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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

तात्पर्य्यनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २५३

दोहराता है ) और उसे प्रथम लवण की तदनन्तर अश्व की क्रमशः प्रतीति होती है। अतः उक्त नियम के साथ कोई विरोध नहीं है।

इस प्रकार 'तत्प्रतीतिजननयोग्यत्वे सति तदन्यमात्रप्रतीतीच्छयाऽनुच्चरितत्वम्' यह तात्पर्य का निष्कृष्ट लक्षण सिद्ध होता है। इसका आशय यह है कि 'विशिष्ट अर्थ का ज्ञान करा देने की स्वरूपयोग्यता होते हुए उस अर्थ से भिन्न अर्थ की प्रतीति की इच्छा से उस वाक्य का उच्चरित न होना' इस प्रकार तात्पर्य के ज्ञात होने पर शाब्दबोध होता है तब इस तात्पर्यलक्षण पर किसी प्रकार का दोष नहीं आने पाता।

शंका—तत्प्रतीतिजननयोग्यता का अवच्छेदक क्या है ? अर्थात् विशिष्ट अर्थ का ज्ञान करा देने की योग्यता, शब्द में किस कारण आती है ? क्योंकि 'तत्प्रतीतीच्छया उच्चरितत्वम्' को अवच्छेदक मानें तो अव्युत्पन्न व्यक्ति के द्वारा कहे हुए वेदवाक्य में अव्याप्ति होती है। अतः प्रकृत में 'योग्यतावच्छेदक' किसे मानते हैं ? इस शंका को शान्त करने के लिए ग्रन्थकार स्वयं योग्यता के अवच्छेदक को बताते हैं—

उक्त-प्रतीति¹-मात्रजनन-योग्यतायाश्चावच्छेदिका शक्तिः, अस्माकं तु मते सर्वत्र कारणतायाः शक्ते²रेवावच्छेदकत्वान्न² कोऽपि दोषः ।

अर्थ— उक्त यावत् शाब्दप्रतीतिजननयोग्यता की अवच्छेदक 'शक्ति' ही है। हमारे मत में सर्वत्र 'शक्ति' को ही कारणता का अवच्छेदक माना है। इस कारण किसी प्रकार का दोष नहीं है।

विवरण— 'तत्प्रतीतीच्छया उच्चरितत्वम्' को योग्यता का अवच्छेदक मानने में अव्युत्पन्नोच्चरित—वाक्य में दोष आता है, इसलिए वैसा अवच्छेदक स्वीकार न कर 'शक्ति' को ही यावत् ( समस्त ) शाब्दबोधों की कारणता का अवच्छेदक स्वीकार करते हैं। अर्थात् शब्द में विशिष्ट शक्ति होने पर विशिष्टार्थ—प्रतीति करा देने की योग्यता रहती है—समझना चाहिए। 'सैन्धवमानय' यही वाक्य केवल लवण-विवक्षा से जब कहा गया हो तब 'लवणप्रतीतीच्छया उच्चरितत्व' कारणतावच्छेदक होता है और वही वाक्य, उभय ( अश्व और लवण ) प्रतीति की इच्छा से कहा हो तब 'तदन्यमात्र-प्रतीतीच्छया अनुच्चरितत्व' आदि भिन्न-भिन्न अवच्छेदक स्वीकार करने की अपेक्षा समस्त शाब्द ( शब्दजन्य ) बोधों में 'शक्ति' को ही कारणतावच्छेदक मानने में लाघव है।

किं बहुना केवल शब्दजन्य ज्ञान की जो कारणता उसी का अवच्छेदक 'शक्ति' न होकर संसार की समस्त कार्यों की कारणता का भी 'कार्यानुकूलशक्ति' को ही हमने अवच्छेदक माना है। तब शाब्दज्ञान की कारणता में अवच्छेदक 'शक्ति' है—इसे पृथक्


१. 'तिजनन'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'त्वादिति न'-इति पाठान्तरम् ।

२५४ | वेदान्तपरिभाषा | [ तात्पर्यस्य शाब्दबोधहेतुत्वम्

बताने की आवश्यकता नहीं रहती। ऐसा मानने पर तृण, अरणि, मणि आदि में दाह-जनकत्व का भिन्न-भिन्न तृणत्वादि को अवच्छेदक मानने का गौरव भी नहीं हो पाता, या अननुगमदोष भी नहीं हो पाता।

यहाँ पर शाब्दबोध की अवच्छेदक शक्ति का अर्थ आलंकारिकों के मतानुसार 'सामान्यवृत्ति' समझना चाहिए। आलंकारिक जिस प्रकार शक्य और लक्ष्य अर्थों में पदों की शक्ति ही मानते हैं अर्थात् 'वृत्ति' शब्द के समान ही 'शक्ति' शब्द का अर्थ मानते हैं, उसी प्रकार प्रकृत में ग्रन्थकार ने 'वृत्ति' अर्थ में 'शक्ति' शब्द को मानकर विवेचन किया है। इस कारण 'गम्भीरायां नद्यां घोष:' आदि स्थलों में तीरादितात्पर्य की अनुपपत्ति होगी, क्योंकि यहाँ पर 'गंगा शब्द की तीर अर्थ में शक्ति नहीं है' इस शंका का निराकरण हो जाता है तस्मात् यह तात्पर्य का स्वरूप निर्दुष्ट है।

शंका—शाब्दज्ञान में तात्पर्य को कारण आप कैसे कहते हैं? क्योंकि विवरणाचार्य ने शाब्दबोध में तात्पर्यज्ञान की आवश्यकता का निषेध किया है। इस शंका का उत्तर ग्रन्थकार दे रहे हैं—

एवं तात्पर्यस्य तत्प्रतीतिजनकत्वरूपस्य शाब्दज्ञान-जनकत्वे सिद्धे चतुर्थवर्णके तात्पर्यस्य शाब्दज्ञान-हेतुत्व-निराकरण-वाक्यं तत्प्रतीतीच्छयोच्चरितत्वरूप-तात्पर्यनिराकरणपरम्, अन्यथा तात्पर्य-निश्चय-फलक-वेदान्तविचार-वैयर्थ्य-प्रसङ्गात् ।

अर्थ— इस प्रकार तत्प्रतीतिजनकत्वरूप तात्पर्यज्ञान, शाब्दज्ञान में कारण सिद्ध होने से चतुर्थवर्णक में विवरणाचार्य ने 'शाब्दबोध में तात्पर्यज्ञान कारण है' इस मत के निरसनार्थ जो वाक्य लिखा है वह 'तत्प्रतीतीच्छयोच्चरितत्व' नैयायिकोक्त लक्षण की अयुक्तता दर्शित करने के लिए है। अन्यथा उपनिषद्वाक्यों के तात्पर्य का निर्णय करने के लिए प्रवृत्त वेदान्तवाक्य-विचाररूप उत्तरमीमांसा व्यर्थ हो जायेगी।

विवरण— ब्रह्मसूत्र के प्रथम अध्याय के चतुःसूत्री (चार सूत्रों) पर भगवत्पूज्यपाद श्रीशंकराचार्य का भाष्य है। उस पर उन्हीं के शिष्य श्रीपद्मपादाचार्य की टीका है, जिसे 'पञ्चपादिका' कहते हैं। उस पञ्चपादिका पर श्रीप्रकाशत्ममुनि ने व्याख्या रची है, उसे विवरण कहते हैं। इसमें प्रथम सूत्र के चार वर्णक कर विवरण किया है, उनमें से चतुर्थ वर्णक में 'अत्रेदं विचार्यं, किं तात्पर्यमर्थप्रमितिहेतुः किंवा प्रतिबन्धनिरासहेतुरिति ?' यहाँ यह विचार करना है कि अर्थ यथार्थ ज्ञान होने में तात्पर्य कारण है या अर्थनिश्चय के प्रतिबन्ध की निवृत्ति के लिए उसकी आवश्यकता है?—ऐसा विकल्प कर 'अर्थज्ञान में तात्पर्यज्ञान कारण नहीं है' कहा है, और यहाँ पर तो आप तात्पर्यज्ञान को शाब्दबोध में कारण बता रहे हैं, यह कैसे हो सकता है? इस शंका का उद्भव होने पर श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र कहते हैं—विवरणाचार्य के आशय को न समझने के कारण

विवरणस्याशयः ] आगमपरिच्छेदः २५५

उपर्युक्त शंका उत्पन्न हुई है। क्योंकि प्रमाणसिद्ध वस्तु का निषेध कोई भी नहीं कर सकता। उपर्युक्त तात्पर्यज्ञान से शाब्दबोध होता है —यह अनुभव सभी को होने के कारण अनुभवसिद्ध वस्तु का निषेध विवरणाचार्य भी कैसे करेंगे। तस्मात् उन्होंने जो तात्पर्य का निषेध किया है वह नैयायिकाभिमत 'तत्प्रतीतीच्छया उच्चरितत्व' रूप तात्पर्य का ही किया है, यह समझना चाहिए। क्योंकि वैसे तात्पर्यज्ञान को शाब्दबोध में कारण मानना सदोष है। हमारे उपर्युक्त लक्षण पर किसी प्रकार दोष न आने से उसका निषेध करने का उनका उद्देश्य नहीं है। क्योंकि तात्पर्यज्ञान शाब्दबोध की कारणता सर्वथैव नहीं होती—यह मत यदि उनका होता तो वे वेदान्तों (उपनिषदों) के तात्पर्य-निर्णयार्थ प्रवृत्त--शारीरिक भाष्य के आधार पर 'विवरण' टीका ही न करते। क्योंकि जिस तात्पर्यज्ञान का अर्थज्ञान में उपयोग नहीं है, उस तात्पर्य के निश्चयार्थ किया हुआ उपक्रमोपसंहारादि तात्पर्यनिर्णायक षड्विधलिंगों का विचार व्यर्थ होने लगेगा।

