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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 482 में से

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पृष्ठ 303

तात्पर्य्यनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २४५

विवरण—आसत्ति के लक्षण में 'पदजन्यपदार्थोपस्थितिः' कहा गया है। अब पदार्थ क्या है ? और वह कितने प्रकार का है ? यह आकांक्षा होने पर पदार्थ के शक्य तथा लक्ष्य भेद से दो प्रकार बताते हुए यहां तक उन्हीं का निरूपण किया गया है और अब प्रसंगप्राप्त पदार्थ-निरूपण को समाप्त कर प्रकृत आसत्ति से उसके सम्बन्ध को 'तदुपस्थितिश्च' इत्यादि वाक्यों से बताया गया और पदजन्य पदार्थ की जो अव्यवधान से उपस्थिति ( प्राप्ति ) है, उसी को आसत्ति कहते हैं। इस प्रकार पूर्व प्रकृत आसत्ति-लक्षण का उपसंहार किया है। उपर्युक्त स्वरूप की आसत्ति होने पर पदों से शाब्द-बोध होता है और वह न हो तो शाब्दबोध नहीं होता, इस अन्वय-व्यतिरेक को देखने से आसत्ति शाब्दबोध में कारण है, यह निश्चित होता है। और इसी प्रमाण के द्वारा आसत्ति और शाब्दबोध में कार्य्य-कारण भाव सिद्ध होता है।

इसी प्रकार आकांक्षा आदि के द्वारा अवान्तर वाक्यों का शाब्दबोध होने पर प्रक-रणगत समस्त वाक्यों का मिलकर एक महावाक्यार्थ-बोध होता है, और वह न हुआ हो तो महावाक्यार्थ ज्ञात नहीं होता, इस अन्वय-व्यतिरेक से उनमें भी परस्पर ऐसी ही कार्यकारणता सिद्ध होती है।

इस प्रकार शाब्दबोध में आकांक्षा, योग्यता, आसत्ति नामक तीन कारणों का प्रतिपादन कर अब क्रमप्राप्त तात्पर्यज्ञानरूप चतुर्थ अवशिष्ट कारण के निरूपण की प्रतिज्ञा करते हैं।

क्रमप्राप्तं तात्पर्यं निरूप्यते। तत्र तत्प्रतीतीच्छयोच्चरितत्वं न तात्पर्यम्। अर्थज्ञानशून्येन पुरुषेणोच्चारिताद्वेदार्थ¹प्रत्ययाभावप्रसङ्गात्। अयमध्यापको व्युत्पन्न इति विशेषदर्शनेन² तत्र तात्पर्य्यभ्रमस्याप्यभावात्। न चेश्व³रीयतात्पर्यज्ञानात् तत्र शब्दबोध इति वाच्यम्। ईश्वरानङ्गीकर्तुरपि तद्वाक्यार्थप्रतिपत्तिदर्शनात्।

अर्थ—अब क्रमप्राप्त तात्पर्य का निरूपण किया जाता है। तत्रेति। निरूपणीय तात्पर्य के लक्षण प्रमाण को बताते समय यदि 'तत्प्रतीतीच्छयोच्चरितत्वम्' विवक्षित अर्थ की ( तात्पर्य्यार्थ ) प्रतीति की इच्छा से उच्चरितत्व ( वाक्य का या शब्द का उच्चारण किया जाना )—यह तात्पर्य का लक्षण करें, तो वह ठीक नहीं होगा। क्योंकि जिस पुरुष को वाक्यार्थ ज्ञान नहीं है ऐसे के द्वारा उच्चारण किये जाने वाले वेदवाक्य से अर्थज्ञान न होने का प्रसंग आवेगा। ( अर्थज्ञानशून्य व्यक्ति के द्वारा कहे गये वेद-वाक्य से अर्थप्रतीति नहीं हो सकेगी। )


१. 'र्थभान-प्रसङ्गात्'—इति पाठान्तरम्। २. 'न तात्प'—इति पाठान्तरम्।
३. 'रतात्प'—इति पाठान्तरम्।