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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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२५६ | वेदान्तपरिभाषा | [ तात्पर्यग्रहोपायः

विवरण—रत्नकार आदि कहते हैं कि 'किसी विशेष स्थल पर यद्यपि शाब्दबोध को तात्पर्यज्ञान की अपेक्षा रहती है तथापि शाब्दबोध में सर्वत्र तात्पर्यज्ञान कारण नहीं होता' इस कथन में ही विवरण-वाक्य का तात्पर्य है। इस कारण उन्होंने तात्पर्यज्ञान का सर्वथा निषेध किया है, नहीं कहा जाता और स्वीकार किया है—यह भी नहीं कहा जा सकता। मूल में 'शाब्दज्ञानत्वावच्छेदेन' का यही अर्थ है--शाब्दज्ञानत्व के अवच्छेद से (व्याप्ति से) अर्थात् शाब्दज्ञान में तात्पर्यज्ञान कारण नहीं है (जहाँ शाब्दज्ञानत्व है वहाँ तात्पर्यज्ञान है), इस प्रकार उनकी (शाब्दज्ञानत्व और तात्पर्यज्ञान की) व्याप्ति नहीं है। किन्तु जहाँ वाक्यार्थज्ञान में--इस वाक्य का यही अर्थ है या अन्य अर्थ है—संशय हुआ हो वहाँ तात्पर्यज्ञान का वाक्यार्थज्ञान में उपयोग होता है। किंवा वक्ता के आशय को न समझ कर यदि विपरीत अर्थ किसी को भासित हुआ हो तो उसकी निवृत्ति के लिए वहाँ पर उतना तात्पर्यज्ञान उपयुक्त होता है। इतरत्र शाब्दज्ञान होते हुए भी तात्पर्यज्ञान वहाँ कारण नहीं रहता। अर्थात् स्थल विशेष पर तात्पर्यज्ञान की शाब्दबोध में अपेक्षा होती है। समस्त शाब्दबोध, तात्पर्यज्ञान के पश्चात् ही हों ऐसा नियम नहीं है। तात्पर्यज्ञान में शाब्दज्ञान की कारणता का निषेध करने में विवरणाचार्य का यही अभिप्राय है। इस रीति से रत्नकार आदिकों ने तात्पर्यज्ञान में कारणता की उपपत्ति को बताया है।

'आहुः' कहकर ग्रन्थकार ने उपर्युक्त समाधान पर अपनी अरुचि सूचित की है। उसका कारण भी यही है कि सामान्यतः समस्त शाब्दबोधों में तात्पर्यज्ञान को ही कारण माना जाय तो शाब्दज्ञाननिष्ठ कार्यता का अवच्छेदक, शाब्दज्ञानत्व ही होगा, परन्तु ऐसा न मानकर संशय—विपर्ययोत्तरशाब्दज्ञान में ही तात्पर्यज्ञान कारण होता है—यदि स्वीकार करें तो 'संशयविपर्ययोत्तरशाब्दज्ञानत्व' इतना गुरुभूत कार्यतावच्छेदक मानना पड़ता है, तथापि कार्यभेद से कारण का और कारणतावच्छेदक आदि का भेद यदि मानना हो तो इस मत को भी स्वीकार किया जाय। पूर्वाचार्यों के वचन से हमारे मत का विरोध नहीं हो पाता। यह दोनों समाधानों से सिद्ध है।

शंका—तात्पर्यज्ञान, शाब्दबोध में कारण है—यह सिद्ध होने पर भी वह तात्पर्य-ज्ञान किससे होता है ? तब मूलकार उत्तर देते हैं—

तच्च तात्पर्यं वेदे मीमांसा परिशोधित-न्यायादेवावधार्यते, लोके तु प्रकरणादिना। तत्र लौकिक-वाक्यानां मानान्तरावगतार्था¹-नुवादकत्वम्। वेदे तु वाक्यार्थस्यापूर्व्वतया नानुवादकत्वम्।

अर्थ—और वह तात्पर्य, वेदवाक्यों में मीमांसा के द्वारा परिशोधित न्यायों से ही निश्चित होता है। परन्तु लौकिकवाक्यों में प्रकरणादिकों से (तात्पर्य का निश्चय होता है)।


१. 'र्थतयानु०'-इति पाठान्तरम्।