इसके अतिरिक्त 'तन्तु समन्वयात्' सूत्र के भाष्य में आचार्य ने 'सर्वेषु वेदान्तेषु वाक्यानि तात्पर्येणैतस्यैवार्थस्य प्रतिपादकत्वेन समनुगतानि' कहा है, उसके साथ भी विरोध होगा इसलिए ऐसी मूलोच्छेदक कल्पना न कर उक्तार्थ में ही विवरणाचार्य का तात्पर्य मानना योग्य होगा।

अत्र रत्नकार आदि के मत से उपर्युक्त तात्पर्य-निरसनपरक विवरण ग्रन्थ की उपपत्ति बताते हैं।

केचित्तु शाब्दज्ञानत्वावच्छेदेन न तात्पर्यज्ञानं हेतुरित्येवं परं चतुर्थवर्णकवाक्यम्। तात्पर्य-संशय-विपर्ययोत्तर शाब्दज्ञानविशेषे च तात्पर्यज्ञानं हेतुरेव। इदं वाक्यमेतत्परम्? उतान्यपरमिति¹ संशये तद्विपर्यये च तदुत्तर वाक्यार्थ²-विशेषनिश्चयस्य तात्पर्य्निश्चयं विनाऽनुपपत्तेरित्याहुः।

**अर्थ—**कुछ लोग 'शाब्दज्ञानत्व के अवच्छेद से (यावत्-शब्दज्ञान में) तात्पर्यज्ञान कारण नहीं है, एतत्परक वह चतुर्थ वर्णक में वाक्य है। तात्पर्य में संशय अथवा विपर्यय (भ्रम) होने पर जो विशेष शाब्दबोध होता है, उसमें तो तात्पर्यज्ञान, कारण होता ही है। यह वाक्य एतत्पर (इस अर्थ का बोधक) है, या अन्यपरक है? ऐसा संशय होने पर या अन्यपर ही है—यह भ्रम होने पर पश्चात् वाक्यार्थ का जो विशेष निर्णय होता है उसकी उपपत्ति तात्पर्यनिश्चय के बिना नहीं हो पाती' ऐसा कहते हैं।


१. 'तात्पर्य सं०'-इति पाठान्तरम्।
२. 'र्थनि०'-इति पाठान्तरम्।

२५६ | वेदान्तपरिभाषा | [ तात्पर्यग्रहोपायः

विवरण—रत्नकार आदि कहते हैं कि 'किसी विशेष स्थल पर यद्यपि शाब्दबोध को तात्पर्यज्ञान की अपेक्षा रहती है तथापि शाब्दबोध में सर्वत्र तात्पर्यज्ञान कारण नहीं होता' इस कथन में ही विवरण-वाक्य का तात्पर्य है। इस कारण उन्होंने तात्पर्यज्ञान का सर्वथा निषेध किया है, नहीं कहा जाता और स्वीकार किया है—यह भी नहीं कहा जा सकता। मूल में 'शाब्दज्ञानत्वावच्छेदेन' का यही अर्थ है--शाब्दज्ञानत्व के अवच्छेद से (व्याप्ति से) अर्थात् शाब्दज्ञान में तात्पर्यज्ञान कारण नहीं है (जहाँ शाब्दज्ञानत्व है वहाँ तात्पर्यज्ञान है), इस प्रकार उनकी (शाब्दज्ञानत्व और तात्पर्यज्ञान की) व्याप्ति नहीं है। किन्तु जहाँ वाक्यार्थज्ञान में--इस वाक्य का यही अर्थ है या अन्य अर्थ है—संशय हुआ हो वहाँ तात्पर्यज्ञान का वाक्यार्थज्ञान में उपयोग होता है। किंवा वक्ता के आशय को न समझ कर यदि विपरीत अर्थ किसी को भासित हुआ हो तो उसकी निवृत्ति के लिए वहाँ पर उतना तात्पर्यज्ञान उपयुक्त होता है। इतरत्र शाब्दज्ञान होते हुए भी तात्पर्यज्ञान वहाँ कारण नहीं रहता। अर्थात् स्थल विशेष पर तात्पर्यज्ञान की शाब्दबोध में अपेक्षा होती है। समस्त शाब्दबोध, तात्पर्यज्ञान के पश्चात् ही हों ऐसा नियम नहीं है। तात्पर्यज्ञान में शाब्दज्ञान की कारणता का निषेध करने में विवरणाचार्य का यही अभिप्राय है। इस रीति से रत्नकार आदिकों ने तात्पर्यज्ञान में कारणता की उपपत्ति को बताया है।

'आहुः' कहकर ग्रन्थकार ने उपर्युक्त समाधान पर अपनी अरुचि सूचित की है। उसका कारण भी यही है कि सामान्यतः समस्त शाब्दबोधों में तात्पर्यज्ञान को ही कारण माना जाय तो शाब्दज्ञाननिष्ठ कार्यता का अवच्छेदक, शाब्दज्ञानत्व ही होगा, परन्तु ऐसा न मानकर संशय—विपर्ययोत्तरशाब्दज्ञान में ही तात्पर्यज्ञान कारण होता है—यदि स्वीकार करें तो 'संशयविपर्ययोत्तरशाब्दज्ञानत्व' इतना गुरुभूत कार्यतावच्छेदक मानना पड़ता है, तथापि कार्यभेद से कारण का और कारणतावच्छेदक आदि का भेद यदि मानना हो तो इस मत को भी स्वीकार किया जाय। पूर्वाचार्यों के वचन से हमारे मत का विरोध नहीं हो पाता। यह दोनों समाधानों से सिद्ध है।

शंका—तात्पर्यज्ञान, शाब्दबोध में कारण है—यह सिद्ध होने पर भी वह तात्पर्य-ज्ञान किससे होता है ? तब मूलकार उत्तर देते हैं—

तच्च तात्पर्यं वेदे मीमांसा परिशोधित-न्यायादेवावधार्यते, लोके तु प्रकरणादिना। तत्र लौकिक-वाक्यानां मानान्तरावगतार्था¹-नुवादकत्वम्। वेदे तु वाक्यार्थस्यापूर्व्वतया नानुवादकत्वम्।

अर्थ—और वह तात्पर्य, वेदवाक्यों में मीमांसा के द्वारा परिशोधित न्यायों से ही निश्चित होता है। परन्तु लौकिकवाक्यों में प्रकरणादिकों से (तात्पर्य का निश्चय होता है)।


१. 'र्थतयानु०'-इति पाठान्तरम्।

विवरणवाक्याशयः ] आगमपरिच्छेदः २५७

**तत्र—**लौकिक-वैदिक वाक्यों में से लौकिक वाक्य तो प्रमाणान्तरों से ज्ञात हुए अर्थ का ही अनुवाद करते हैं। परन्तु वैदिक वाक्यों का अर्थ, प्रमाणान्तर से अज्ञात होने के कारण अनुवाद रूप नहीं होता।

**विवरण—**लौकिक और वैदिक भेद से शब्द के दो प्रकार हैं। वैदिक वाक्यों के तात्पर्य का निश्चय पूर्वोत्तर-मीमांसारूप पूजित-विचार से सिद्ध हुए निर्दुष्ट न्यायों के द्वारा ही होना चाहिये। बिना मीमांसा के वेदों का यथार्थ तात्पर्य ज्ञात होना संभव ही नहीं। वेदों के पूर्वोत्तर काण्डों के तात्पर्य-निर्णयार्थ ही पूर्वोत्तर मीमांसाएं प्रवृत्त हुई हैं। इस कारण वैदिक वाक्यों का तात्पर्यज्ञान, मीमांसा-न्यायों के अधीन होता है।

लौकिक वाक्यों का तात्पर्य प्रकरणादिकों से ज्ञात होता है। उदाहरण 'देवः प्रमाणम्' वाक्य है। यह राजप्रकरण में पठित होने से यहाँ देव शब्द का राजा अर्थ में तात्पर्य है—निश्चित होता है। प्रकरणादि के 'आदि' पद से लिंग, औचित्य आदि का ग्रहण करना चाहिये। इस विषय में अभियुक्तों का वचन है—

'अर्थात् प्रकरणाल्लिङ्गादौचित्याद्देशकालतः।
शब्दार्थास्तु विभिद्यन्ते न रूपादेव केवलात्॥'

अर्थ (प्रयोजन), प्रकरण, लिङ्ग (शब्दसामर्थ्य), औचित्य, देश और काल से शब्दार्थों का भेद होता है। केवल शब्दस्वरूप से शब्दार्थ में भेद नहीं होता।

लौकिक और वैदिक वाक्यों में एक विशेष यह भी है कि—लौकिक वाक्य जिस अर्थ को बताते हैं, वह प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणों से अवगत (ज्ञात) ही रहता है, अपूर्व नहीं होता। इस कारण लौकिक वाक्यों में सिद्ध वस्तुओं का अनुवादकत्व ही रहता है। अपूर्वार्थप्रतिपादकत्वरूप स्वतः प्रामाण्य नहीं होता। किन्तु वेदमूलकत्वेन प्रामाण्य होता है। वैदिक वाक्यों की यह स्थिति नहीं है। वे जिस अर्थ को बताते हैं वह पहले किसी भी अन्य प्रमाण से ज्ञात नहीं रहता। इसलिये वैदिक वाक्य, अनुवादरूप न होकर अपूर्व (पुरुषबुद्धि से अगम्य) अर्थ का प्रतिपादन करते हैं। इसी कारण उन्हें (वैदिक वाक्यों को) अज्ञातार्थज्ञापकत्वरूप प्रामाण्य होता है।

पूर्व मीमांसक कार्यपरक (साक्षात् विधि-निषेधबोधक) शब्दों का ही स्वार्थ में प्रामाण्य मानते हैं। उनका कहना है कि—व्यवहार में दिखाई देता है कि उत्तमवृद्ध पुरुष (वृद्ध आदमी), मध्यमवृद्ध (तरुण पुरुष) को 'गाय लाओ' 'बछड़ा बांध' इत्यादि आज्ञा देता है। यह सब समीप बैठा बालक देखता रहता है और उससे उसे आनयनादि-क्रियान्वित ही 'गो' आदि पदों का अर्थबोध (शक्तिग्रह) होता है। इस कारण केवल सिद्धवस्तुप्रतिपादक शब्दों से शक्तिग्रह होना संभव ही नहीं। इसीकारण कार्य-बोधकत्वेन रूपेण ही शब्दों का प्रामाण्य सिद्ध होता है। सिद्धार्थप्रतिपादक वाक्यों में प्रामाण्य नहीं कह सकते। इसी अभिप्राय से उन्होंने 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्य-मतदर्थानाम्' कहा है।

