है अर्थात् ‘करण’ किसे कहते हैं ?
उत्तर—‘करणं प्रमाणम्’ इतना ही यदि प्रमाण का लक्षण किया जाय तो ‘दण्डादि’ भी घटादिकों का करण हुआ करता है तो दण्डादिकों को भी ‘प्रमाण’ कहना पड़ेगा अर्थात् प्रमाण का लक्षण दण्ड आदि में अतिप्रसक्त (अतिव्याप्त) होगा। यह अतिव्याप्ति दोष न आने पावे इसलिये ‘प्रमा का जो करण, वह प्रमाण है’ ऐसा कहना आवश्यक हो जाता है। ‘व्यापारवत् असाधारणं कारणं करणम्’। व्यापारवान् होकर किसी कार्य के प्रति जो असाधारण कारण होता है उसे ही ‘करण’ कहते हैं। ‘प्रमाकरणम्’ यह प्रमाण का सामान्य लक्षण है। इस लक्षण में जो प्रमा शब्द है उसका क्या अर्थ है ? उत्तर—‘प्रमा’ का अर्थ है ‘यथार्थज्ञान’। यथार्थज्ञान, स्मृति और अनुभव भेद से दो प्रकार का है। परन्तु कुछ लोग प्रत्यक्षादि प्रमाणों से उत्पन्न होने वाला जो अनुभव रूप ज्ञान है उसी को ‘प्रमा’ कहते हैं। स्मृति साक्षात् प्रत्यक्षादि प्रमाणों से उत्पन्न नहीं होती, किन्तु प्रत्यक्षादि अनुभव से संस्कार उत्पन्न होता है और संस्कार से स्मृति उत्पन्न होती है। संस्कारों में, प्रमाणत्व न होने से स्मृति को भी प्रमा नहीं माना जाता। इसलिए इस मत में स्मृति को छोड़कर केवल अनुभवात्मक प्रमा का ‘अनधिगताबाधित विषयज्ञानत्वं प्रमात्वम्’ यह लक्षण किया गया है। इसमें ‘प्रमात्वम्’ यह लक्ष्य है और ‘अनधिगत-अबाधित-विषयज्ञानत्वम्’ यह लक्षण है।
‘अनधिगत’—पूर्व ज्ञात न हुआ, ‘अबाधित’—दूसरे प्रमाण से ( उत्तर ज्ञान से ) मिथ्या सिद्ध न होने वाला ( बाधित न होने वाला ) जो विषय, उसका ज्ञान ही प्रमा कहा जाता है। स्मृति का विषय ( जिसका स्मरण होता है वह पदार्थ ), पूर्व अधिगत ( ज्ञात ) हुआ रहता है। क्योंकि बिना अनुभव के स्मरण नहीं होता। इसलिये लक्षण में विषय का ‘अनधिगत’ यह विशेषण लगाने से स्मृति के विषय की व्यावृत्ति हो गई। इसी प्रकार ‘शुक्तौ इदं रजतम्’ शुक्ति ( सीप ) में रजत ( चाँदी ) का ज्ञान होता है। इस ज्ञान का विषय रजत है। परन्तु उसका प्रमाण के द्वारा विवेचन किये जाने पर बाध होता है। अतः शुक्ति में होने वाला रजत-ज्ञान ‘प्रमा’ नहीं है। ऐसे बाधित विषय की निवृत्ति करने के लिए लक्षण में विषय का ‘अबाधित’ यह विशेषण लगाया गया है। अर्थात् ‘अनधिगत और अबाधित विषय का जो ज्ञान, वही प्रमा है’ यह लक्षण स्मृति में घटित न होने से केवल अनुभवात्मक प्रमा का निर्दोष लक्षण है। इस लक्षण के ‘विषयज्ञानत्व’ इस शब्द में जो ‘ज्ञान’ पद है, वह ‘प्रमा’ का स्वरूप बताने के लिए है। इच्छादि अन्तःकरण-वृत्तिरूप नहीं है। इच्छा भी एक प्रकार का अन्तःकरण-
प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः ११
वृत्तिरूप ज्ञान ही है, परन्तु 'अनधिगत' = अज्ञात इस विशेषण से उसका निरसन हो जाता है क्योंकि ज्ञात हुए विषयों में ही इच्छादि उत्पन्न होती है।
