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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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तात्पर्य्यनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २५१

भी उपपत्ति लग जाती है—इस कारण तात्पर्य्यलक्षण में इच्छादि विशेषणों का निवेश नहीं करना पड़ता ।

इस प्रकार तात्पर्य्यलक्षण में इच्छादि विशेषणों का सन्निवेश न करने से ही 'शुकादि' वाक्यों की व्यवस्था लगती है तथा पूर्वोक्त अव्युत्पन्न व्यक्ति के द्वारा कहे गये वेदवाक्य में भी उसकी अव्याप्ति नहीं हो पाती—इत्यादि, ग्रन्थकार स्वयं कहते हैं—

शुकादिवाक्येऽव्युत्पन्नोच्चरित-वेदवाक्यादौ च तत्प्रतीतीच्छाया एवाभावेन¹ तदन्यप्रतीतीच्छयोच्चरितत्वाभावेन लक्षणसत्त्वान्नाव्याप्तिः । न चोभयप्रतीतीच्छयोच्चरितेऽव्याप्तिः । तदन्यमात्र-प्रतीतीच्छयाऽनुच्चरितत्वस्य विवक्षितत्वात् ।

अर्थ—शुक से कहे गये वाक्य में एवं अव्युत्पन्न व्यक्ति से बोले गये वेदवाक्य में वक्ता की विशेषार्थप्रतीतिविषयक इच्छा ही नहीं रहती । इस कारण अन्यार्थ प्रतीति की इच्छा से उस वाक्य को बोला गया है यह नहीं कहा जा सकता, इसलिये 'तदितरप्रतीतीच्छया अनुच्चरितत्व' लक्षण उन वाक्यों में घटित होने से अव्याप्ति नहीं हो पाती ।

शंका—जो वाक्य दोनों अर्थों की प्रतीति की इच्छा से कहा हो उसमें अव्याप्ति होगी क्योंकि उसमें तदितरप्रतीतीच्छया अनुच्चारितत्व नहीं रहता ।

परन्तु यह शंका ठीक नहीं, क्योंकि 'तदितरप्रतीतीच्छया अनुच्चरितत्व' विशेषण का 'तदन्यमात्रप्रतीतीच्छयाऽनुच्चरितत्व' रूप अर्थ हमें विवक्षित है । उभयप्रतीति की इच्छा से उच्चारण किया हुआ वाक्य, केवल तदन्य अर्थ की ही प्रतीति की इच्छा से नहीं कहा रहता, इसलिये वहाँ पर लक्षण की अव्याप्ति नहीं हो पाती ।

विवरण—'तत्प्रतीतिजननयोग्यत्व' होकर तदितरप्रतीतीच्छा से अनुच्चरितत्व' रूप तात्पर्य का लक्षण मानने पर अर्थात् इस प्रकार इच्छाघटित लक्षण के स्वीकार करने पर शुकोच्चारित वाक्य में अव्याप्ति होती है, क्योंकि उच्चारण करते समय 'अमुक अर्थ की प्रतीति हो' या तद्भिन्न अर्थ की प्रतीती न हो' इत्यादि किसी प्रकार की इच्छा शुक में नहीं होती । इस शंका का निराकरण इस प्रकार किया जाता है कि—तोता जब 'स्वतः प्रमाणं परतः प्रमाणम्' आदि पढ़ाए हुए वाक्यों को बोलता है तब उसके मन में 'इस वाक्य से श्रोता को अमुक अर्थ का बोध हो' इत्याकारक इच्छा जैसे नहीं रहती वैसी ही 'इससे भिन्न अर्थ की श्रोता को प्रतीति न हो' इत्याकारक इच्छा भी नहीं रहती । अर्थात् वह वाक्य उसने तदितरप्रतीत की इच्छा से उच्चारणकिया हुआ नहीं रहता, पर विशिष्ट अर्थ का ज्ञान करा देने की योग्यता तो उस वाक्य में होती है, अतः हमारा तात्पर्य्यलक्षण वहाँ घटित होने से लक्षण-समन्वय हो जाता है इस कारण अव्याप्ति


१. 'भावात्'—इति पाठान्तरम् ।