२५८ | वेदान्तपरिभाषा | [ सिद्धार्थवाक्यानामपि प्रामाण्यम्

पूर्वमीमांसकों के इस मत का निरसन करने के लिये ग्रन्थकार कहते हैं—

तत्र लोके वेदे च कार्यपराणामिव सिद्धार्थानामपि ¹ प्रामाण्यम्, पुत्रस्ते जात ² ईत्यादिषु सिद्धार्थेष्व ³ पि पदानां सामर्थ्यावधारणात् । अत एव वेदान्तवाक्यानां ब्रह्मणि प्रामाण्यम् । यथा चैतत्तथा विषय-परिच्छेदे वक्ष्यते ।

अर्थ—'तत्र'—लोक और वेद में कार्यबोधक शब्दों के समान सिद्धार्थ-बोधक शब्दों में ही प्रामाण्य होता है। क्योंकि 'तुम्हें पुत्र हुआ है' इत्यादि वाक्यों में सिद्ध अर्थ का ही प्रतिपादन होने पर भी उनके पदों के सामर्थ्य (शक्ति) का निश्चय हम कर पाते हैं इसी कारण उपनिषद्-वाक्यों को ब्रह्म के विषय में प्रामाण्य माना जाता है, उसका प्रकार विषयपरिच्छेद में बतावेंगे ।

**विवरण—**कार्यपरक शब्दों के समान सिद्धार्थप्रतिपादक शब्दों का भी प्रामाण्य अवश्य स्वीकार करना चाहिये । क्योंकि कार्यपरक शब्दों से जिस प्रकार उन शब्दों का सामर्थ्य समझ में आता है उसी प्रकार 'तुम्हें पुत्र हुआ है' इत्यादि सिद्धार्थपरक शब्दों का भी शक्तिग्रह हमें होता है । 'पुत्रस्ते जातः' किसी को कहने पर सुनने वाले की मुद्रा प्रसन्न होती है, वैसे ही 'कन्या ते गर्भिणी जाता' = तेरी कन्या (अविवाहित पुत्र) गर्भिणी है—इस वाक्य के सुनते ही श्रोता की मुखमुद्रा अप्रसन्न दीखती है । इस मुखप्रसाद और मुखमालिन्य रूप लिंग से उसके हर्षविषाद का अनुमान होता है । उपर्युक्त वाक्य से उक्त अर्थ उस पुरुष को यदि ज्ञात न हुआ होता तो उसके मुख पर ऐसा परिणाम हुआ न दिखाई देता । इस अर्थापत्तिरूप प्रमाण से इस पुरुष को उक्त सिद्धार्थबोधक वाक्यों से भी शाब्दबोध (शक्तिग्रह) होता है । तस्मात् कार्यपरक शब्दों के शक्तिग्रह के समान सिद्धार्थक पदों का भी शक्तिग्रह स्वीकार करना चाहिये, जिससे सिद्धार्थक पदों में भी प्रामाण्य अर्थादेव सिद्ध हो जाता है । क्योंकि जैसे कार्यपरक वाक्य से प्रमात्मक—(यथार्थ) ज्ञान पैदा होता है वैसे ही सिद्धार्थबोधक वाक्य से भी प्रमात्मक ज्ञान पैदा होता है । अर्थात् उसके 'प्रमाकरणत्व' रूप प्रामाण्य का कोई निषेध नहीं कर सकता । 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्य०' इत्यादि सूत्र के द्वारा पूर्व काण्ड के मन्त्र तथा अर्थवादरूप वेदभाग में प्रामाण्य नहीं है, इस आशय से पूर्वपक्ष को उठाया गया है । इस कारण स्वतन्त्र-फल-रहित मन्त्रादि में विधिशेषत्वेन प्रामाण्य के प्राप्त न होने पर भी समस्त अनर्थनिवृत्तिरूप प्रयोजन (फल) से युक्त


१. 'व्युत्पत्तया प्रा०'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'तः, कन्या ते गर्भिणीत्या०'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'र्थेष्वपि'—इति पाठान्तरम् ।

वेदनित्यत्वादिविचारः ] आगमपरिच्छेदः २५९

ब्रह्मप्रतिपादक उपनिषद्वाक्यों में प्रामाण्य सिद्ध होता है। तस्मात् लौकिक एवं वैदिक दोनों शब्दों को कार्य और सिद्ध दोनों अर्थों में प्रामाण्य होता है। वेदान्तवाक्यों की केवल ( कार्यसंस्पर्शरहित ) ब्रह्मबोधकत्व कैसे होता है ? और उनका ब्रह्म रूप अर्थ में ही ही समन्वय किस प्रकार होता है ? यह सब विषयपरिच्छेद में ग्रन्थकार सविस्तर बतावेंगे अतः वेदान्त 'ब्रह्मज्ञान का विधान करने के लिए है' ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये।

स्वाभिमत वेद-प्रामाण्य की स्थापना करने के लिए प्रथम नैयायिक और पूर्वमीमांसकों के तद्विषयक मतों को बताते हैं।

तत्र वेदानां नित्यसर्वज्ञ-परमेश्वर-प्रणीतत्वेन प्रामाण्यमिति नैयायिकाः। वेदानां नित्यत्वेन निरस्त-समस्त-पुंदूषणतया प्रामाण्यमित्यध्वरमीमांसकाः। अस्माकं तु मते वेदो न नित्य उत्पत्तिमत्त्वात्। उत्पत्तिमत्त्वं च 'अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदः' १ ( बृ०-२-४-१० ) इत्यादि श्रुतेः।

अर्थ— 'तत्र'—लोक तथा वेद इन में से वेदों को नित्य, सर्वज्ञ ईश्वर के निर्मित होने से प्रामाण्य हैं—ऐसा नैयायिक कहते हैं। वेद, नित्य ( उत्पत्तिरहित ) होने से उनमें पुरुषसुलभ किसी प्रकार के दोष न होने से ही प्रामाण्य है—ऐसा अध्वरमीमांसक (यज्ञकाण्डरूपकर्मपरक वेदभाग का विचार करने वाले पूर्वमीमांसक) मानते हैं। किन्तु हमरे मत में वेद नित्य नहीं हैं क्योंकि वे उत्पत्तिमन् हैं। 'यह जो ऋग्वेदादि है वह इस महद्भूत का निःश्वसित हैं' इत्यादि श्रुति से उनका उत्पत्तिमत्त्व सिद्ध होता है।

विवरण— इनमें से प्रथम लक्षण नैयायिकों का है। 'वेद, नित्य एवं सर्वज्ञ परमेश्वर के प्रणीत होने से उन्हें प्रामाण्य है' यह उनका मत है। 'कर्ता के दोष से उनमें अप्रामाण्य की कोई शङ्का न करे, इसलिये वेदों के परमेश्वर-प्रणीत होने पर भी वह वेदकर्ता परमेश्वर सर्वज्ञ होने के कारण कर्तृदोषप्रयुक्त अप्रामाण्य उनमें प्राप्त नहीं होता यह बात 'सर्वज्ञ' विशेषण से सूचित की है। सर्वज्ञत्व, मन्वादि स्मृतिकारों में भी होने से तत्प्रणीत ग्रन्थों को भी प्रामाण्य प्राप्त हो सकता है, इसलिये परमेश्वर को 'नित्य' विशेषण दिया है। मन्वादिकों के सर्वज्ञ होने पर भी वे नित्य न होने से उपर्युक्त शङ्का ही नहीं उठ सकती। 'प्रणीतत्व' के कहने से वेदान्ती और नैयायिक के मतोंमें वैलक्षण्य सूचित कर दिया गया। वेदान्तमत से वेदों में उत्पत्तिमत्त्व के होने पर भी ( वेद, उत्पन्न हुए हैं—यह स्वीकार करने पर भी ) वे अन्य कल्प की आनुपूर्वी से विजातीय आनुपूर्वीयुक्त एवं ईश्वरप्रणीत हैं—यह नैयायिकों का कथन वेदान्तियों को मान्य नहीं है।


१. 'दो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इ०'—इति पाठान्तरम् ।

२६० | वेदान्तपरिभाषा | [ वेदनित्यत्वादिविचारः

(पूर्व कल्प के वेद का अनुक्रम भिन्न है और ईश्वर-निर्मित इस कल्प के वेद का अनुक्रम अत्यन्त विलक्षण है—ऐसा नैयायिक मानते हैं। यह अद्वैत वेदान्तियों को सम्मत नहीं है। वे आकाशादिकों के समान वेदों की उत्पत्ति मानते हैं। किन्तु उनकी आनुपूर्वी, पूर्वकल्प की आनुपूर्वी के समान ही होती है, यह सिद्ध करते हैं।)

अब मीमांसकों के मत को बताते हैं—हमने वेदों की नित्यता स्वीकार की होने से, उनमें पुरुषगत समस्त दोषों का अभाव है, इस कारण उन्हें प्रामाण्य है। वेदों को यदि अनित्य माना जाय तो उनमें पुरुष-प्रणीतत्व मानना होगा। वेदकर्ता पुरुष में ईश्वरत्व होने पर भी उसमें भक्तपक्षपात आदि दोष होना बहुत संभव है। इस कारण बौद्धप्रणीत आगम के समान वेदों में भी दोष हो सकते हैं। किन्तु वेदों के नित्य होने से उनमें से समस्त पुरुषदोषों का निरसन हो जाता है। उनमें भ्रम-प्रमादादि कोई दोष नहीं कहा जा सकता, इसी कारण वे प्रमाण कहे जाते हैं।

