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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 482 में से

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पृष्ठ 305

तात्पर्य्यनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २४७

ज्ञान नहीं रहता, अतः नैयायिकों का यह तात्पर्य-लक्षण अव्याप्त रहता है। ऐसे अवसर पर श्रोता के अर्थज्ञान की उपपत्ति नहीं लग सकती।

**शंका—**काव्य का अध्ययन न किये हुए व्यक्ति के द्वारा भी किसी श्लोक के कहने पर उसे उसके अर्थ का ज्ञान होना संभव नहीं रहता तथापि उस श्लोक के मूलकर्ता कालिदास आदि कवि का तात्पर्यज्ञान, दूसरों को शाब्दबोध होने में कारण समझा जाता है, इसी रीति से वेदकर्ता परमेश्वर ने इस वाक्य का यही अर्थ किया है, इस इच्छा से ही वेदवाक्यों का उच्चारण किया होने से उससे तात्पर्यज्ञान से ही व्युत्पन्न श्रोताओं को उन वाक्यों के अर्थ का ज्ञान होना संभव है।

समाधान—'परमेश्वर के तात्पर्य ज्ञान से व्युत्पन्न श्रोताओं को वेदवाक्यों के अर्थ का ज्ञान हो जाता है' यह कहना ठीक नहीं है। क्योंकि 'परमेश्वर, वेदकर्ता हैं' यह सिद्धान्त जिन्हें मान्य हो उनके मत में ईश्वर के तात्पर्यज्ञान से शाब्दबोध होना मान लिया जा सकता है, किन्तु जिन्हें ईश्वर का अस्तित्व ही मान्य न हो उन चार्वाकादि नास्तिकों को वेदवाक्य से शाब्दबोध नहीं होता है, कहना पड़ेगा। परन्तु अनुभव तो विपरीत है। व्युत्पन्न व्यक्ति आस्तिक हो चाहे नास्तिक हो उसे वैदिक वाक्य के श्रवण होने पर अर्थज्ञान होता दिखाई देता है। इसलिये नैयायिकों का 'वक्तुरिच्छा तात्पर्यम्'— तात्पर्य का लक्षण निर्दोष नहीं है।

**प्रश्न—**तो आप अद्वैतवेदान्ती तात्पर्य का कौन-सा लक्षण करते हैं?

उच्यते। तत्प्रतीति-जनन-योग्यत्वं तात्पर्यम्। गेहे घट इति वाक्यं गेहे घटसंसर्ग-प्रतीति-जनन-योग्यं, न तु पटसंसर्गप्रतीति-जन-नयोग्यमिति तद्वाक्यं घटसंसर्गपरं, न तु पट-संसर्गपरं $^१$मित्युच्यते।

**अर्थ—**हमें तात्पर्य का कौन-सा लक्षण अभीष्ट है सो बताते हैं—'पदार्थों के संसर्ग का अनुभव उत्पन्न करने की वाक्य में योग्यता का होना' ही तात्पर्य है। 'घर में घट है' यह वाक्य, घर और घट के सम्बन्ध का अनुभव कराने में योग्य है। न कि गृह और पट के संसर्ग (सम्बन्ध) बोध कराने में। इसलिये 'गेहे घट:' यह वाक्य घटसंसर्गपरक (गृह और घट के संसर्ग का बोधक) है, न कि गृह और पट के संसर्ग का—ऐसा कहा जाता है।

**विवरण—**तात्पर्य का लक्षण 'तत्प्रतीतीच्छया उच्चरितत्वम्' करने पर उपर्युक्त दोष आते हैं, अतः वैसा लक्षण न कर 'तत्प्रतीतीजननयोग्यत्वम्' ही तात्पर्य का लक्षण करना उचित है। वाक्य में वक्ता के विवक्षित अर्थ का ज्ञान करा देने की योग्यता को ही तात्पर्य कहते हैं। जैसे—'घर में घट है' इस वाक्य के कहे जाने पर, वक्ता को उस


१. 'ति व्यपदिश्यते'—इति पाठान्तरम्।