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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 482 में से

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पृष्ठ 315

विवरणवाक्याशयः ] आगमपरिच्छेदः २५७

**तत्र—**लौकिक-वैदिक वाक्यों में से लौकिक वाक्य तो प्रमाणान्तरों से ज्ञात हुए अर्थ का ही अनुवाद करते हैं। परन्तु वैदिक वाक्यों का अर्थ, प्रमाणान्तर से अज्ञात होने के कारण अनुवाद रूप नहीं होता।

**विवरण—**लौकिक और वैदिक भेद से शब्द के दो प्रकार हैं। वैदिक वाक्यों के तात्पर्य का निश्चय पूर्वोत्तर-मीमांसारूप पूजित-विचार से सिद्ध हुए निर्दुष्ट न्यायों के द्वारा ही होना चाहिये। बिना मीमांसा के वेदों का यथार्थ तात्पर्य ज्ञात होना संभव ही नहीं। वेदों के पूर्वोत्तर काण्डों के तात्पर्य-निर्णयार्थ ही पूर्वोत्तर मीमांसाएं प्रवृत्त हुई हैं। इस कारण वैदिक वाक्यों का तात्पर्यज्ञान, मीमांसा-न्यायों के अधीन होता है।

लौकिक वाक्यों का तात्पर्य प्रकरणादिकों से ज्ञात होता है। उदाहरण 'देवः प्रमाणम्' वाक्य है। यह राजप्रकरण में पठित होने से यहाँ देव शब्द का राजा अर्थ में तात्पर्य है—निश्चित होता है। प्रकरणादि के 'आदि' पद से लिंग, औचित्य आदि का ग्रहण करना चाहिये। इस विषय में अभियुक्तों का वचन है—

'अर्थात् प्रकरणाल्लिङ्गादौचित्याद्देशकालतः।
शब्दार्थास्तु विभिद्यन्ते न रूपादेव केवलात्॥'

अर्थ (प्रयोजन), प्रकरण, लिङ्ग (शब्दसामर्थ्य), औचित्य, देश और काल से शब्दार्थों का भेद होता है। केवल शब्दस्वरूप से शब्दार्थ में भेद नहीं होता।

लौकिक और वैदिक वाक्यों में एक विशेष यह भी है कि—लौकिक वाक्य जिस अर्थ को बताते हैं, वह प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणों से अवगत (ज्ञात) ही रहता है, अपूर्व नहीं होता। इस कारण लौकिक वाक्यों में सिद्ध वस्तुओं का अनुवादकत्व ही रहता है। अपूर्वार्थप्रतिपादकत्वरूप स्वतः प्रामाण्य नहीं होता। किन्तु वेदमूलकत्वेन प्रामाण्य होता है। वैदिक वाक्यों की यह स्थिति नहीं है। वे जिस अर्थ को बताते हैं वह पहले किसी भी अन्य प्रमाण से ज्ञात नहीं रहता। इसलिये वैदिक वाक्य, अनुवादरूप न होकर अपूर्व (पुरुषबुद्धि से अगम्य) अर्थ का प्रतिपादन करते हैं। इसी कारण उन्हें (वैदिक वाक्यों को) अज्ञातार्थज्ञापकत्वरूप प्रामाण्य होता है।

पूर्व मीमांसक कार्यपरक (साक्षात् विधि-निषेधबोधक) शब्दों का ही स्वार्थ में प्रामाण्य मानते हैं। उनका कहना है कि—व्यवहार में दिखाई देता है कि उत्तमवृद्ध पुरुष (वृद्ध आदमी), मध्यमवृद्ध (तरुण पुरुष) को 'गाय लाओ' 'बछड़ा बांध' इत्यादि आज्ञा देता है। यह सब समीप बैठा बालक देखता रहता है और उससे उसे आनयनादि-क्रियान्वित ही 'गो' आदि पदों का अर्थबोध (शक्तिग्रह) होता है। इस कारण केवल सिद्धवस्तुप्रतिपादक शब्दों से शक्तिग्रह होना संभव ही नहीं। इसीकारण कार्य-बोधकत्वेन रूपेण ही शब्दों का प्रामाण्य सिद्ध होता है। सिद्धार्थप्रतिपादक वाक्यों में प्रामाण्य नहीं कह सकते। इसी अभिप्राय से उन्होंने 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्य-मतदर्थानाम्' कहा है।