इस प्रकार नैयायिक एवं मीमांसकों के वेदप्रामाण्यविषयक मतों को बताकर अब ग्रन्थकार स्वयं अपना मत बताते हैं। वेद की उत्पत्ति होने से हमारे मत में वे नित्य नहीं है। यहाँ पर 'तु' शब्द उभयपक्षों से अपने मत की विलक्षणता प्रकट करने के लिये है। उत्पत्ति के कारण वेदों के अनित्य होने पर भी प्रलय-काल तक उनकी स्थिरता स्वरूपतः रहती है। इसलिये वे पुरुषदोषों से रहित रहते हैं। उनका पुरुषदोष-निर्मुक्तत्व श्रुतिसिद्ध होने से वेदों के अनित्यत्व में साधक 'उत्पत्तिमत्त्व' हेतु को स्वरूपा-सिद्ध नहीं कहा जा सकता। 'ऋग्वेदादि, इस महाभूत का निःस्वसित है' इत्यादि श्रुतियाँ वेदों की उत्पत्ति में प्रमाण हैं। यहाँ के 'आदि' शब्द से पुरुषसूक्त की 'ऋचः सामानि जज्ञिरे' इत्यादि श्रुति का ग्रहण करना चाहिये।

'वेद नित्य नहीं हैं' वेदान्तियों के इस कथन से यह प्रतीत होता है कि नैयायिका-भिमत त्रिक्षणावस्थायित्व भी उन्हें अनुमत होना चाहिये। इस शङ्का के निरसनार्थ 'नापि०' आदि ग्रन्थ से ग्रन्थकार बताते हैं कि 'मीमांसकों का अभिमत 'वेदनित्यत्व' जैसे हमें सम्मत नहीं वैसे ही नैयायिकसम्मत 'अनित्यत्व' भी हमें मान्य नहीं।

नापि वेदानां त्रिक्षणावस्थायित्वम् । य एव वेदो देवदत्तेनाधीतः; स एव¹ वेदो मयाऽधीत इत्यादिप्रत्यभिज्ञा-विरोधात् । अत एव गकारादि-वर्णानामपि न क्षणिकत्वं, सोऽयं गकार इति प्रत्यभिज्ञा-विरोधात् ।

अर्थ— वेदों में त्रिक्षणावस्थायित्व भी नहीं है। क्योंकि जिस वेद को देवदत्त ने पढा, उसको मैंने भी पढ़ा' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा के साथ विरोध आता है। इसी कारण


१. 'मयापीत्या'—इति पाठान्तरम् ।

वेदनित्यतादिविचारः ] आगमपरिच्छेदः २६१

गकारादि-वर्णों को भी क्षणिकत्व नहीं है, क्योंकि 'वही यह गकार' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा के साथ विरोध आता है ।

विवरण—वर्णों के समुदायरूप वेदों में त्रिक्षणावस्थायित्व ( क्षणिकत्व ) नहीं है । जो वस्तु क्षणिक होती है वह तीन क्षण ( उत्पत्ति का एक क्षण, स्थिति का दूसरा क्षण, नाश का तीसरा क्षण ) ही रहती है । नैयायिक लोग ऐसी वस्तु को क्षणिक, अनित्य आदि कहते हैं । वर्ण-समुदायरूप वेद में स्वरूपतः ऐसा क्षणिकत्व नहीं रहता, क्योंकि कल्प के आरंभ में जो वेद था वही मध्यकाल में एवं वर्तमान काल में भी है, ऐसी प्रत्यभिज्ञा होती है । नैयायिकों के मतानुसार उनमें त्रिक्षणावस्थायित्वरूप क्षणिकत्व रहता है, परन्तु ऐसा मानने पर उस प्रत्यभिज्ञा से विरोध आता है । इसलिये वर्णसमुदायगर्भ वेदों को स्वरूपतःक्षणिक स्वीकार नहीं किया जा सकता । 'अत एव' इत्यादि ग्रन्थ से वर्णों के द्वारा भी उनमें क्षणिकत्व नहीं है—बताया है । जब कि प्रत्यभिज्ञा के साथ विरोध होने के कारण पदादि समुदायगर्भ वेद में क्षणिकत्व नहीं होता । इसी कारण 'देवदत्त से उच्चारित जो गकार है वही यह है' इत्यादि प्रत्यभिज्ञा के साथ विरोध आने के कारण वर्णों में भी क्षणिकत्व नहीं होता । एवंच नैयायिकाभिमत-त्रिक्षणावस्थायित्वस्वरूप क्षणिकत्व नहीं है ।

शंका—वर्णसमुदाययुक्त वेदों में वर्णों में भी यदि क्षणिकत्व नहीं तो आपके मत में वेदों में उत्पत्तिमत्त्व और उस कारण अनित्यत्व किस प्रकार है ? उत्तर देते हैं—

तथा च वर्ण-पद-वाक्यसमुदाय^१स्य वेदस्य वियदादिवत् सृष्टिकालीनोत्पत्ति^२मत्त्वं प्रलयकालीनध्वंस-प्रतियोगित्वं च । न तु मध्ये वर्णानामुत्पत्ति-विनाशौ, अनन्तगकारकपने^३ गौरवात् । अनुच्चारण-दशायां वर्णानामनभिव्यक्तिस्तदुच्चारणरूप-व्यञ्जकाभावान्न विरुध्यते । अन्धकारस्थ^४ले घटानुपलम्भवत् । उत्पन्नो गकार^५ इत्यादिप्रत्ययः सोऽयं गकार^६ इति प्रत्यभिज्ञा-विरोधादप्रमाणम्, वर्णाभिव्य^७क्ति-जनकध्वनिगतोत्पत्ति-निरूपित-परम्परासम्बन्ध-विषयत्वेन प्रमाणं वा । तस्मान्न वेदानां क्षणिकत्वम् ।

अर्थ—वेदों में स्वरूपतः एवं वर्णद्वारा भी क्षणिकत्व नहीं है यह सिद्ध होने पर


१. 'रूपस्य'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'त्तिकत्वं'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'ल्पनायां-इति पाठान्तरम् ।
४. 'स्थघ'-इति पाठान्तरम् ।
५. 'इति प्रत्यक्षं तु'-इति पाठान्तरम् ।
६. 'इत्यादि'-इति पाठान्तरम् ।
७. 'व्यंजकध्व' इति पाठान्तरम् ।

२६२वेदान्तपरिभाषा[वेदनित्यत्ववादिविचारः

वर्णसमुदाय, पदसमुदाय और वाक्यसमुदाय रूप वेदों में आकाश आदि के समान् सृष्टि-कालीन उत्पत्तिकामत्त्व और प्रलयकालीन ध्वंस का प्रतियोगित्व है। बीच में ही वर्णों की उत्पत्ति और विनाश नहीं होते, क्योंकि अनंत गकारों की कल्पना करने में गौरव होता है।

वर्णों की अनुच्चारण दशा में (जब कि उनका उच्चारण नहीं किया जाता) उनकी (वर्णों की) अभिव्यक्ति न होने में कारण, उच्चारणरूप व्यंजक का अभाव ही है। अतः अनुच्चारित दशा में उनकी अभिव्यक्ति न होने में कोई विरोध नहीं है। अन्धकार स्थल में (जहाँ गाढ़ अन्धकार हो वहाँ) विद्यमान भी घट, अभिव्यंजक न होने से जैसे नहीं दिखाई देता उसी प्रकार वर्णों के अभिव्यंजक उच्चारण के अभाव से विद्यमान वर्ण भी अभिव्यक्त नहीं होते। अभी 'गकार उत्पन्न हुआ' आदि जो प्रत्यय होता है, वह 'वही यह गकार' इस प्रत्यभिज्ञा के विरोध के कारण अप्रमाण है। अथवा वर्णों की अभिव्यक्ति की जनक जो ध्वनिगत उत्पत्ति, उससे निरूपित हुए परम्परा सम्बन्ध के विषयत्वेन (विषयरूप में) वह प्रत्यय प्रमाण है। तस्मात् वेद, क्षणिक नहीं हैं।

विवरण—'तथा च'--'वेदों में स्वरूपतः एवं वर्णतः भी क्षणिकत्व के सिद्ध न होने पर आकाश-वायु आदि इतर भूत-भौतिक पदार्थों के समान सृष्टिकाल में उत्पन्न होना और प्रलयकाल में ध्वंस को प्राप्त होना आदि उनके धर्म हैं अर्थात् आकाशादिकों के समान सृष्टि के समय वे उत्पन्न होते हैं और प्रलयकाल में नष्ट होते हैं, स्थितिकाल में वे विद्यमान रहते हैं। इस कारण उत्पत्ति एवं प्रलयकाल के बीच वर्णों की उत्पत्ति नाश नहीं होता। क्योंकि प्रतिक्षण गकारादि वर्ण उत्पन्न होते हैं और नष्ट होते हैं—

यह मानने पर गकारादि अनन्त वर्णों की कल्पना करनी पड़ती है और ऐसा करने में गौरव होता है।

शंका--यदि वर्ण नित्य हैं तो वे सदैव अभिव्यक्त क्यों नहीं होते? इस आशंका के समाधानार्थ ग्रन्थकार कहते हैं—वर्णों के नित्य होने पर भी जिस समय उनका उच्चारण नहीं किया जाता उस समय वे अभिव्यक्त नहीं होते। क्योंकि उच्चारणरूप अभिव्यंजक का अभाव रहता है। इस कारण वर्णों के नित्य होने पर भी उनके सदैव अभिव्यक्त न होने में कोई दोष नहीं है। अन्धकार में विद्यमान घट, नहीं दीखता, उसका अभिव्यंजक प्रकाश है, बिना उसके घट का दीखना अशक्य है। अन्धकार में न दीखने के कारण वह है ही नहीं—यह नहीं कहा जाता। उसी प्रकार बिना उच्चारण किये वर्णों की अभिव्यक्ति नहीं होने मात्र से वे हैं ही नहीं—यह नहीं कहा जा सकता।

'गकार उत्पन्न हुआ' वह नष्ट हुआ' यह प्रत्यय (अनुभव) होते रहने के कारण, उच्चारण करते ही उनकी उत्पत्ति होना और उच्चारण बन्द करते ही उनका नाश होना आप स्वीकार क्यों नहीं करते? ऐसी शंका उठाकर ग्रन्थकार कहते हैं—

