वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २५२ | वेदान्तपरिभाषा | [ तात्पर्य्यनिरूपणम् |
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न होने से ही उस वाक्य से अर्थबोध होता है। इसी प्रकार अव्युत्पन्न व्यक्ति के द्वारा कहा गया वेदवाक्य भी विवक्षित अर्थ या तद्भिन्न अर्थ की इच्छा से उच्चारण किया नहीं रहता पर अर्थप्रतीतिजननयोग्यत्व उस वाक्य में होता है, इस कारण ऐसे वाक्य में तात्पर्य-लक्षण का समन्वय होता है और ऐसा तात्पर्यज्ञान होने से ही 'अर्थप्रत्ययाभाव-प्रसंग' नहीं होता।
शंका—तात्पर्य का उक्त लक्षण स्वीकार करने से अव्युत्पन्न व्यक्ति के उच्चरित वाक्य में दोष न आने पर भी अन्यत्र दोष आवेगा। जैसे कोई ज्ञानवान् वक्ता जब दोनों अर्थों की इच्छा से किसी वाक्य को बोलता हो उस समय उसका वह वाक्य तदितर प्रतीति की इच्छा से अनुच्चरित है, नहीं कह सकते। अतः उक्त लक्षण इस वाक्य में घटित न होने से दोनों अर्थों का बोध होता है—यह अनुपपत्ति दोष आपके मत में आता है अर्थात् तात्पर्यलक्षण की यहाँ अव्याप्ति है। जो विवक्षित अर्थ की इच्छा से वाक्य बोल सकता है वह उस वाक्य को भिन्नार्थप्रतीति की इच्छा से भी बोल सकता है। अर्थज्ञानरहित वक्ता में भिन्नार्थप्रतीति की इच्छा से उच्चारण करने की योग्यता ही नहीं होती।
'तदन्यमात्र०' इत्यादि वाक्य से इस शंका का निराकरण किया है। 'तदितर-प्रतीतीच्छयाऽनुच्चरितत्वम्' विशेषण के 'तदितर' पद का 'तदन्यमात्र' अर्थ विवक्षित है। अर्थात् वक्ता के द्वारा कहा हुआ वाक्य दोनों अर्थों की विवक्षा से उच्चारण करने पर भी कोई क्षति नहीं है, क्योंकि उन दोनों अर्थों में उस वाक्य का तात्पर्य है। हमारा कहना केवल इतना ही है कि वह वाक्य तदन्य अर्थ की प्रतीति की इच्छा से उच्चरित नहीं होना चाहिये—यही उस विशेषण का अर्थ है। जब कोई व्यक्ति 'सैन्धव लाओ' इस एक ही वाक्य को गमनोपयोगी अश्व एवं भोजनोपयोगी लवण—इन दोनों अर्थों की प्रतीति की इच्छा से बोलता है, तब लवणभिन्न जो अश्व अथवा अश्वभिन्न जो लवण—इनकी विवक्षा से वक्ता उस वाक्य को वैसा कहता है, केवल अश्व या केवल तदन्य लवण अर्थ से उस वाक्य का उच्चारण ही नहीं रहता। अतः उक्त तात्पर्यलक्षण की ऐसी स्थल में अव्याप्ति नहीं होती।
शंका—'सकृदुच्चरितः शब्दः सकृदेवार्थं गमयति' एक बार उच्चारण किया हुआ शब्द एक समय एक ही अर्थ का बोध कराता है। यह नियम होने से 'अन्यायश्चाने-कार्थत्वम्' को आप मानते हैं, और यहाँ 'सैन्धवमानय' यह एक ही वाक्य, अश्व-लवण-उभयप्रतीति की इच्छा से उच्चरित है—यह कैसे कहते हैं ?
समाधान—एक ही बार कहे हुए 'सैन्धवमानय' वाक्य से युगपत ( एक ही साथ ) अश्व एवं लवण दोनों अर्थों का ज्ञान होता है—ऐसा हम नहीं मानते। वक्ता के द्वारा वह वाक्य यद्यपि एक बार ही उच्चरित रहता है तथापि वक्ता के तात्पर्य को समझकर सुनने वाला व्यक्ति उस वाक्य की अपने मन में आवृत्ति करता है ( उस वाक्य को