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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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तात्पर्य्यनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २५३

दोहराता है ) और उसे प्रथम लवण की तदनन्तर अश्व की क्रमशः प्रतीति होती है। अतः उक्त नियम के साथ कोई विरोध नहीं है।

इस प्रकार 'तत्प्रतीतिजननयोग्यत्वे सति तदन्यमात्रप्रतीतीच्छयाऽनुच्चरितत्वम्' यह तात्पर्य का निष्कृष्ट लक्षण सिद्ध होता है। इसका आशय यह है कि 'विशिष्ट अर्थ का ज्ञान करा देने की स्वरूपयोग्यता होते हुए उस अर्थ से भिन्न अर्थ की प्रतीति की इच्छा से उस वाक्य का उच्चरित न होना' इस प्रकार तात्पर्य के ज्ञात होने पर शाब्दबोध होता है तब इस तात्पर्यलक्षण पर किसी प्रकार का दोष नहीं आने पाता।

शंका—तत्प्रतीतिजननयोग्यता का अवच्छेदक क्या है ? अर्थात् विशिष्ट अर्थ का ज्ञान करा देने की योग्यता, शब्द में किस कारण आती है ? क्योंकि 'तत्प्रतीतीच्छया उच्चरितत्वम्' को अवच्छेदक मानें तो अव्युत्पन्न व्यक्ति के द्वारा कहे हुए वेदवाक्य में अव्याप्ति होती है। अतः प्रकृत में 'योग्यतावच्छेदक' किसे मानते हैं ? इस शंका को शान्त करने के लिए ग्रन्थकार स्वयं योग्यता के अवच्छेदक को बताते हैं—

उक्त-प्रतीति¹-मात्रजनन-योग्यतायाश्चावच्छेदिका शक्तिः, अस्माकं तु मते सर्वत्र कारणतायाः शक्ते²रेवावच्छेदकत्वान्न² कोऽपि दोषः ।

अर्थ— उक्त यावत् शाब्दप्रतीतिजननयोग्यता की अवच्छेदक 'शक्ति' ही है। हमारे मत में सर्वत्र 'शक्ति' को ही कारणता का अवच्छेदक माना है। इस कारण किसी प्रकार का दोष नहीं है।

विवरण— 'तत्प्रतीतीच्छया उच्चरितत्वम्' को योग्यता का अवच्छेदक मानने में अव्युत्पन्नोच्चरित—वाक्य में दोष आता है, इसलिए वैसा अवच्छेदक स्वीकार न कर 'शक्ति' को ही यावत् ( समस्त ) शाब्दबोधों की कारणता का अवच्छेदक स्वीकार करते हैं। अर्थात् शब्द में विशिष्ट शक्ति होने पर विशिष्टार्थ—प्रतीति करा देने की योग्यता रहती है—समझना चाहिए। 'सैन्धवमानय' यही वाक्य केवल लवण-विवक्षा से जब कहा गया हो तब 'लवणप्रतीतीच्छया उच्चरितत्व' कारणतावच्छेदक होता है और वही वाक्य, उभय ( अश्व और लवण ) प्रतीति की इच्छा से कहा हो तब 'तदन्यमात्र-प्रतीतीच्छया अनुच्चरितत्व' आदि भिन्न-भिन्न अवच्छेदक स्वीकार करने की अपेक्षा समस्त शाब्द ( शब्दजन्य ) बोधों में 'शक्ति' को ही कारणतावच्छेदक मानने में लाघव है।

किं बहुना केवल शब्दजन्य ज्ञान की जो कारणता उसी का अवच्छेदक 'शक्ति' न होकर संसार की समस्त कार्यों की कारणता का भी 'कार्यानुकूलशक्ति' को ही हमने अवच्छेदक माना है। तब शाब्दज्ञान की कारणता में अवच्छेदक 'शक्ति' है—इसे पृथक्


१. 'तिजनन'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'त्वादिति न'-इति पाठान्तरम् ।