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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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२५४ | वेदान्तपरिभाषा | [ तात्पर्यस्य शाब्दबोधहेतुत्वम्

बताने की आवश्यकता नहीं रहती। ऐसा मानने पर तृण, अरणि, मणि आदि में दाह-जनकत्व का भिन्न-भिन्न तृणत्वादि को अवच्छेदक मानने का गौरव भी नहीं हो पाता, या अननुगमदोष भी नहीं हो पाता।

यहाँ पर शाब्दबोध की अवच्छेदक शक्ति का अर्थ आलंकारिकों के मतानुसार 'सामान्यवृत्ति' समझना चाहिए। आलंकारिक जिस प्रकार शक्य और लक्ष्य अर्थों में पदों की शक्ति ही मानते हैं अर्थात् 'वृत्ति' शब्द के समान ही 'शक्ति' शब्द का अर्थ मानते हैं, उसी प्रकार प्रकृत में ग्रन्थकार ने 'वृत्ति' अर्थ में 'शक्ति' शब्द को मानकर विवेचन किया है। इस कारण 'गम्भीरायां नद्यां घोष:' आदि स्थलों में तीरादितात्पर्य की अनुपपत्ति होगी, क्योंकि यहाँ पर 'गंगा शब्द की तीर अर्थ में शक्ति नहीं है' इस शंका का निराकरण हो जाता है तस्मात् यह तात्पर्य का स्वरूप निर्दुष्ट है।

शंका—शाब्दज्ञान में तात्पर्य को कारण आप कैसे कहते हैं? क्योंकि विवरणाचार्य ने शाब्दबोध में तात्पर्यज्ञान की आवश्यकता का निषेध किया है। इस शंका का उत्तर ग्रन्थकार दे रहे हैं—

एवं तात्पर्यस्य तत्प्रतीतिजनकत्वरूपस्य शाब्दज्ञान-जनकत्वे सिद्धे चतुर्थवर्णके तात्पर्यस्य शाब्दज्ञान-हेतुत्व-निराकरण-वाक्यं तत्प्रतीतीच्छयोच्चरितत्वरूप-तात्पर्यनिराकरणपरम्, अन्यथा तात्पर्य-निश्चय-फलक-वेदान्तविचार-वैयर्थ्य-प्रसङ्गात् ।

अर्थ— इस प्रकार तत्प्रतीतिजनकत्वरूप तात्पर्यज्ञान, शाब्दज्ञान में कारण सिद्ध होने से चतुर्थवर्णक में विवरणाचार्य ने 'शाब्दबोध में तात्पर्यज्ञान कारण है' इस मत के निरसनार्थ जो वाक्य लिखा है वह 'तत्प्रतीतीच्छयोच्चरितत्व' नैयायिकोक्त लक्षण की अयुक्तता दर्शित करने के लिए है। अन्यथा उपनिषद्वाक्यों के तात्पर्य का निर्णय करने के लिए प्रवृत्त वेदान्तवाक्य-विचाररूप उत्तरमीमांसा व्यर्थ हो जायेगी।

विवरण— ब्रह्मसूत्र के प्रथम अध्याय के चतुःसूत्री (चार सूत्रों) पर भगवत्पूज्यपाद श्रीशंकराचार्य का भाष्य है। उस पर उन्हीं के शिष्य श्रीपद्मपादाचार्य की टीका है, जिसे 'पञ्चपादिका' कहते हैं। उस पञ्चपादिका पर श्रीप्रकाशत्ममुनि ने व्याख्या रची है, उसे विवरण कहते हैं। इसमें प्रथम सूत्र के चार वर्णक कर विवरण किया है, उनमें से चतुर्थ वर्णक में 'अत्रेदं विचार्यं, किं तात्पर्यमर्थप्रमितिहेतुः किंवा प्रतिबन्धनिरासहेतुरिति ?' यहाँ यह विचार करना है कि अर्थ यथार्थ ज्ञान होने में तात्पर्य कारण है या अर्थनिश्चय के प्रतिबन्ध की निवृत्ति के लिए उसकी आवश्यकता है?—ऐसा विकल्प कर 'अर्थज्ञान में तात्पर्यज्ञान कारण नहीं है' कहा है, और यहाँ पर तो आप तात्पर्यज्ञान को शाब्दबोध में कारण बता रहे हैं, यह कैसे हो सकता है? इस शंका का उद्भव होने पर श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र कहते हैं—विवरणाचार्य के आशय को न समझने के कारण