अथवा चक्षुरादिकों में लक्षण की अतिव्याप्ति न हो इसलिए प्रमा के लक्षण में 'ज्ञान' पद दिया गया है। क्योंकि चक्षुरादिकों में भी घटादिस्फुरण के द्वारा घटादि-विषयत्व माना गया है। यहाँ पर ज्ञान का अर्थ ज्ञप्ति = अनुभव है। इस कारण उसका करण जो अन्तःकरणवृत्तिरूप ज्ञान है, उसमें इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती।
पहले बता चुके हैं कि जिस स्मृति का विषय यथार्थ होता है अर्थात् उत्तरज्ञान से बाधित नहीं होता ऐसी स्मृति को भी कुछ लोग प्रमाण मानते हैं। इसलिए 'अबाधित-विषयज्ञानत्वं प्रमात्वम्' ऐसा दूसरा स्मृतिसाधारण लक्षण किया है। साधारण का अर्थ है अनेक में रहने वाला। 'उत्तर ज्ञान से बाधित न होनेवाले विषय का ज्ञान ही प्रमा है' यह लक्षण अनुभव और स्मृति इन दोनों ज्ञानों में समान रूप से घटित होता है। इसलिए प्रमा का यह लक्षण स्मृति-साधारण है। प्रथमतः 'अयं घटः' यह घट है ऐसा ज्ञान होता है और उसका किसी उत्तर-ज्ञान से बाध भी नहीं होता। उस ज्ञान से अन्तःकरण में सूक्ष्म संस्कार उत्पन्न होते हैं। उन संस्कारों से आगे चलकर कुछ समय के अनन्तर उसी घट का स्मरण होता है। इस स्मृति का विषय अबाधित घट होने से यह स्मृति प्रमा है। इसी प्रकार अबाधित घट का ज्ञान भी प्रमा है। परन्तु इसके विपरीत शुक्ति में रजत का ज्ञान होने पर अथवा रज्जु में सर्प का ज्ञान होने पर उसके समीप जाकर क्या सचमुच यह रजत ही है और सर्प ही है ? इस प्रकार प्रमाण के द्वारा निरूपण करने लगते हैं तब यह रजत न होकर शुक्ति है, और यह सर्प न होकर रज्जु है, यह ज्ञान होता है। इस उत्तर ज्ञान से पहले उत्पन्न हुए रजत ज्ञान और सर्प-ज्ञान बाधित हो जाते हैं, इसलिए ऐसे स्थलों में यह अनुभवरूप ज्ञान बाधित-विषय है, प्रमा नहीं है। ऐसे बाधित-विषय की कालान्तर में होनेवाली स्मृति भी प्रमा नहीं है। इसलिए स्मृति और अनुभव इन दोनों प्रमाओं का 'अबाधित-विषय-ज्ञानत्वम्' यह साधारण लक्षण है। अनुभव और स्मृति ये दोनों ज्ञान यथार्थ तथा अयथार्थ भेद से दो प्रकार के हुआ करते हैं। इस लक्षण में भी 'ज्ञान' पद पहले की तरह इच्छादिकों की व्यावृत्ति कराने के लिए है।
प्रश्न—'अयं घटः, अयं घटः यह घट, यह घट, यह घट इस धारावाहिक अनुभव ज्ञान में 'यह घट' यह ज्ञान, दूसरे, तीसरे, चौथे आदि सभी ज्ञानों में क्रमशः (पूर्व पूर्व ज्ञान) विषय है। इसलिए द्वितीयादि ज्ञानों में अधिगतविषयत्व है। इस कारण 'अनधि-गतविषयज्ञानत्व' यह पहला लक्षण धारावाहिक प्रमा-ज्ञान में अव्याप्त हो रहा है।
नीरूपस्यापि ¹कालस्येन्द्रियवेद्यत्वाभ्युपगमेन धारावाहिक-बुद्धेरपि
१. कालस्य नीरूपत्वं सर्वसम्मतम्। द्रव्यप्रत्यक्षे महत्त्वसमानाधिकरणस्योद्भूतरूप-वत्त्वस्य प्रयोजकत्वात् कालस्य च द्रव्यस्य रूपाभावात् अतीन्द्रियत्वं नैयायिकैरभ्युपगतम्।
१२ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रमालक्षणम्
पूर्वपूर्वज्ञानाविषयतत्तत्क्षणविशेष-^१विषयकत्वेन न तत्राव्याप्तिः ।