वेदानित्यत्वादिविचारः ] आगमपरिच्छेद. २६३

यह प्रतीति अप्रमाण है। क्योंकि 'वही यह गकार है' इस प्रत्यभिज्ञा के साथ उसका विरोध है। अथवा वर्णों की अभिव्यक्ति को उत्पन्न करने वाली ध्वनि की उत्पत्ति से ज्ञात होने वाले 'स्वाश्रयध्वन्यभिव्यंग्यत्व' रूप परम्परासम्बन्ध से वैसा प्रत्यय होने के कारणपरम्परासम्बन्धविषयत्वेन वह प्रत्यय प्रमाण है—यह मानना चाहिए। 'काला घट नष्ट हुआ और लाल घट उत्पन्न हुआ' इस प्रकार की एक ही घट में गुण के सम्बन्ध से प्रतीति होती है, उसी प्रकार वर्ण की अभिव्यक्ति करने वाली ध्वनि की उत्पत्ति से वर्णों की उत्पत्ति का परंपरा-सम्बन्ध ज्ञात होता है। इस कारण उस उत्पत्ति प्रत्यय को साक्षात् प्रमाण न मानकर परंपरा-सम्बन्ध-विषयत्वेन आप चाहें तो प्रमाण मान लें। अतः वेदों में क्षणिकता नहीं है—यह सिद्ध हुआ। क्योंकि वे प्रतिक्षण में उत्पन्न होकर नष्ट नहीं होते, किन्तु सृष्टिकाल में आकाश आदि इतर पदार्थों के समान उत्पन्न होते हैं और प्रलयकाल में ही नाश को प्राप्त होते हैं। 'स्वाश्रयध्वन्यभिव्यंग्यत्व' का अर्थ है स्वोत्पत्ति का आश्रय जो ध्वनि, उसका विषयत्व—ध्वनिरूप अभिव्यंजक के द्वारा अभिव्यक्त होना। ध्वनि की उत्पत्ति से वर्ण व्यक्त होते हैं।

सिद्धान्ती के इस समाधान पर मीमांसक अपसिद्धान्त की शंका करते हैं—

ननु क्षणिकत्वाभावेऽपि वियदादि-प्रपञ्चवदुत्पत्तिमत्वेन परमेश्वर-कर्तृकतया पौरुषेयत्वाद^१पौरुषेयत्वं^२ च वेदानामिति तव^३ सिद्धान्तौ भज्येतेति चेत् । न । न हि^४ तावत्पुरुषेणोच्चार्यमाणत्वं पौरुषेयत्वम् । गुरुमतेऽपि अध्यापक-परम्परया पौरुषेयत्वापत्तेः । नापि पुरुषाधीनोत्पत्तिकत्वं^५ पौरुषेयत्वम् । नैयायिकाभिमतपौरुषेयत्वानुमानेऽस्मदादिना सिद्धसाधनत्वापत्तेः^६ । किन्तु सजातीयोच्चारणानपेक्षोच्चारणविषयत्वम्^७ ।

अर्थ—वेदों के क्षणिक न होने पर भी आकाशादि प्रपंच के समान उनमें उत्पत्तिमत्त्व होने से और वह उत्पत्ति परमेश्वरकर्तृक होने से (उनका कर्त्ता परमेश्वर होने से) पौरुषेयत्व है। इस कारण वेदों के अपौरुषेयत्व का आपका सिद्धान्त भग्न होगा। यह यदि मीमांसक कहे तो उचित नहीं है। क्योंकि पुरुष के द्वारा उच्चारण किया जाना ही पौरुषेयत्व नहीं है। क्योंकि वैसा मानने पर गुरुमत में भी अध्यापक परम्परा से


१. 'त्वसिद्धाव'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'वेदा०'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'अपि'—इति पाठान्तरम् ।
४. हिपुरु०'—इति पाठान्तरम् ।
५. 'त्वं नैया०'—इति पाठान्तरम् ।
६. 'नापत्ते०'—इति पाठान्तरम् ।
७. 'त्वं पौरुषेयत्वम्'—

२६४ वेदान्तपरिभाषा [वेदनित्यत्वादिविचारः

पौरुषेयत्व की प्राप्ति होने लगेगी। इसी प्रकार 'जिसकी उत्पत्ति पुरुष के अधीन है'—वह पौरुषेय है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि नैयायिकों से सम्मत पौरुषेयत्व के अनुमान पर हम वेदान्तियों के द्वारा 'सिद्ध-साधनता' दोष दिया जाता है। इसलिये 'जिसे सजातीय उच्चारण की अपेक्षा नहीं होती ऐसे उच्चारण का विषय होना' ही पौरुषेयत्व है।

**विवरण—**वेदान्ती के पूर्वोक्त सिद्धान्त पर मीमांसक कहता है—'तुम्हारे मत में भले ही वेदों में क्षणिकत्व न हो तथापि आकाशादि इतर प्रपंच के समान उत्पत्तिमत्त्व है। और उसकी उत्पत्ति करनेवाला परमेश्वर है, इस कारण वेदों में पौरुषेयत्व (पुरुष-कर्तृत्व) है। ऐसा तुम्हारे सिद्धान्त के ही विरुद्ध सिद्ध होता है। क्योंकि तुम्हारा वेदापौरुषेयत्व का सिद्धान्त ईश्वर-कर्तृत्व के कारण बाधित हो जाता है।

परन्तु वेदान्ती कहता है—हमारे मत में भले ही वेद पैदा हुए हों तथापि पौरुषेयत्व न होने से अपसिद्धान्त नहीं हो पाता। हमारे मत पर मीमांसक जो पौरुषेयत्व का दोष देते हैं वह कैसे पौरुषेयत्व को मानकर ? क्या पुरुष के द्वारा उच्चारण किया जाना पौरुषेयत्व है, या पुरुष के अधीन वेदोत्पत्ति का होना पौरुषेयत्व है ? प्रथम पक्ष में मौनी पुरुष के श्लोक को भी अपौरुषेय कहने का प्रसंग प्राप्त होगा। क्योंकि जिसने मौन व्रत धारण किया हो वह अपने श्लोक को मुख से बोलता नहीं किन्तु लिखकर दिखाता है। उच्चारण न करने के कारण आपके लक्षण के अनुसार उसे अपौरुषेय कहना होगा। इसके अतिरिक्त गुरुमत में भी अध्यापक परम्परा से वेदों को पौरुषेय कहना होगा। क्योंकि उनके मत में अध्यापकों की परम्परा से ही वेदों का उच्चारण किया जाता है।

अस्तु, 'पुरुषेणोच्चार्यमाणत्वं' पौरुषेयत्वम्-इस प्रथम लक्षण को स्वीकार न कर 'पुरुषाधीनोत्पत्तिकत्वम्'—जिसकी उत्पत्ति पुरुष के अधीन होती है, वह पौरुषेय—इस द्वितीय लक्षण को यदि मानें तो उस पर सिद्धसाधन दोष आता है।

नैयायिक--'वेदाः पौरुषेयाः वाक्यत्वात् भारतादिवत्'—वेद पौरुषेय हैं, क्योंकि वे वाक्य हैं, भारतादिकों के तुल्य। ऐसा अनुमान कर वेदों का पौरुषेयत्व साधन करते हैं। परन्तु हम तथा अन्य कुछ वादी भी नैयायिक संमत अनुमान के द्वारा ही स्वीकृत पौरुषेयत्व को साधन करते हैं। इस कारण उनके पौरुषेयत्वानुमान पर सिद्धसाधनता दोष आता है।

वेदान्तियों को कैसा पौरुषेयत्व मान्य है ? जिसके घटित न होने के कारण वेदों के उत्पत्तिमन् होने पर भी अपौरुषेयत्व सिद्ध हो जाता है ? इस शंका से प्रेरित होकर ग्रन्थकार 'किन्तु' आदि ग्रन्थ से उसका समाधान करते हैं। 'जिसे सजातीय उच्चारण की अपेक्षा नहीं होती—ऐसे उच्चारण का विषय होना ही हमारे मत में पौरुषेयत्व है। भारतादि ग्रंथों के उच्चारण में पूर्व सजातीय उच्चारण की अपेक्षा नहीं होती। किन्तु

वेदानित्यत्वादिविचारः ] आगमपरिच्छेदः २६५

परमेश्वर सृष्टि के प्रारम्भ में सजातीय उच्चारण की अपेक्षा से ही वेदों का उच्चारण करता है इसलिए उन्हें अपौरुषेयत्व है । इसी सिद्धान्त को और अधिक स्पष्ट करते हैं ।

तथा च सर्गाद्यकाले परमेश्वरः १पूर्वसर्ग-सिद्धि-वेदानुपूर्वीसमानानु-पूर्वीकं वेदं विरचितवान् , न तु तद्विजातीयं२ वेदमिति न सजातीयो-च्चारणानपेक्षोच्चारणविषयत्वं पौरुषेयत्वं३ वेदानाम् । भारतादीनां४ तु सजातीयोच्चारणमनपेक्ष्यैवोच्चारणमिति तेषां पौरुषेयत्वम् : एवं पौरुषेयापौरुषेय-भेदेनागमो द्विधा५ निरूपितः ।

श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्रविरचितायां वेदान्तपरिभाषायाम्
आगमपरिच्छेदः समाप्तः ॥ ४ ॥

अर्थ— ऐसा होने से परमेश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में पूर्वसर्ग के समय वेदों की सिद्धि आनुपूर्वी के समान ही जिसकी आनुपूर्वी है ऐसे वेद की रचना की । उस आनुपूर्वी से भिन्न ( विजातीय ) विलक्षण आनुपूर्वीवाले वेद की रचना उसने नहीं की । अतः उसमें ( वेदमें ) सजातीय उच्चारण की अपेक्षा जिसे नहीं ऐसे उच्चारण का विषयत्व नहीं है । और भारतादि पौरुषेय ग्रन्थों का उच्चारण, सजातीय उच्चारण की बिना अपेक्षा किए ही होती है अतः उनमें पौरुषेयत्व है । इस प्रकार पौरुषेय अपौरुषेय भेद से आगम दो प्रकार का है । यह । यह हमने इस प्रकरण में निरूपण किया ।

