भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 482 में से

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वाक्यैकवाक्यताविचारः ] आगमपरिच्छेदः २४३

प्राशस्त्य या निन्दित का निन्दितत्व अर्थ का ही बोधन करते हैं । इसलिए समस्त वाक्य से लक्षणा के द्वारा जितने अर्थ का ज्ञान होता है । उतने ही अर्थ का ज्ञान, प्रशस्त अथवा निन्द्य पदों से भी होता है । इस कारण प्राशस्त्यादि अर्थ, पदार्थरूप ही समझा जाता है । अतः अर्थवाद भी पदरूप है । और उसकी विधि के साथ एकवाक्यता होकर जो बोध होता है, वह पदैकवाक्यता से ही होता है । इसलिए अर्थवादों में पदैक-वाक्यता ही होती है । वाक्यैकवाक्यता नहीं होती ।

यदि अर्थवाद-वाक्यों में वाक्यैकवाक्यता नहीं होती, तो वह कहाँ होती है ? इस प्रकार अकांक्षा का उत्थापन कर उसका उत्तर ग्रन्थकार स्वयं देते हैं —

क्व तर्हि वाक्यैकवाक्यता ? । यत्र प्रत्येकं भिन्न-भिन्न-संसर्ग-प्रतिपादकयोर्वाक्ययोराकाङ्क्षावशेन महावाक्यार्थ-बोधकत्वम्¹ । यथा ‘दर्श²पूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत’ इत्यादि-वाक्यानां ‘समिधो यजति’ इत्यादि-वाक्यानां च परस्परापेक्षिताङ्गाङ्गि³-बोधक-⁴वाक्य-तयैकवाक्यता । तदुक्तं भट्टपादैः—

स्वार्थबोधे समाप्तानामङ्गाङ्गित्वाद्यपेक्षया । वाक्यानामेकवाक्यत्वं पुनः संहत्य जायते ॥ इति ।

**अर्थ—**अच्छा तो, वाक्यैकवाक्यता कहाँ होती है ? ( उत्तर— ) जहाँ भिन्न-भिन्न संसर्गप्रतिपादक ( अर्थप्रतिपादक ) दो वाक्यों को परस्पर आकांक्षा के कारण महा-वाक्यार्थ-बोधकत्व होता है वहाँ वाक्यैकवाक्यता होती है । जैसे—‘स्वर्गकाम व्यक्ति ( पुरुष ) दर्श-पूर्णमास याग करे’ इत्यादि वाक्य और ‘समिध नामक याग करे’ आदि दूसरे प्रयाजवाक्यों को परस्पर अपेक्षित अङ्गाङ्गिभावबोधकत्व होने से उनकी जो एक-वाक्यता सिद्ध होती है, वही वाक्यैकवाक्यता है । अतएव भट्टपाद ने ऐसा कहा है—प्रथमतः स्वार्थ का बोध कराकर चरितार्थ हुए वाक्यों की परस्पर अंगांगिभाव की अपेक्षा से पुनः समुदायरूप से एकवाक्यता होती है ।

**विवरण—**अर्थवादों के वाक्यरूप होने पर भी उनमें पदैकवाक्यता ही यदि संमत है तो वाक्यैकवाक्यता का उदाहरण कहाँ होगा ? इस आशंका के प्रसङ्गतः प्राप्त होने पर ग्रन्थकार वाक्यैकवाक्यता का उदाहरण बताते हैं । ‘दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत’ स्वर्गेच्छु पुरुष दर्श-पूर्णमास नामक याग करे—इस विधिवाक्य के सुनते ही ‘दर्शपूर्णमास-याग, स्वर्ग का साधन है’ यह अर्थ समझ में आता है । इसी प्रकार ‘समिधो यजति’—समिध्संज्ञक याग करे—इत्यादि विधिवाक्य से समिध् याग का विधान भी प्रतीत होता


१. 'म् तत्रवाक्यैकवाक्यता'—इति पाठान्तरम् । २. 'पोर्ण'—इति पाठान्तरम् । ३. 'ङ्गिभावबो'—इति पाठान्तरम् । ४. 'कतयैकवाक्यत्वम्'—इति पाठान्तरम् ।