वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४४ | वेदान्तपरिभाषा | [ आसत्तिनिरूपणम्
है परन्तु दर्श-पूर्णमास याग से स्वर्ग कैसे संपादन किया जाय ? इस प्रकार अंगीभूत याग को अंगों की आकांक्षा होती है । उसी प्रकार 'समिधो यजति' इत्यादि प्रयाजरूप यागों का प्रत्यक्ष फल कुछ भी न बताने के कारण इस याग से क्या साध्य है ? ऐसी साध्य ( अंगी ) की आकांक्षा होती है । इस कारण प्रथमतः स्वार्थ में चारितार्थ हुए दोनों प्रकार के वाक्यों का परस्पर अन्वय होकर समिधादिरूप अंगों का अनुष्ठान कर 'दर्श-पूर्णमास याग से स्वर्ग को पाना चाहिये' इस प्रकार से जो अंगांगिभावरूप महावाक्यार्थ निष्पन्न होता है — उसी को वाक्यैकवाक्यता कहते हैं । यहाँ एक वाक्यार्थ का दूसरे वाक्यार्थ के साथ अन्वय होता है और उन दो वाक्यों से मिलकर एकरूप तात्पर्य निश्चित होता है, इसलिये इसे वाक्यैकवाक्यता कहते हैं। इसी न्याय के अनुसार अन्यत्र भी अंगबोधक एवं अंगिबोधक वाक्यों की एकवाक्यता समझ लेनी चाहिये ।
ग्रन्थकार ने अपने इस कथन में 'तदुक्तम् ०' इत्यादि ग्रन्थ से मीमांसकों की सम्मति प्रदर्शित की है । मीमांसकों का यह आशय है—प्रत्येक वाक्य की स्वसंनिहित-पदों से कर्मतादिसम्बन्ध से अन्वय होकर पदैकवाक्यता होती है, और प्रत्येक वाक्य का भिन्न-भिन्न शाब्दबोध होने पर वह वाक्य यदि अंगी याग का बोधक हो तो उसे अंग की और वह वाक्य अंग प्रतिपादक हो तो अंगी की—इस प्रकार वाक्यों में परस्पर आकांक्षा होती है । दर्श-पूर्णमास याग से स्वर्ग कैसे संपादन किया जाय—इस आकांक्षा की 'प्रयाजादि अंगों का अनुष्ठान कर दर्श-पूर्णमास याग करे' इस प्रकार निवृत्ति होने से दोनों वाक्यों का परस्पर अन्वय होकर जो एकवाक्यता ( एक तात्पर्य-प्रतिपादकत्व ) सिद्ध होता है—यही महावाक्यार्थ है और उसी को वाक्यैकवाक्यता कहते हैं ।
इसी प्रकार 'पदार्थश्च द्विविधः०' से पदार्थ के द्विविधत्व का आरम्भ किया हुआ निरूपण समाप्त कर उसका उपसंहार करते हैं और प्रकृतप्राप्त आसत्ति में शाब्दज्ञानहेतुत्व को बताते हैं ।
एवं द्विविधोऽपि पदार्थो निरूपितः ।
तदुपस्थितिश्चासत्तिः । सा च शाब्दबोधे हेतुः, तथैवान्वयव्यतिरेकदर्शनात् । एवं महावाक्यार्थ-बोधेऽवान्तरवाक्यार्थ-बोधो हेतुः, तथैवान्वयाद्यवधारणात् ।
अर्थ— इस प्रकार से शक्य और लक्ष्य दोनों पदार्थों का निरूपण कर दिया ।
पदजन्य पदार्थ की अव्यवधान से उपस्थिति को ही आसत्ति कहते हैं । वह शाब्दबोध में कारण होती है । क्योंकि आसत्ति रहने पर शाब्दबोध होता है और आसत्ति के न रहने पर शाब्दबोध नहीं होता—यह अन्वय-व्यतिरेक प्रत्यक्षतया सभी के अनुभव में आता है । इसी प्रकार महावाक्यार्थ का बोध होने में अवान्तर वाक्यों के प्रत्येक वाक्य का ज्ञान कारण होता है, क्योंकि उसके अन्वयादि का भी वैसा ही निश्चय होता है ।