वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५८ | वेदान्तपरिभाषा | [ सिद्धार्थवाक्यानामपि प्रामाण्यम्
पूर्वमीमांसकों के इस मत का निरसन करने के लिये ग्रन्थकार कहते हैं—
तत्र लोके वेदे च कार्यपराणामिव सिद्धार्थानामपि ¹ प्रामाण्यम्, पुत्रस्ते जात ² ईत्यादिषु सिद्धार्थेष्व ³ पि पदानां सामर्थ्यावधारणात् । अत एव वेदान्तवाक्यानां ब्रह्मणि प्रामाण्यम् । यथा चैतत्तथा विषय-परिच्छेदे वक्ष्यते ।
अर्थ—'तत्र'—लोक और वेद में कार्यबोधक शब्दों के समान सिद्धार्थ-बोधक शब्दों में ही प्रामाण्य होता है। क्योंकि 'तुम्हें पुत्र हुआ है' इत्यादि वाक्यों में सिद्ध अर्थ का ही प्रतिपादन होने पर भी उनके पदों के सामर्थ्य (शक्ति) का निश्चय हम कर पाते हैं इसी कारण उपनिषद्-वाक्यों को ब्रह्म के विषय में प्रामाण्य माना जाता है, उसका प्रकार विषयपरिच्छेद में बतावेंगे ।
**विवरण—**कार्यपरक शब्दों के समान सिद्धार्थप्रतिपादक शब्दों का भी प्रामाण्य अवश्य स्वीकार करना चाहिये । क्योंकि कार्यपरक शब्दों से जिस प्रकार उन शब्दों का सामर्थ्य समझ में आता है उसी प्रकार 'तुम्हें पुत्र हुआ है' इत्यादि सिद्धार्थपरक शब्दों का भी शक्तिग्रह हमें होता है । 'पुत्रस्ते जातः' किसी को कहने पर सुनने वाले की मुद्रा प्रसन्न होती है, वैसे ही 'कन्या ते गर्भिणी जाता' = तेरी कन्या (अविवाहित पुत्र) गर्भिणी है—इस वाक्य के सुनते ही श्रोता की मुखमुद्रा अप्रसन्न दीखती है । इस मुखप्रसाद और मुखमालिन्य रूप लिंग से उसके हर्षविषाद का अनुमान होता है । उपर्युक्त वाक्य से उक्त अर्थ उस पुरुष को यदि ज्ञात न हुआ होता तो उसके मुख पर ऐसा परिणाम हुआ न दिखाई देता । इस अर्थापत्तिरूप प्रमाण से इस पुरुष को उक्त सिद्धार्थबोधक वाक्यों से भी शाब्दबोध (शक्तिग्रह) होता है । तस्मात् कार्यपरक शब्दों के शक्तिग्रह के समान सिद्धार्थक पदों का भी शक्तिग्रह स्वीकार करना चाहिये, जिससे सिद्धार्थक पदों में भी प्रामाण्य अर्थादेव सिद्ध हो जाता है । क्योंकि जैसे कार्यपरक वाक्य से प्रमात्मक—(यथार्थ) ज्ञान पैदा होता है वैसे ही सिद्धार्थबोधक वाक्य से भी प्रमात्मक ज्ञान पैदा होता है । अर्थात् उसके 'प्रमाकरणत्व' रूप प्रामाण्य का कोई निषेध नहीं कर सकता । 'आम्नायस्य क्रियार्थत्वादानर्थक्य०' इत्यादि सूत्र के द्वारा पूर्व काण्ड के मन्त्र तथा अर्थवादरूप वेदभाग में प्रामाण्य नहीं है, इस आशय से पूर्वपक्ष को उठाया गया है । इस कारण स्वतन्त्र-फल-रहित मन्त्रादि में विधिशेषत्वेन प्रामाण्य के प्राप्त न होने पर भी समस्त अनर्थनिवृत्तिरूप प्रयोजन (फल) से युक्त
१. 'व्युत्पत्तया प्रा०'—इति पाठान्तरम् ।
२. 'तः, कन्या ते गर्भिणीत्या०'—इति पाठान्तरम् ।
३. 'र्थेष्वपि'—इति पाठान्तरम् ।