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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 482 में से

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पृष्ठ 307

तात्पर्यंनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २४९

द्वारा कहे गये वेदवाक्य में भी 'विवक्षितअर्थ का ज्ञान करा देने की योग्यता' रूप हमारा तात्पर्यलक्षण होने से व्युत्पन्न पुरुष को वेदवाक्य का अर्थ ज्ञात हो सकता है। इसके अतिरिक्त हमारे मत में 'ईश्वर के तात्पर्यज्ञान को अर्थबोध में कारण मानना' यह कल्पनागौरव भी नहीं होता। तस्मात्—वाक्य में विवक्षित अर्थ की प्रतीति होने के योग्य (अनुकूल) पदों का होना ही तात्पर्य का लक्षण है।

शंका—आपके तात्पर्यलक्षण को मान लेने पर अनेक अर्थों में रूढ पदों से युक्त वाक्य के तत्तद् अर्थ के अनुरोध से अनेक तात्पर्य मानने होंगे। अर्थात् उक्त लक्षण की अनेकार्थक पदों से युक्त वाक्य में अतिव्याप्ति होगी। इसका समाधान स्वयं ग्रन्थकार करते हैं।

ननु 'सैन्धवमानय' इत्यादि वाक्यं यदा लवणानयन-प्रतीतीच्छया प्रयुक्तं तदा¹श्वसंसर्गे-प्रतीतिजनने स्वरूपयोग्यतासत्त्वाल्लवण-परत्व²-ज्ञानदशायामप्यश्वादि-संसर्गज्ञानापत्तिरिति चेत् । न । तदितर-प्रतीतीच्छया नुच्चरितत्वस्यापि तात्पर्यं प्रति विशेषणत्वात् । तथा च यद्वाक्यं यत्प्रतीति-जनन³-स्वरूपयोग्यत्वे सति ⁴यदन्यप्रतीतीच्छया ⁵नोच्चरितं तद्वाक्यं तत्संसर्गपरमित्युच्यते ।

अर्थ—(शंका) 'नमक लाओ' यह वाक्य श्रोता को नमक लाने का ज्ञान हो इस इच्छा से जब कहा जाय तब उस वाक्य में अश्वसंसर्ग का ज्ञान करा देने की स्वरूपयोग्यता भी रहती है इस कारण 'यह वाक्य लवणसंसर्गबोधक है' ऐसा ज्ञान होने के समय ही 'वह अश्वादिसंसर्गबोधक है' ऐसा ज्ञान भी होने लगेगा। ऐसी शंका करना ठीक नहीं है। क्योंकि तात्पर्य के लक्षण में 'विवक्षित अर्थ से भिन्न अर्थ की प्रतीति की इच्छा से उसका उच्चारण न होना' इस विशेषण का निवेश कर्तव्य है। अर्थात् जो वाक्य उस अर्थ की प्रतीति के उत्पन्न करने की स्वरूपयोग्यता से युक्त होकर भी जिस अन्य अर्थ की प्रतीति की इच्छा से उच्चरित नहीं होगा वह वाक्य उसी संसर्ग का बोधक (तत्संसर्गपरक) कहा जाता है।

**विवरण—**आपने तात्पर्य का लक्षण 'तत्प्रतीतिजनकत्व' न कर 'तत्प्रतीतिजननयोग्यत्व' किया है। अर्थात् वाक्य में विशिष्ट अर्थ की प्रतीति उत्पन्न करने की स्वरूप-


१. 'दाप्यश्व'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'त्वदशा'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'न योग्य'—इति पाठान्तरम् ।
४. 'तदन्य'—इति पाठान्तरम् ।
५. 'अनुच्चरितम्'—इति पाठान्तरम् ।