**अर्थ—**रूपरहित काल को हम इन्द्रियविषयत्व मानते हैं अर्थात् चक्षुरिन्द्रिय से काल का प्रत्यक्ष होता है। इस कारण धारावाहिक बुद्धि को भी पूर्व-पूर्व ज्ञान का विषय न होनेवाला जो उत्तर-उत्तर द्वितीय, तृतीयादि क्षण तद्विषयकत्व है, अतः धारावाहिक बुद्धि में भी प्रथम लक्षण की अव्याप्ति नहीं है।
विवरण—'जिस द्रव्य में महत्त्व-परिमाण और उद्भूत-रूप रहता है वही द्रव्य, चक्षु का विषय होता है अर्थात् आँख से दिखाई देता है, यह तार्किकों का सिद्धान्त है। किन्तु 'इस समय घट है' यह अनुभव सभी को होता है। उपर्युक्त वाक्य में 'इस समय' यह पद वर्तमान-काल का बोध करा रहा है अर्थात् काल का प्रत्यक्ष होता है यह बात सिद्ध हो रही है। इसलिये द्रव्य के चाक्षुष प्रत्यक्ष में महत्त्व और उद्भूत रूप कारण हुआ करता है, यह (तार्किकों का) सिद्धान्त काल-रूप द्रव्य को छोड़कर इतर द्रव्यों के बारे में है; ऐसा समझना चाहिये। क्योंकि तार्किकों के कथनानुसार जिसमें महत्त्व और उद्भूत रूप नहीं होते उसका चक्षु से प्रत्यक्ष नहीं होता है। ऐसा यदि मान लिया जाय तो रूप-रहित रूप का भी चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं होता है यह कहना पड़ेगा। परन्तु रूप तो प्रत्यक्ष दिखाई देता है किन्तु उसमें उद्भूत रूप तथा महत्त्व नहीं होता। क्योंकि वैशेषिक लोग 'गुण' में गुण की स्थिति नहीं मानते। 'रूप' गुण है इसलिए 'रूप' नामक गुण में उद्भूत रूप नामक दूसरा गुण रहता है, यह कदापि नहीं कह सकते। इसी न्याय से रूपरहित काल भी चक्षुरिन्द्रिय का विषय होता है। 'अयं घटः, अयं घटः, अयं घटः', यह धारा-वाहिक बुद्धि भी, पूर्व-पूर्व ज्ञान का विषय न होने वाला जो उत्तर-उत्तर क्षण उसको विषय करती है। अर्थात् 'यह घट' इस प्रकार प्रथम क्षण में होनेवाले ज्ञान का विषय प्रथम क्षण में स्थित 'घट' होता है। दूसरे-तीसरे क्षण में होने वाले ज्ञान का विषय बनने वाला 'घट', पूर्व क्षण के ज्ञान का विषय बने हुए घट से भिन्न है। प्रथम क्षण में जिस 'घट' का ज्ञान हुआ, वह 'घट' प्रथम क्षण के साथ ही निवृत्त हुआ। इस कारण दूसरे क्षण के ज्ञान का विषय बनने वाला 'घट', पूर्व क्षण के ज्ञान का विषय बने हुए घट से पृथक् है। इसी प्रकार तृतीयक्षणीय ज्ञान का विषयभूत 'घट', द्वितीय क्षणिक ज्ञान के विषयभूत घट से भिन्न है। अतः धारावाहिक ज्ञान कितने ही क्षण तक होते रहने पर भी प्रत्येक क्षण के ज्ञान का विषय 'घट' भिन्न-भिन्न होने से धारावाहिक ज्ञान में
मीमांसकैः कालस्येन्द्रियवेद्यत्वमभ्युपगम्यते । तथा चोक्तं—"न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यत्र कालो न भासते" इति । 'इदानीं घटः' इत्यादिप्रतीतौ कालविशेषस्य विषयत्वेनानुभवात् । अन्यथा गृहीतेऽपि घटे, 'घटो वर्तमानो नवा' इत्याकारको वर्तमानतासंशयो लोकस्य भवेत् । न च तथा, तस्मात् कालस्य प्रत्यक्षत्वं स्वीकार्यम् ।
१. विशिष्ट-विषयत्वेन-इति पाठान्तरम् ।
प्रमालक्षणम् ] प्रत्यक्षपरिच्छेदः १३
