वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवेदनित्यत्वादिविचारः ] आगमपरिच्छेदः २५९
ब्रह्मप्रतिपादक उपनिषद्वाक्यों में प्रामाण्य सिद्ध होता है। तस्मात् लौकिक एवं वैदिक दोनों शब्दों को कार्य और सिद्ध दोनों अर्थों में प्रामाण्य होता है। वेदान्तवाक्यों की केवल ( कार्यसंस्पर्शरहित ) ब्रह्मबोधकत्व कैसे होता है ? और उनका ब्रह्म रूप अर्थ में ही ही समन्वय किस प्रकार होता है ? यह सब विषयपरिच्छेद में ग्रन्थकार सविस्तर बतावेंगे अतः वेदान्त 'ब्रह्मज्ञान का विधान करने के लिए है' ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये।
स्वाभिमत वेद-प्रामाण्य की स्थापना करने के लिए प्रथम नैयायिक और पूर्वमीमांसकों के तद्विषयक मतों को बताते हैं।
तत्र वेदानां नित्यसर्वज्ञ-परमेश्वर-प्रणीतत्वेन प्रामाण्यमिति नैयायिकाः। वेदानां नित्यत्वेन निरस्त-समस्त-पुंदूषणतया प्रामाण्यमित्यध्वरमीमांसकाः। अस्माकं तु मते वेदो न नित्य उत्पत्तिमत्त्वात्। उत्पत्तिमत्त्वं च 'अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदः' १ ( बृ०-२-४-१० ) इत्यादि श्रुतेः।
अर्थ— 'तत्र'—लोक तथा वेद इन में से वेदों को नित्य, सर्वज्ञ ईश्वर के निर्मित होने से प्रामाण्य हैं—ऐसा नैयायिक कहते हैं। वेद, नित्य ( उत्पत्तिरहित ) होने से उनमें पुरुषसुलभ किसी प्रकार के दोष न होने से ही प्रामाण्य है—ऐसा अध्वरमीमांसक (यज्ञकाण्डरूपकर्मपरक वेदभाग का विचार करने वाले पूर्वमीमांसक) मानते हैं। किन्तु हमरे मत में वेद नित्य नहीं हैं क्योंकि वे उत्पत्तिमन् हैं। 'यह जो ऋग्वेदादि है वह इस महद्भूत का निःश्वसित हैं' इत्यादि श्रुति से उनका उत्पत्तिमत्त्व सिद्ध होता है।
विवरण— इनमें से प्रथम लक्षण नैयायिकों का है। 'वेद, नित्य एवं सर्वज्ञ परमेश्वर के प्रणीत होने से उन्हें प्रामाण्य है' यह उनका मत है। 'कर्ता के दोष से उनमें अप्रामाण्य की कोई शङ्का न करे, इसलिये वेदों के परमेश्वर-प्रणीत होने पर भी वह वेदकर्ता परमेश्वर सर्वज्ञ होने के कारण कर्तृदोषप्रयुक्त अप्रामाण्य उनमें प्राप्त नहीं होता यह बात 'सर्वज्ञ' विशेषण से सूचित की है। सर्वज्ञत्व, मन्वादि स्मृतिकारों में भी होने से तत्प्रणीत ग्रन्थों को भी प्रामाण्य प्राप्त हो सकता है, इसलिये परमेश्वर को 'नित्य' विशेषण दिया है। मन्वादिकों के सर्वज्ञ होने पर भी वे नित्य न होने से उपर्युक्त शङ्का ही नहीं उठ सकती। 'प्रणीतत्व' के कहने से वेदान्ती और नैयायिक के मतोंमें वैलक्षण्य सूचित कर दिया गया। वेदान्तमत से वेदों में उत्पत्तिमत्त्व के होने पर भी ( वेद, उत्पन्न हुए हैं—यह स्वीकार करने पर भी ) वे अन्य कल्प की आनुपूर्वी से विजातीय आनुपूर्वीयुक्त एवं ईश्वरप्रणीत हैं—यह नैयायिकों का कथन वेदान्तियों को मान्य नहीं है।
१. 'दो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इ०'—इति पाठान्तरम् ।