विवरण— उपर्युक्त प्रकार का पौरुषेयत्व होने से वेदों में पौरुषेयत्व नहीं है । क्योंकि आद्यसृष्टि के समय परमेश्वर ने पूर्वकल्पसिद्ध अनुक्रम के अनुसार ही जिसका अनुक्रम है ऐसे वेद को रचा । भिन्न अनुक्रम से वेद की रचना नहीं की । पूर्वकल्प में वह जैसा था वैसा ही रचा, उसमें एक अक्षर का भी परिवर्तन नहीं किया गया । इसी कारण उसमें पौरुषेयत्व नहीं है किन्तु सजातीय उच्चारण की जिन्हें अपेक्षा नहीं होती ऐसे उच्चारण किये जाने वाले अर्थात् विजातीय आनुपूर्वीवाले ग्रंथ ही पौरुषेय होते हैं - महाभारतादि ग्रन्थों में पूर्वकल्प का सजातीय उच्चारण नहीं रहता इसलिए वे पौरुषेय हैं । इस प्रकार चतुर्थ आगम नामक प्रमाण पौरुषेय एवं अपौरुषेय भेद से दो प्रकार का होता है । उसका हमने यहाँ सविस्तर निरूपण किया ।

श्रीगजाननशास्त्रि-मुसलगगांवकर-विरचिते सविवरण-प्रकाशे
आगम-परिच्छेदः समाप्तः ।

—: ० :—


१. 'वंसिद्ध'-इति पाठान्तरम् ।२. 'यमिति'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'त्वम्'-इति पाठान्तरम् ।४. 'नां स'-इति पाठान्तरम् ।
४. विधो'-इति पाठान्तरम् ।

अथार्थापत्तिपरिच्छेदः ५

इस प्रकार आगम प्रमाण का निरूपण कर अब क्रमप्राप्त अर्थापत्तिसंज्ञक पंचम प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा करते हैं—

इदानीमर्थापत्तिर्निरूप्यते । तत्रोपपाद्यज्ञानेनोपपादक-कल्पनमर्थापत्तिः । तत्रोपपाद्यज्ञानं करणम् । उपपादक ज्ञानं फलम् । येन विना यदनुपपन्नं तत्तत्रोपपाद्यम्, यस्याभावे यस्यानुपपत्तिस्तत्तत्रोपपादकम् । यथा रात्रिभोजनेन विना दिवाऽभुञ्जानस्य पीनत्वमनुपपन्नमिति तादृशपीनत्वस्यानुपपत्तिरिति रात्रिभोजनमुपपादकम् ।

**अर्थ—**अब अर्थापत्ति प्रमाण का निरूपण किया जाता है । तत्रेति—उस प्रमाणरूप अर्थापत्ति में उपपाद्य ( कार्य ) के ज्ञान से उपपादक ( कारण ) की कल्पना ( ज्ञान ) ही अर्थापत्ति प्रमा है । इन दो ज्ञानों में से—उपपाद्य ज्ञान प्रमाण ( कारण, साधन ) है और उपपादक का ज्ञान प्रमा ( फल ) है । जिसके बिना जो अनुपपन्न होता है वह उपपाद्य, और जिसके अभाव में जिसकी अनुपपत्ति होती है वह वहां उपपादक होता है । जैसे—रात्रि-भोजन के बिना दिन में भोजन न करने वाले पुरुष का पीनत्व अनुपपन्न ( असंभव ) है, इस कारण वैसा पीनत्व ( पुष्टत्व ) उपपाद्य है, और रात्रिभोजन के अभाव में जैसे पीनत्व ( पुष्टि ) की अनुपपत्ति ( असंभव ) है, इस कारण रात्रि-भोजन उस पुष्टि का उपपादक है ।

**विवरण—**कदाचित् कोई दांभिक पुरुष दिन में भोजन नहीं करता किन्तु उसका शरीर पुष्ट दीखता है। परन्तु भोजन के बिना ऐसी पुष्टि असंभव है । इससे यह निश्चित है कि वह पुरुष रात्रि में अवश्य ही भोजन करता होगा । इस प्रकार पीनत्व रूप कार्य से रात्रि-भोजन रूप कारण की कल्पना की जाती है यही अर्थापत्ति प्रमा है । इस प्रमा के प्रमाण को भी अर्थापत्ति ही कहते हैं । सारांश यह है कि एक ही अर्थापत्ति शब्द, प्रमा और प्रमाण का भी वाचक है । इस अर्थापत्ति को ही शास्त्रीय ग्रन्थों में 'अन्यथानुपपत्ति' शब्द से भी कहते हैं । किसी अन्य प्रकार से कार्य की उपपत्ति न हो सकने से जो कारण की कल्पना की जाती है, वह ज्ञान कार्य के ज्ञान से ही होता है । इस कल्पक ज्ञान को ही उपपाद्य ( उपपन्न होने योग्य ) ज्ञान कहते हैं । इसलिये वह उपपाद्य ( अर्थापत्ति ) का करण है । जिसके कारण उपपाद्य की उपपत्ति लगती है वह रात्रि-भोजनादि का ज्ञान, उपपादक ( उपपत्ति बतानेवाला ) है । तस्मात् कार्यज्ञान के अनन्तर उसकी अन्यथा ( अन्य प्रकार से ) उपपत्ति न लग सकने के कारण उसके उचित

प्रमा-प्रमाणयोरर्थापत्तिशब्दः ] अर्थापत्तिपरिच्छेदः २६७

कारण की कल्पना करना ही अर्थापत्ति है। और उपपाद्य का ( कल्पक का ) ज्ञान उसका कारण होने से ही वह अर्थापत्ति प्रमाण है। 'येन विना०' इत्यादि ग्रन्थ से उपपाद्य और उपपादक के लक्षण बताये हैं। 'येन विना०' इस वाक्य के प्रथम 'तत्' शब्द से 'यदनुपपन्नं', के प्रथमान्त 'यत्' शब्द-वाच्य अर्थ का परामर्श किया गया है, और 'तत्र' इस पद से 'येन विना' के यत् शब्दवाच्य अर्थ का परामर्श किया गया है। जिसके बिना जिसकी अनुपपत्ति ( अयोग्यरूप से प्रतीति ) होती है वह उपपाद्य कहा जाता है। जैसे रात्रि-भोजन के बिना दिन में भोजन न करनेवाले पुरुष का पीनत्व अनुपपन्न होता है, अर्थात् अयोग्यत्वेन प्रतीत होता है। ऐसे पुरुष का शरीर पुष्ट रहना संभव नहीं, इसलिये वह पीनत्व, उपपाद्य है। इसीलिये 'उपपादकाभावव्यापकीभूताभावप्रतियोगित्व' रूप लक्षण भी यहाँ कहा गया है। प्रकृत स्थल में 'पीनत्व' उपपाद्य है और रात्रि-भोजन' उपपादक है। उपपाद्यरूप पीनत्व का अभाव, उपपादकरूप रात्रि-भोजन के अभाव का व्यापकीभूत ( व्यापक ) है, अर्थात् जहाँ-जहाँ भोजन का अभाव रहता है वहाँ-वहाँ निश्चय से ( नियमेन ) पीनत्व का भी अभाव रहता है। भोजन के बिना पुष्ट का होना कभी संभव नहीं। अर्थादेव ऐसे व्यापक अभाव का प्रतियोगी पीनत्व है, अतः उपपाद्य-लक्षण का 'पीनत्व' रूप लक्ष्य में समन्वय हो जाता है।

इसी प्रकार 'यस्याभावे०' इस वाक्य से उपपादक का लक्षण बताया है। पूर्ववत् यहाँ यत्-तत् शब्दों का व्युत्क्रम ( उलटा क्रम ) नहीं है। प्रथम 'यस्य' इस शब्द से जिस अर्थ का कथन किया है, उसी का प्रथमान्त 'तत्' शब्द से निर्देश किया है। दिन में भोजन न करने वाले पुरुष के पीनत्व की जिस रात्रि-भोजन के अभाव में अनुपपत्ति होती है, वह रात्रि-भोजन उपपादक है। इस कारण 'उपपाद्याभावव्याप्याभावप्रतियोगित्व' यह उपपादक का लक्षण सिद्ध होता है। उपपाद्य का अभाव उपपादक के अभाव का व्यापक होता है। अर्थात् उपपाद्याभाव व्यापक और उपपादकाभाव व्याप्य होता है; पीनत्व के अभाव का व्याप्य जो रात्रि-भोजन का अभाव, उसका रात्रि-भोजन प्रतियोगी है। सारांश यह है कि कल्पकज्ञान उपपाद्य होता है और कल्प्यज्ञान उपपादक होता है—यह कल्पना अनुपपत्तिमूलक है। एक ही अर्थापत्तिशब्द प्रमा और प्रमाण दोनों का वाचक कैसे होता है? उत्तर देते हैं—

रात्रिभोजन-कल्पना-रूपायां प्रमितावर्थस्यापत्तिः कल्पनेति षष्ठीसमासेन अर्थापत्तिशब्दो वर्तते, कल्पनाकरणे पीनत्वादिज्ञाने त्वर्थस्यापत्तिः कल्पना यस्मादिति बहुव्रीहि समासेन वर्तते इति फलकरणयोरुभयोस्तत्पदप्रयोगः।


१. षष्ठीसमासबहुव्रीहिभ्यां फलरूपाप्रमाण ( करण ) रूपा च अर्थापत्तिरिति तात्पर्यम्।

२६८वेदान्तपरिभाषा[ अर्थापत्तिद्वैविध्यम् ]

