वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २५० | वेदान्तपरिभाषा | [ तात्पर्यंनिरूपणम् |
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योग्यता के रहने पर उसमें तात्पर्य का लक्षण घटित हो जाता है—यह आपके कहने का आशय है। परन्तु ऐसा लक्षण करने पर अनेक अर्थों में रूढ़ पदों से युक्त वाक्य में दोष आता है। जैसे कोई—व्यक्ति भोजन करते समय 'सैन्धव लाओ' यह आज्ञा सेवक को करे। उस समय सेवक 'नमक' लावें, यही उसकी विवक्षा होना उचित है। किन्तु 'सैन्धव' पद के 'नमक' और 'घोड़ा' दोनों अर्थ होते हैं। इस कारण उस पद में लवण का बोध करा देने की जैसी योग्यता है वैसी ही अश्व की प्रतीति करा देने की भी योग्यता है। इस कारण श्रोता को उस वाक्य के श्रवण करते ही 'नमक' लाने का जैसे ज्ञान होता है, वैसे ही 'घोड़ा' लाने का भी ज्ञान होता है। क्योंकि सैन्धव शब्द दोनों अर्थों का ज्ञान कराने की योग्यता रखता है। तथापि सेवक, स्वामी के उस वाक्य को सुनकर 'घोड़ा' एवं 'नमक' दोनों पदार्थों को नहीं लाता है। किन्तु उस वाक्य से उसे केवल 'लवण' लाने की ही प्रतीति होता है। अतः 'स्वरूपयोग्यत्व' को तात्पर्य-लक्षण मानकर अनेकार्थक पदवाले वाक्य में वक्ता की इच्छा का भी अन्तर्भाव न कर उसकी आप कैसी उपपत्ति लगावेंगे ? यह आशय 'ननु' इत्यादि शंका ग्रन्थ का है।
परन्तु ऐसी शंका करना उचित नहीं है। क्योंकि हमें 'तत्प्रतीतिजननयोग्यत्व' इतना ही तात्पर्यलक्षण अभिप्रेत न होकर उसमें 'तदन्यप्रतीतीच्छयाऽनुच्चरितत्व' यह तात्पर्य विशेषण भी विवक्षित है। इस विशेषण का निवेश करने पर तात्पर्यलक्षण का स्वरूप 'तथा च०' इत्यादि ग्रन्थ से बताया है।
वक्ता के विवक्षित अर्थ की प्रतीति करा देने की योग्यता (सामर्थ्य) जिस वाक्य में होती है एवं जो वाक्य विवक्षित अर्थ से भिन्न अर्थ को बताने की इच्छा से उच्चारण नहीं किया हुआ हो—वही उसका तात्पर्य है। ऐसा तात्पर्य का लक्षण करने पर 'एक ही वाक्य से दो अर्थों की प्रतीति होगी' यह शंका नहीं हो सकती। भोजन के समय वक्ता के द्वारा 'सैन्धव लाओ' वाक्य का उच्चारण, श्रोता को लवण से भिन्न अश्वादि पदार्थ के बोधन की इच्छा से नहीं किया जाता। उस वाक्य में 'लवणप्रतीतिजनन-योग्यता' होती है और लवणेतर पदार्थ की प्रतीति की इच्छा से उसका उच्चारण भी नहीं रहता। इसलिये सेवक को उस वाक्य के सुनते ही 'लवणकर्मक आनयन' = जिसमें लवण कर्म है ऐसी 'आनयन' क्रिया का बोध होता है। अश्वकर्मक आनयन रूप संसर्ग का उससे बोध नहीं होता।
शंका—वक्ता ने 'सैन्धवमानय' वाक्य, अश्वप्रतीति की इच्छा से नहीं कहा, अपितु लवणप्रतीति की इच्छा से ही कहा है—यह उस श्रोता को कैसे ज्ञात हो ? इस प्रश्न के उत्तर में 'प्रकरण आदि' अर्थ निश्चायक होते हैं, पहले कह चुके हैं—भोजनप्रसंग में उस वाक्य के कहे जाने से अश्वप्रतीति की इच्छा से वह कहा गया है—यह बोध होना तो सम्भव ही नहीं, अतः 'तदन्यप्रतीतीच्छयाऽनुच्चरितत्व' इस तात्पर्य-विशेषण का लक्षण में अन्तर्भाव करने से पूर्वोक्त दोष नहीं आता। और केवल लवणपरक अर्थ की