अधिगतविषयत्व नहीं आ पाता । इसलिए 'अनधिगतज्ञानविषयत्व' यह प्रमा का लक्षण धारावाहिक बुद्धि में भी ठीक घटित हो जाता है इसलिए धारावाहिक बुद्धि में लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती है। यह प्रथम-क्षण का घट, यह दूसरे क्षण का घट, यह तीसरे क्षण का घट, यह चौथे क्षण का घट इस प्रकार की धारावाहिक बुद्धि के अनेक क्षणों में से प्रत्येक क्षण का विषय ( घट ) उस-उस क्षण से विशिष्ट होने से भिन्न-भिन्न है। पूर्व क्षण-विशिष्ट विषय ही उत्तर-क्षण के ज्ञान का विषय नहीं है। इसलिए उसे अधिगत ( ज्ञात ) नहीं कह सकते । अतः धारावाहिक बुद्धि में 'अनधिगतविषयज्ञानत्व' इस लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती । धारावाहिक बुद्धि के, उत्तर-उत्तर क्षण में पूर्व-पूर्व क्षण का विषय ही यदि प्रतीत हुआ होता तो प्रमा का 'अनधिगतविषयत्व' यह लक्षण वहाँ अव्याप्त हुआ होता, परन्तु वैसा नहीं है, अतः प्रमा के प्रथम लक्षण में अव्याप्ति दोष नहीं है।
शंका—'इस समय घट है' इस वाक्य के 'इस समय' शब्द से वर्तमान काल का प्रत्यक्ष हो रहा है, ऐसा यदि कहें तो 'आकाश में बलाका' इस प्रतीति के बल से 'आकाश का प्रत्यक्ष हो रहा है' यह भी आप को कहना पड़ेगा । इस पर कदाचित् आप यह कह दें कि आकाश का प्रत्यक्ष होना तो हमें इष्ट ही है, परन्तु आप ऐसा कह नहीं सकते, क्योंकि आकाश का यदि प्रत्यक्ष हुआ करता तो उसका अस्तित्व सिद्ध करने के लिए 'शब्द' जिसका लिङ्ग है ऐसे अनुमान प्रमाण का अनुसरण करने की आवश्यकता नहीं होती । परन्तु प्रायः सभी वादी आकाश का अस्तित्व, शब्दलिङ्गक-अनुमान प्रमाण से ही सिद्ध करते हैं ।
इसके अतिरिक्त आकाश का प्रत्यक्ष होता है ऐसा मानने पर 'अप्रत्यक्षेऽपि ह्याकाशे बालास्तलमलिनताद्यध्यस्यन्ति' आकाश के अप्रत्यक्ष रहने पर भी अज्ञ लोग तलमलिनता आदि का अध्यास करते हैं ( ब्र. सू. भाष्य ), भाष्यकार के इस कथन से विरोध होगा । 'रूपरहित रूप के समान ही रूपरहित काल का भी चाक्षुष ज्ञान होना सम्भव है' यह आपने पहले कहा है । परन्तु महत्त्व और उद्भूत रूप से रहित द्रव्य का चाक्षुष ज्ञान नहीं हुआ करता, ऐसा हम तार्किकों का सिद्धान्त है। इसलिए 'रूपरहित रूप' का जो कि गुण है चाक्षुष ज्ञान हो सकेगा, लेकिन, रूपरहित 'काल' का जो कि द्रव्य है, चाक्षुष ज्ञान नहीं हो सकता । यही कारण है कि सामने पड़े हुए चन्दन के टुकड़े को देखकर यह 'सुरभि० ( सुगन्धि ) चन्दन है', इस चाक्षुषज्ञान में 'सौरभ' की परोक्षता और 'चन्दन' की चाक्षुषता जिस प्रकार है उसी प्रकार 'इस समय यह घट है' इस वाक्य के 'इस समय' इस काल के अंश में परोक्षता ही है, ऐसा समझिये, उसे चाक्षुषता नहीं है । अर्थात् धारावाहिक बुद्धि में प्रत्येक रूपरहित क्षण को चाक्षुषत्व न होने से ऊपर दिये गये अव्याप्ति दोष की वैसी ही स्थिरता रही ।
समाधान—आप सच कह रहे हैं। परन्तु उपर्युक्त समाधान हमने आपके मत के