अर्थअर्थ (पदार्थ) की आपत्ति (कल्पना) इस षष्ठी तत्पुरुष समास से 'अर्थापत्ति' शब्द, रात्रि-भोजनकल्पनारूप प्रमा अर्थ में रहता है और जिससे पदार्थ की कल्पना होती है—वह अर्थापत्ति प्रमाण, इस बहुव्रीहि समास से अर्थापत्ति शब्द, उस कल्पना के साधनभूत पीनत्वादिज्ञानरूप अर्थ में रहता है। इस कारण प्रमा और प्रमाण दोनों अर्थों में 'अर्थापत्ति' संज्ञक एक ही शब्द का प्रयोग होता है।

विवरण—शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त यदि एक ही हो तो एक शब्द, दो अर्थों का वाचक नहीं होगा। प्रकृत में प्रमा एवं प्रमाण अर्थ में अर्थापत्ति शब्द की प्रवृत्ति का निमित्त भिन्न-भिन्न है। 'अर्थस्य आपत्तिः अर्थापत्तिः' ऐसा—षष्ठीतत्पुरुष समास करने पर अर्थापत्ति शब्द का 'कल्पना' अर्थ होने से अर्थापत्ति का 'प्रमा' अर्थ होता है। और उसी शब्द की 'अर्थस्य आपत्तिः यस्मात् तत्' बहुव्रीहि समास से व्युत्पत्ति यदि मानी जाय तो अर्थापत्ति का 'प्रमाण' अर्थ होता है। इस प्रकार प्रवृत्ति-निमित्त का भेद होने से एक ही अर्थापत्ति शब्द के 'प्रमा और प्रमाण' ये दो अर्थ हो सकते हैं।

इस प्रकार अर्थापत्ति प्रमा और प्रमाण का लक्षण बताकर अब उसके भेद को बताते हैं।

सा¹ चार्थापत्तिर्द्विविधा—दृष्टार्थापत्तिः श्रुतार्थापत्तिश्चेति। तत्र दृष्टार्थापत्तिर्यथा—इदं रजतमिति पुरोवर्तिनि प्रतिपन्नस्य रजतस्य नेदं रजतमिति तत्रैव ²निषिध्यमानत्वं सत्यत्वेऽनुपपन्नमिति रजतस्य सद्विविक्तत्वं सत्यत्व-त्यन्ताभाववत्त्वं वा मिथ्यात्वं कल्पयतीति³।

अर्थ—और वह अर्थापत्ति दो प्रकार की है। दृष्टार्थापत्ति और श्रुतार्थापत्ति। उनमें से दृष्टार्थापत्ति का उदाहरण जैसे—'यह रजत है' इस प्रकार आगे दीखनेवाली वस्तु में ज्ञात होनेवाले रजत का उसी पदार्थ में 'यह रजत नहीं' यह निषेध (उस रजत में)


१. अर्थापत्तिनिरूपणस्य अद्वैतिनां मते क उपयोगः ? श्लोकवार्तिककाराः कथयन्ति—
स्मृत्या श्रुतिर्या परिकल्प्यतेऽस्मिन् लिङ्गादिभिर्याविनियोजिका च।
फलादिभिर्यत् परिपूरणं च सम्बन्धकृत्तत्र न काचिदस्ति।
तत्सर्वमित्याद्यसमञ्जसं स्यात् न चेदियं स्यादनुमानतोऽन्या॥
इत्थमनुमानात् पृथग्रूपेण स्वीकृतस्य अर्थापत्तिप्रमाणस्य स्मृत्या श्रुतिकल्पनादीनि यानि प्रयोजनानि उक्तानि न तानि अद्वैतिनामसाधारणानि प्रयोजनानि, इति चेत् प्रपञ्चमिथ्या-त्वसिद्धिरेव तत्फलमिति दृष्टार्थापत्त्युदाहरणेन ग्रन्थकारः स्वयं सूचयति।
२. 'प्रतिषिः'—इति पाठान्तरम्।
३. प्रातिभासिकत्वं कल्पयति—इति तात्पर्यम्, परोक्षस्थले परिभाषाकारैः अन्यथा-ख्यातिस्वीकारात् अपरोक्षरजतनिषेध एव प्रातिभासिकत्वसाधकः इति भावः।

श्रुतार्थापत्तेरुदाहरणम् ] अर्थापत्तिपरिच्छेदः २६९

सत्यत्व होने पर अनुपपन्न होता है। इस कारण (वह निषेध) उस रजत में सद्भिन्नत्व या सत्यत्वात्यन्ताभाववत्व रूप मिथ्यात्व की कल्पना करा देता है।

विवरण—दृष्टार्थापत्ति¹ एवं श्रुतार्थापत्ति भेद अर्थापत्ति के दो प्रकार हैं। उनमें से जिस अर्थापत्ति का विषय दृष्ट होता है उसे दृष्टार्थापत्ति कहते हैं। जैसे—सामने दीखने वाले पदार्थ का प्रथम 'यह रजत है' ऐसा ज्ञान होता है। परन्तु किसी आप्त के कहने पर अथवा स्वयं वहाँ जाकर उसे हाथ में लेकर देखने के पश्चात् 'यह रजत नहीं है' ऐसा ज्ञान होता है। वास्तव में वह रजत यदि सत् (वस्तुभूत) पदार्थ होता तो उसका निषेध कैसे होता। अतः ऐसी कल्पना की जाती है कि यहाँ पर वास्तव में रजत की सत्ता नहीं अर्थात् रजत सत्य नहीं है। वह सद्भिन्न अर्थात् असत् (मिथ्या) है। अथवा इस रजत में सत्यत्व का अत्यन्ताभाव है। इस प्रकार उसके सत्यत्वात्यन्ताभाव-वत्वरूप मिथ्यात्व की कल्पना की जाती है। यह मिथ्यात्व की कल्पना निषेध के कारण होती है और रजत तथा शुक्ति दोनों विषय दृष्ट हैं। इस कारण रजत की इस मिथ्या-त्वकल्पना को दृष्टार्थापत्ति कहते हैं। इस प्रकार दृष्टार्थापत्ति के कारण रजत के मिथ्यात्व का निश्चय होता है। क्योंकि सत्य-पदार्थ का त्रिकाल में भी निषेध होना सम्भव नहीं।

अब श्रुतार्थापत्ति का लक्षण एवं उदाहरण बताते हैं—

²श्रुतार्थापत्तिर्यथा—³यत्र श्रूयमाणवाक्यस्य स्वार्थानुपपत्तिमू-खेनार्थान्तर-कल्पनम्। यथा 'तरति शोकमात्मवित्' इत्यत्र श्रुतस्य शोकशब्दवाच्यबन्धजातस्य ज्ञाननिवर्त्यत्वस्यान्यथाऽनुपपत्या बन्धस्य मिथ्यात्वं कल्प्यते।

यथा वा जीवी देवदत्तो गृहे नेति वाक्यश्रवणानन्तरं जीविनो गृहासत्त्वं बहिः सत्त्वं कल्पयति।

अर्थ--श्रुतार्थापत्ति का उदाहरण इस प्रकार है—जब कि सुनाई देने वाले वाक्य


१. दृष्टेन अर्थेन अदृष्टस्य अर्थस्य आपत्तिः--दृष्टार्थापत्तिः। तदुक्तं श्लोक-वार्त्तिके—

"प्रमाणषट्कविज्ञातो यत्रार्थो नान्यथा भवेत्।
अदृष्टं कल्पयेदन्यं सार्थापत्तिरुदाहृता॥"

अत्र च 'दृष्ट' पदेन शब्देतर प्रमाणजन्यज्ञानविषयो विवक्षितः।

२. एकैव अर्थापत्तिः कथं न स्वीक्रियते ? श्रुतार्थापत्तेः स्वीकारः किमर्थः ? तत्रोच्यते—दृष्टार्थापत्तौ 'अर्थस्यैव' कल्पनम्, श्रुतार्थापत्तौ तु शब्दस्य प्रमाणस्य कल्पनमिति भेदेन विभागः। तदुक्तं श्लोकवार्तिके—"प्रमाणग्राहिणीत्वेन यस्मात् पूर्वविलक्षणा।"इति।

३. 'यत्र' इति पदं नास्ति क्वचित्पुस्तके।

२७० | वेदान्तपरिभाषा | [ श्रुतार्थापत्तिद्विविधा

की स्वार्थानुपपत्ति के द्वारा ( वाक्यार्थ की अनुपपत्ति के कारण ) अन्य अर्थ की कल्पना करनी पड़ती है, इसी को श्रुतार्थापत्ति कहते हैं। जैसे— आत्मवेत्ता शोक ( संसार ) से तर जाता है' इस श्रुति में शोक शब्द-वाच्य समस्त बन्धों में बताये हुए ज्ञाननिवर्त्यत्व की अन्यथा उपपत्ति का सम्भव न होने से समस्त बन्धों में मिथ्यात्व की कल्पना की जाती है अथवा 'जीवित देवदत्त घर में नहीं है' इस वाक्य के सुनने पर जीवित पुरुष का घर में न होना उसके बहिःसत्त्व की कल्पना कराता है।

विवरण —सुने हुए वाक्य के मुख्य अर्थ का असम्भव होने पर उस अर्थ की उपपत्ति लगाने के लिये जो अन्य अर्थ की कल्पना की जाती है उसे श्रुतार्थापत्ति कहते हैं। जैसे—'छान्दोग्योपनिषद्' में— 'आत्मवेत्ता पुरुष समस्त शोक को पार कर जाता है' कहा गया है। यहाँ 'शोक' शब्द का अर्थ 'कर्तृत्वादि समस्त बन्ध' है, और ज्ञान से उसकी निवृत्ति होती है, ऐसा श्रुति का आशय है। परन्तु श्रुति का यह अर्थ उपपन्न नहीं होता। क्योंकि किसी वस्तु की निवृत्ति उसके ज्ञान से नहीं हुआ करती। हमें पुस्तक का ज्ञान होने पर वह पुस्तक नष्ट हो जाय—ऐसा अनुभव किसी को नहीं होता। ज्ञान केवल अज्ञान का ही निवर्तक होता है। इसलिये इस श्रुतार्थ की अनुपपत्ति होती है। अतः उसकी उपपत्ति लगाने के लिये समस्त बन्ध, ज्ञान-निवर्त्य हैं, ( ज्ञान से नष्ट होने योग्य हैं) यह सिद्ध करने के लिये 'बन्ध' अज्ञानमूलक है, (शुक्ति-रजतादि के समान वास्तव में न होकर अज्ञान से ही भासित होता है) ऐसी कल्पना करनी पड़ती है। यही श्रुतार्थापत्ति है। इस रीति से आत्मा के दुःखित्वादि को मिथ्या सिद्ध करना ही अर्थापत्ति-प्रमाण का उपयोग है।

