वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविवरणस्याशयः ] आगमपरिच्छेदः २५५
उपर्युक्त शंका उत्पन्न हुई है। क्योंकि प्रमाणसिद्ध वस्तु का निषेध कोई भी नहीं कर सकता। उपर्युक्त तात्पर्यज्ञान से शाब्दबोध होता है —यह अनुभव सभी को होने के कारण अनुभवसिद्ध वस्तु का निषेध विवरणाचार्य भी कैसे करेंगे। तस्मात् उन्होंने जो तात्पर्य का निषेध किया है वह नैयायिकाभिमत 'तत्प्रतीतीच्छया उच्चरितत्व' रूप तात्पर्य का ही किया है, यह समझना चाहिए। क्योंकि वैसे तात्पर्यज्ञान को शाब्दबोध में कारण मानना सदोष है। हमारे उपर्युक्त लक्षण पर किसी प्रकार दोष न आने से उसका निषेध करने का उनका उद्देश्य नहीं है। क्योंकि तात्पर्यज्ञान शाब्दबोध की कारणता सर्वथैव नहीं होती—यह मत यदि उनका होता तो वे वेदान्तों (उपनिषदों) के तात्पर्य-निर्णयार्थ प्रवृत्त--शारीरिक भाष्य के आधार पर 'विवरण' टीका ही न करते। क्योंकि जिस तात्पर्यज्ञान का अर्थज्ञान में उपयोग नहीं है, उस तात्पर्य के निश्चयार्थ किया हुआ उपक्रमोपसंहारादि तात्पर्यनिर्णायक षड्विधलिंगों का विचार व्यर्थ होने लगेगा।
इसके अतिरिक्त 'तन्तु समन्वयात्' सूत्र के भाष्य में आचार्य ने 'सर्वेषु वेदान्तेषु वाक्यानि तात्पर्येणैतस्यैवार्थस्य प्रतिपादकत्वेन समनुगतानि' कहा है, उसके साथ भी विरोध होगा इसलिए ऐसी मूलोच्छेदक कल्पना न कर उक्तार्थ में ही विवरणाचार्य का तात्पर्य मानना योग्य होगा।
अत्र रत्नकार आदि के मत से उपर्युक्त तात्पर्य-निरसनपरक विवरण ग्रन्थ की उपपत्ति बताते हैं।
केचित्तु शाब्दज्ञानत्वावच्छेदेन न तात्पर्यज्ञानं हेतुरित्येवं परं चतुर्थवर्णकवाक्यम्। तात्पर्य-संशय-विपर्ययोत्तर शाब्दज्ञानविशेषे च तात्पर्यज्ञानं हेतुरेव। इदं वाक्यमेतत्परम्? उतान्यपरमिति¹ संशये तद्विपर्यये च तदुत्तर वाक्यार्थ²-विशेषनिश्चयस्य तात्पर्य्निश्चयं विनाऽनुपपत्तेरित्याहुः।
**अर्थ—**कुछ लोग 'शाब्दज्ञानत्व के अवच्छेद से (यावत्-शब्दज्ञान में) तात्पर्यज्ञान कारण नहीं है, एतत्परक वह चतुर्थ वर्णक में वाक्य है। तात्पर्य में संशय अथवा विपर्यय (भ्रम) होने पर जो विशेष शाब्दबोध होता है, उसमें तो तात्पर्यज्ञान, कारण होता ही है। यह वाक्य एतत्पर (इस अर्थ का बोधक) है, या अन्यपरक है? ऐसा संशय होने पर या अन्यपर ही है—यह भ्रम होने पर पश्चात् वाक्यार्थ का जो विशेष निर्णय होता है उसकी उपपत्ति तात्पर्यनिश्चय के बिना नहीं हो पाती' ऐसा कहते हैं।
१. 'तात्पर्य सं०'-इति पाठान्तरम्।
२. 'र्थनि०'-इति पाठान्तरम्।