भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 304
२४६वेदान्तपरिभाषा[ तात्पर्यंनिरूपणम्

इसके अतिरिक्त 'यह अध्यापक अव्युत्पन्न है' इस प्रकार के विशेष दर्शन ( ज्ञान ) से उसमें तात्पर्यभ्रम की अभाव रहता है, इस कारण उसे उसका ज्ञान है—यह भी नहीं कह सकते। अब यदि ऐसा कहें कि उन वाक्यों का अर्थज्ञान ईश्वर के तात्पर्य-ज्ञान से होता है वह भी ठीक नहीं क्योंकि ईश्वर का अस्तित्व न मानने वाले व्यक्ति को भी उन वाक्यों के अर्थ का ज्ञान होता देखने में आता है।

विवरण—इस परिच्छेद के आरम्भ में बताया गया है कि आकांक्षा, योग्यता, आसत्ति और तात्पर्यज्ञान--ये चार कारण, वाक्यजन्य ज्ञान में हुआ करते हैं। उनमें से आकांक्षा, योग्यता, आसत्ति—इन तीन कारणों को यहाँ तक बताया गया। अब क्रमप्राप्त तात्पर्यज्ञान नामक चौथे कारण का निरूपण करना है, इसलिये तात्पर्य किसे कहते हैं ? उसमें प्रमाण क्या है ? और वह शाब्दबोध में कैसे कारण बनता है ? इन सब बातों को बताना आवश्यक है। इस प्रकार तात्पर्य का लक्षण बताना आवश्यक होने पर प्रथमतः उसका स्वाभिमत लक्षण न बताकर, लोकप्रसिद्धि से प्रथमतः उपस्थित होने वाला नैयायिकाभिमत लक्षण बताते हैं—'वक्तुरिच्छा तु तात्पर्यम्' वक्ता की इच्छा को ही तात्पर्य कहते हैं। वक्ता के विवक्षित अर्थ की प्रतीति श्रोता को हो, इस इच्छा से उसके द्वारा उच्चारण किये हुए शब्द का तात्पर्य उसी अर्थ में होता है। इस प्रकार नैयायिकों का बताया हुआ तात्पर्य का लक्षण ठीक नहीं है। क्योंकि इस लक्षण को मानने पर, संस्कृतभाषानभिज्ञ ( पद-पदार्थ-व्युत्पत्तिहीन ) व्यक्ति के द्वारा कहे गये वेदवाक्य के अर्थ का ज्ञान ही नहीं हो सकेगा। क्योंकि वक्ता अव्युत्पन्न है। इस कारण 'मेरे द्वारा कहे गये इस वेदवाक्य से श्रोता को अमुक अर्थ की प्रतीति हो' ऐसी इच्छा से वह वेदवाक्य उसके द्वारा कहा जाना संभव ही नहीं।

इसके अतिरिक्त वक्ता को अर्थज्ञान हो, चाहे न हो किन्तु उसके द्वारा 'अग्निमीले' अक्षरों का उच्चारण होते ही सुनने वाले व्युत्पन्न व्यक्ति को तत्काल 'मैं अग्नि की स्तुति करता हूँ' इस अर्थ की प्रतीति होती दिखाई देती है।

शंका—शाब्दबोध में तात्पर्य, कारण न होकर उसका ज्ञान ही कारण होता है, इस कारण अव्युत्पन्न व्यक्ति को अपने द्वारा कहे गये वाक्य का ज्ञान न होने पर भी 'यह वक्ता अव्युत्पन्न है' यह श्रोता को ज्ञात न होने से 'इस व्यक्ति ने यह वाक्य अमुक अर्थ की प्रतीति की इच्छा से ही कहा है' ऐसा समझता है, इस प्रकार भ्रमरूप तात्पर्य-ज्ञान से उसे उस वाक्यार्थ की प्रतीति हो सकती है। तब यह कैसे कहा जा सकता है कि अव्युत्पन्न व्यक्ति के द्वारा कहे गये वाक्य से अर्थप्रतीति नहीं हो सकेगी।

समाधान—जबकि सुनने वाले को यह ज्ञात रहे कि 'यह व्यक्ति अव्युत्पन्न है', तब तो आपके कथनानुसार तात्पर्यभ्रम से ही शाब्दबोध हो सकेगा। परन्तु जब सुनने वाले को यह निश्चित रीति से ज्ञात रहे कि 'यह अध्यापक अव्युत्पन्न है' तब भी उसे वाक्यार्थबोध होता दिखाई देता है। किन्तु भ्रमरूप या प्रमारूप कोई भी तात्पर्य-

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 304, कुल 482 में से · BharatKosha