इस प्रकार वेदान्तोपयोगी उदाहरण बताकर 'यथा वा०' इत्यादि वाक्य से लौकिक उदाहरण बताया है। 'देवदत्त जीवित है किन्तु घर में नहीं है' इस वाक्य के सुनने पर जो पुरुष घर में नहीं और घर के बाहर भी नहीं उसका जीवित रहना सम्भव नहीं। इस कारण अर्थात् ऐसी कल्पना करनी पड़ती है कि वह जीवित होते हुए जब घर में नहीं है तब वह बाहर होना ही चाहिये। इस प्रकार कल्पना करना भी श्रुतार्थापत्ति का ही उदाहरण है। इस रीति से श्रुति ( शब्द से ज्ञान होने वाले ) अर्थ की उपपत्ति लगाने के लिये उसके उपपादक ( उपोद्वलक ) अन्य अर्थ की कल्पना करना ही श्रुतार्थापत्ति कही जाती है।

इसी श्रुतार्थापत्ति के अवान्तर भेदों को बताते हैं—

श्रुतार्थापत्तिश्च द्विविधा—^१अभिधानानुपपत्तिरभिहितानुपपत्तिश्च। तत्र, यत्र वाक्यैकदेश-श्रवणेऽन्वयाभिधानानुपपत्त्याऽन्वयाभिधानोप-


^१. अभिधानानुपपत्तिः—तात्पर्यानुपपत्तिः, तात्पर्यविषयीभूतस्य अन्वयस्यानुपपत्तिरित्यर्थः। अभिहितानुपपत्तिः—वाक्यप्रतिपाद्यस्य अर्थस्य अनुपपत्तिः।

श्रुतार्थापत्तिद्वैविध्य ] अर्थापत्तिपरिच्छेदः २७१

योपि पदान्तरं कल्प्यते तत्राभिधानानुपपत्तिः । यथा द्वारमित्यत्र ‘पिधेहि’ इत्यध्याहारः, यथा वा ‘विश्वजिता यजेत’ इत्यत्र ‘स्वर्ग-काम’ इति$^१$ पदाध्याहारः ।

**अर्थ—**श्रुतार्थानुपपत्ति के दो भेद होते हैं—एक अभिधानानुपपत्ति और दूसरी अभिहितानुपपत्ति । उनमें से जब हम वाक्य का एक देश ( एक भाग ) सुन लेते हैं, किन्तु उस एक पद के या कुछ भाग के अन्वय की अनुपपत्ति होने पर उस पद के साथ अन्वित होने योग्य किसी दूसरे पद की कल्पना ( अध्याहार ) करते हैं, उसे अभिधानानुपपत्ति कहते हैं । जैसे—हम 'द्वारम्' कपाट शब्द को सुनकर ( उसके अन्वय की उपपत्ति लगाने के लिये ) 'पिधेहि' ( लगा दो ) पद का अध्याहार करते हैं, या 'विश्वजित् याग करे' इस विधि के श्रवण करने पर ( उस याग का फलत्व सिद्ध करने के लिए ) 'स्वर्गकाम' ( स्वर्ग की इच्छा करने वाला ) पद का अध्याहार करते हैं—बस यही अभिधानानुपपत्ति कहलाती है ।

**विवरण—**क्रियावाचक पदों को कारकों की आकांक्षा रहती है, और कारकों को क्रिया की अपेक्षा रहती है बिना उसके केवल क्रियार्थक या कारकार्थक पद, विवक्षित अर्थ को नहीं दिखा सकते । कितनी ही जगह ऐसे पद श्रुत न रहने पर भी वक्ता के तात्पर्यविषयभूत अर्थ की उपपत्ति के लिये उनकी कल्पना करके ही अन्वयबोध कर लेना होता है । ऐसे अध्याहार कल्पना को अभिधानानुपपत्ति रूप अर्थापत्ति कहते हैं । जैसे—किसी कार्य में अत्यन्त व्यग्र हुआ व्यक्ति शीघ्रता के कारण 'द्वार-द्वार' इतना कहकर ही चुप हो जाता है । उस समय वहाँ की सब परिस्थिति देखकर उस वक्ता के तात्पर्यविषयीभूत अर्थ की उपपत्ति लगाने के लिये 'द्वार' इस कर्मवाचक पद को इस समय लगाओ' इस क्रियावाचक पद की ही आकांक्षा है—यह समझकर उस पद का अध्याहार कर उस वाक्य को पूर्ण करते हैं—यही अभिधानानुपपत्ति है ।

इसी अभिधानानुपपत्ति का मीमांसक-संमत वैदिक उदाहरण—'यथा वा०' इस वाक्य से दिखाया है । किसी पुरुष की फलरहित कर्म में प्रवृत्ति नहीं होनी । श्रुति ने 'विश्वजिता यजेत'—विश्वजित्-संज्ञक याग करे—ऐसा कर्म का विधान किया है । किन्तु 'वायव्यं श्वेतमालभेत पशुकामः' जिस पशु की कामना हो वह वायु देवता को उद्देश्य-कर श्वेत पशु का आलंभन करे ) इत्यादि विधि के समान प्रत्यक्ष कोई फल नहीं कहा है । इस श्रुत्यर्थ की सफलता के लिये एवं उस याग में पुरुष की प्रवृत्ति कराने के लिये सभी को अभिलषित स्वर्ग-सुख की ही फलत्वेन कल्पना करनी चाहिये । और ऐसे स्वर्गकाम ( स्वर्गेच्छु ) पुरुष को विश्वजित् करना चाहिये—यह उस विधि का अर्थ किया


१. 'इति' पदं नास्ति क्वचित्पुस्तके ।

२७२वेदान्तपरिभाषा[ श्रुतार्थापत्तिद्विविधा

जाता है। यहाँ क्रियावाचक पद की कर्तृवाचक पद के बिना अनुपपत्ति होती है, इसलिये कर्तृवाचक पद का अध्याहार करना पड़ता है। अन्यथा उस विधि की उपपत्ति का संभव नहीं। अन्वय की अनुपपत्ति होने पर 'विश्वजिता' इत्यादि विधिदर्शक पद उपपाद्य हैं। उनसे 'स्वर्गकामः' इस उपपादक पद की कल्पना होती है। अतः प्रकृत स्थल में अर्थापत्ति के लक्षण का समन्वय होता है। इसी प्रकार अन्य भी उपपाद्य और उपपादक को पहचान कर प्रकृत लक्षण का समन्वय कर लेना चाहिये।

इस पर शंका ओर उसका समाधान—

ननु द्वारमित्यादावन्वयाभिधानात्पूर्वमिदमन्वयाभिधानं पिधानोपस्थापक-पदं विनाऽनुपपन्नमिति कथं ज्ञानमितिचेत्। न। अभिधानपदेन करणव्युत्पत्त्या तात्पर्यस्य विवक्षितत्वात्। तथाच द्वारकर्मक-पिधानक्रिया-संसर्गपरत्वं पिधानोपस्थापकपदं विनाऽनुपपन्नमिति ज्ञानं तत्रापि सम्भाव्यते।

अर्थ—'द्वारम्' इत्यादि एकदेशरूप वाक्य के उस पद का अन्वय अमुक पद के साथ है इस प्रकार अन्वय का कथन करने से पूर्व उस (द्वार) पद का अन्वयाभिधान, पिधानार्थक पद न होने से ही अनुपपन्न हुआ है, यह आपने कैसे जाना? यदि पूछो तो उचित नहीं है। क्योंकि हमें अभिधानपद से करण-व्युत्पत्ति के द्वारा तात्पर्य अर्थ ही विवक्षित है। इस कारण द्वारकर्मक पिधान क्रिया ही उस वाक्य का अर्थ, पिधानवाचक पद के बिना ही अनुपपन्न हुआ है, यह ज्ञान उस एकदेशरूप वाक्य में भी हो सकता है।

**विवरण—**अभिधान का अर्थ है अन्वय, और उसकी अनुपपत्ति का अर्थ है अन्वय-बोधाभाव—यह अभिधानानुपपत्ति का अर्थ है। प्रथम 'द्वारकर्मक पिधान = जिसमें 'द्वार' कर्म है, ऐसी पिधान क्रिया। इस प्रकार यदि अन्वय-बोध होगा तो वह अन्वयबोध पिधानार्थक पद के अभाव में कैसे हो सकेगा? और अन्वयबोध ही यदि न हो तो अमुक अन्वयबोध की अमुक पद के न होने से अनुपपत्ति हुई है—यह ज्ञान भी कैसे हो सकेगा? और उस ज्ञान का होना यदि सम्भव नहीं तो आप पिधानार्थक पद के बिना इस अन्वय-बोध के अनुपपन्न होने से 'पिधेहि' पद का अध्याहार करने की कल्पना किस पर से करते हैं?

यह शंका ठीक नहीं है। क्योंकि भावे व्युत्पत्ति को स्वीकार कर 'अभिधान' शब्द का अन्वयबोध रूप अर्थ यदि माना जाय तो आपका दिया हुआ दोष हमारे पक्ष में आता है। परन्तु हमने उस अर्थ से 'अभिधान' शब्द का प्रयोग नहीं किया, अपितु 'अभिधीयते अनेन इति अभिधानम्' इस करण व्युत्पत्ति को मानकर 'अभिधानानुपपत्ति' शब्द का प्रयोग किया है। अभिधान शब्द का अर्थ है—तात्पर्य। वक्ता ने जिस तात्पर्य से शब्दोच्चारण