वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४८ वेदान्तपरिभाषा [ तात्पर्य्यनिरूपणम्
वाक्य के अर्थ का ज्ञान हो चाहे न हो, किन्तु उस वाक्य में गृह और घट के आधाराधेयभावरूप सम्बन्ध का ज्ञान करा देने की योग्यता रहती है । उस कारण श्रोता को विवक्षित अर्थ का बोध होता है । अर्थात् वाक्य में गृह और घट के आधाराधेयभावरूप सम्बन्ध के ज्ञान करा देने की जो योग्यता रहती है उसका ज्ञान ही तात्पर्यज्ञान है । इस तात्पर्यज्ञान से ही सर्वत्र शाब्दबोध होता है ।
यह तात्पर्य्यनिश्चय ( यह वाक्य इसी अर्थ का बोधक है—यह निश्चय ) उस वाक्यार्थप्रतीति के अन्वय-व्यतिरेक से ही होता है । 'गेहे घट:' वाक्य के उच्चारण करने पर गृह और घट के ही सम्बन्ध का ज्ञान होता है । गृह और पट के सम्बन्ध का ज्ञान उस वाक्य से नहीं होता । इस कारण इस वाक्य का इसी अर्थ में तात्पर्य्य है— यह निश्चित रूप से ज्ञात होता है ।
शंका—जब हमें वाक्यार्थ का बोध होगा तभी यह वाक्य एतत्परक है इस प्रकार उसका तात्पर्यबोध होगा, और तात्पर्यबोध हुए बिना वाक्यार्थज्ञान होना संभव नहीं । अर्थात् शाब्दज्ञान में तात्पर्यज्ञान की और तात्पर्यज्ञान में शाब्दबोध की अपेक्षा होती है, इसलिये आपके लक्षण पर अन्योन्याश्रय दोष आता है ।
समाधान—हमारे लक्षण पर अन्योन्याश्रय दोष नहीं आ पाता । क्योंकि 'तत्प्रतीतिजनकत्व'—विवक्षित अर्थ की प्रतीति उत्पन्न करने वाला—इतना ही यदि हमारा तात्पर्यलक्षण होता तो अन्योन्याश्रय दोष आ सकता था, किन्तु उस दोष के न आने देने के लिए ही हमने लक्षण में 'योग्यत्व' विशेषण दिया है । प्रकृत में अन्वय आदि की अनुपपत्ति न होना रूप ही योग्यता अभिप्रेत है । 'गेहे घट:' इस वाक्य के सुनने पर गेह और घट का आधाराधेयभाव संबंध से जो अन्वय होता है ( अर्थात् 'गेहे' इस सप्तम्यन्त पद का आधारता से निरूपित 'घट' इस प्रथमान्त पद के साथ जो गेहनिष्ठ आधेयता संबंध से अन्वयबोध होता है ) उसका अन्य किसी भी प्रमाण से बोध नहीं होता, इस कारण अन्वय आदि की भी अनुपपत्ति नहीं हो पाती । ऐसे पदों का वाक्य में होना ही तात्पर्य है और उसी से वाक्यार्थ का निश्चय होता है । जैसे—'गंगायां घोष:' इस वाक्य में गंगापदवाच्य प्रवाह—इस सप्तम्यन्त पद का घोषरूप प्रथमान्त पद के साथ आधेयता संबन्ध से होने वाला अन्वय अनुपपन्न होने से ही तीरूप अर्थ का ग्रहण कर उसके साथ अन्वय करना पड़ता है, जिससे अनुपपत्ति नहीं हो पाती । अर्थात् उपर्युक्त स्वरूप का तात्पर्यज्ञान ही शाब्दबोध में कारण होता है, और ऐसे तात्पर्यज्ञान में शाब्दबोध की अपेक्षा नहीं होती । इसलिये हमारे लक्षण पर अन्योन्याश्रय दोष के आने की शंका भी नहीं हो सकती । अन्वयानुपपत्ति, प्रयोजनासिद्धि और प्रकरणादि—तात्पर्य के निश्चायक होते हैं ।
इस प्रकार हमारे तात्पर्यलक्षण पर 'अव्युत्पन्न पुरुष के द्वारा उच्चारण किये हुए वेदवाक्य से अर्थबोध नहीं होगा' यह अनुपपत्ति नहीं आ सकती । क्योंकि अव्युत्पन्न के